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राज्यसभा चुनाव : सबसे बुरे दौर में बसपा, झटके पर झटका, लगातार साथ छोड़ रहे पार्टी विधायक

Thu, 29 Oct 2020 01:25 AM IST
पंकज श्रीवास्‍तव न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: पंकज श्रीवास्‍तव Updated Thu, 29 Oct 2020 01:25 AM IST
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BSP in worst phase, jerk on jerk, party MLA leaving continuously
बसपा सुप्रीमो मायावती - फोटो : amar ujala
2017 के विधानसभा के चुनाव में सबसे निराशाजनक प्रदर्शन के बावजूद बसपा कोई सबक लेती नजर नहीं आ रही है। अलग-अलग मौकों पर अब तक आठ विधायक खुले तौर पर बगावती तेवर दिखा चुके हैं। विधानसभा की सात सीटों के लिए हो रहे उपचुनाव के बीच राज्यसभा चुनाव में पार्टी के ‘बहुजन समाज’ की छाप वाले चेहरों के मोहभंग के संदेश ने भविष्य की चुनौती और भी बढ़ा दी है। इससे 2022 का विधानसभा चुनाव बसपा के लिए और भी चुनौतीपूर्ण बन सकता है।
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बसपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 19 सीटें जीती थीं, लेकिन उसे पहला झटका तब लगा, जब मार्च 2018 के राज्यसभा चुनाव में उन्नाव से बसपा विधायक अनिल सिंह ने पार्टी लाइन से हटकर भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर दिया। दूसरा झटका अंबेडकरनगर की जलालपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में लगा। पार्टी ने जलालपुर के विधायक रितेश पांडेय को 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बना दिया। रितेश जीत गए, पर जब जलालपुर विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव हुआ तो सपा ने यह सीट बसपा से छीन ली।
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पश्चिमी यूपी में पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय बसपा के ब्राह्मण चेहरा माने जाते रहे हैं। लोकसभा चुनाव में टिकट को लेकर अनबन हुई और बसपा ने आगे चलकर उपाध्याय को पार्टी से निलंबित कर दिया। उपाध्याय सादाबाद से बसपा विधायक हैं। उनका बेटा भाजपा की सदस्यता ले चुका है। इन झटकों के बावजूद बसपा नेतृत्व का सत्ताधारी दल भाजपा के प्रति काफी समय से नरम रुख नजर आ रहा था। इससे पार्टी के मुस्लिम विधायकों में असहजता नजर आने लगी थी। श्रावस्ती से बसपा विधायक असलम राइनी पिछले वर्ष पार्टी लाइन से हटकर विधानसभा के विशेष सत्र में शामिल हुए। उन्होंने सत्र में शामिल न होने के लिए बसपा पर सवाल भी उठाए। राइनी ने कई बार मुख्यमंत्री योगी के कई निर्णयों की तारीफ  भी की। पर, पार्टी राइनी के खिलाफ  चुप रही। बसपा नेतृत्व के निर्णय को यह खुली चुनौती थी। पार्टी ने तब भी विधायकों के मिजाज का नोटिस लेने की जरूरत नहीं समझी।
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बसपा के कई विधायकों को लग रहा था कि भाजपा राज्यसभा चुनाव में नौवां प्रत्याशी जरूर उतारेगी। बसपा विपक्षी दलों से कोई आंतरिक समझ बनाकर संख्या बल में कमजोर होने के बावजूद प्रत्याशी उतार रही है और चुनाव होगा। ऐसे में असंतुष्ट नजर आने वाले कई बसपा विधायक भी पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में आ गए थे, मगर जब भाजपा ने सर्वाधिक अतिरिक्त वोट होने के बावजूद नौवां प्रत्याशी नहीं उतारा तो भाजपा विरोधी वोटों से सीट निकालने वाले विधायकों को अपना सियासी भविष्य संकट में नजर आने लगा। उन्हें अंदाजा हो गया कि पार्टी का आंतरिक पैक्ट विपक्षी दलों से न होकर सत्ताधारी दल से हो गया है और जनता में इस मैसेज के बाद उनकी चुनौती बढ़ सकती है। ऐसे में बसपा के आधा दर्जन विधायक खुलकर बगावती तेवर में आ गए। बसपा के लिए यह सबसे बड़ा झटका है।

बहुजन समाज का विश्वास खोने की आशंका

एक साथ जिन छह बसपा विधायकों ने बगावती तेवर दिखाया है, उनमें तीन मुस्लिम, दो पिछड़ा वर्ग के व एक दलित विधायक शामिल हैं। बसपा के बहुजन के फॉर्मूले में दलित, पिछड़े और मुस्लिम ही आते हैं। एक साथ तीनों ही वर्ग के विधायकों के झटके व सपा खेमे से पींगें बढ़ाने से बसपा के बहुजन समाज में नकारात्मक संदेश की आशंका बढ़ गई है।

इसका असर आने वाले दिनों में और तेजी से महसूस होने की संभावना है। बसपा इस राज्यसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी रामजी गौतम को भले जिता ले, लेकिन बहुजन समाज खासकर अल्पसंख्यक मतों को सहेज पाना मुश्किल साबित हो सकता है। नए समीकरण का पहला असर विधानसभा उपचुनाव में नजर आने से इनकार नहीं किया जा सकता।
 

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