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यूपी में बसपाइयों के लिए नई उम्मीद बनी भाजपा

Mon, 26 Oct 2015 12:55 AM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमर उजाला, लखनऊ Updated Mon, 26 Oct 2015 12:55 AM IST
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BSP men moving towards BJP.

चुनावी मौसम की आहट के साथ नेताओं का दल बदलना कोई नई बात नहीं है। वह दौर भी आया जब दूसरे दलों को छोड़कर बसपा में टिकट पाने की होड़ लगी रहती थी। मगर, अब हवा का रुख कुछ बदलता नजर आ रहा है।

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सूबे में विधान परिषद और विधानसभा के चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, बसपा से दूसरे दलों में जाने वालों का सिलसिला तेज होने लगा है। पिछले कुछ महीनों में दो विधान परिषद सदस्य बसपा छोड़ भाजपा में जा चुके हैं तो दो के परिवारीजन भगवा खेमे का झंडा उठा रहे हैं।
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पिछले विधानसभा चुनावों से ही बसपा झटके पर झटके खा रही है। सत्ता से बाहर होने के बाद लोकसभा चुनाव रहे हों या विधानसभा के उपचुनाव, बसपा को निराशा ही हाथ लगी है। कई राज्यों के विधानसभा चुनाव भी हुए लेकिन बसपा को कोई फायदा नहीं हुआ।
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गौर करने वाली बात ये रही कि जिन राज्यों में बसपा कुछ सीटें जीत लेती थी, वहां खाता खुलना भी कठिन हो गया। हालात ये हैं कि जो नेता कभी बसपा में टिकट पाकर जीत की गारंटी देखते थे, उनमें कई को अब कोई उम्मीद नहीं नजर आती।

सिटिंग विधान परिषद सदस्यों की बात करें तो सबसे पहले बाराबंकी के हरगोविंद सिंह इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हुए। अब एमएलसी कैलाश यादव भाजपा में गए हैं। इनका कार्यकाल जनवरी 2016 तक था। परमेश्वर लाल सैनी खुद तो एमएलसी बने हुए हैं लेकिन उनके परिवारीजन भाजपा में चले गए।

बड़े नेताओं के सा‌थ काडर के साथी भी दूर हुए

BSP men moving towards BJP.

गोंडा-बलरामपुर क्षेत्र की मौजूदा बसपा एमएलसी सविता सिंह के पति धीरेंद्र प्रताप सिंह ‘धीरू’ पहले ही भाजपा के हो चुके हैं। अंदाजा लगाना कठिन नहीं है कि बसपा की मौजूदा स्थिति से वे लोग ज्यादा निराश हुए हैं जो किसी भी कीमत पर सियासत में जीत ही चाहते हैं।

इनके अलावा कानपुर के पूर्व सांसद अनिल शुक्ला वारसी ने पिछला लोकसभा चुनाव बसपा से लड़ा था। उनकी पत्नी प्रतिभा शुक्ला भी पूर्व विधायक हैं। दोनों ही बसपा छोड़कर भाजपा का दामन थाम चुके हैं। ताराचंद सैनी बसपा में रहे हैं। वह पिछले दिनों राष्ट्रीय लोकदल में चले गए।

काडर के कई साथी भी दूर छिटके

बसपा में रहते हुए विरोध की आवाज बुलंद करने की अगुवाई सबसे पहले राज्यसभा सांसद जुगुल किशोर ने की। सीधे बसपा नेतृत्व को निशाना बनाने वाले सांसद के परिवारीजन बाद में भाजपा में चले गए। बसपा ने न तो जुगुल को पार्टी से निकाला और न ही उन्होंने इस्तीफा दिया। तकनीकी तौर पर वह अब भी बसपा में हैं लेकिन उनकी निष्ठा कहां हैं, यह किसी से छिपा नहीं है।


जुगुल किशोर की गिनती कभी बसपा काडर के मजबूत नेताओं में होती रही है। वह कई मंडलों के जोनल कोऑर्डिनेटर थे। बसपा की स्थापना के समय से ही साथ रहे पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद और दीनानाथ भास्कर भी पार्टी छोड़ गए। दद्दू प्रसाद खुद एक संगठन बनाकर मैदान में आ चुके हैं तो भास्कर भाजपा का झंडा फहरा रहे हैं।

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