राज्यसभा चुनाव : सबसे बुरे दौर में बसपा, झटके पर झटका, लगातार साथ छोड़ रहे पार्टी विधायक
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बसपा ने 2017 के विधानसभा चुनाव में 19 सीटें जीती थीं, लेकिन उसे पहला झटका तब लगा, जब मार्च 2018 के राज्यसभा चुनाव में उन्नाव से बसपा विधायक अनिल सिंह ने पार्टी लाइन से हटकर भाजपा प्रत्याशी के पक्ष में मतदान कर दिया। दूसरा झटका अंबेडकरनगर की जलालपुर विधानसभा सीट के उपचुनाव में लगा। पार्टी ने जलालपुर के विधायक रितेश पांडेय को 2019 के लोकसभा चुनाव में प्रत्याशी बना दिया। रितेश जीत गए, पर जब जलालपुर विधानसभा क्षेत्र का उपचुनाव हुआ तो सपा ने यह सीट बसपा से छीन ली।
पश्चिमी यूपी में पूर्व मंत्री रामवीर उपाध्याय बसपा के ब्राह्मण चेहरा माने जाते रहे हैं। लोकसभा चुनाव में टिकट को लेकर अनबन हुई और बसपा ने आगे चलकर उपाध्याय को पार्टी से निलंबित कर दिया। उपाध्याय सादाबाद से बसपा विधायक हैं। उनका बेटा भाजपा की सदस्यता ले चुका है। इन झटकों के बावजूद बसपा नेतृत्व का सत्ताधारी दल भाजपा के प्रति काफी समय से नरम रुख नजर आ रहा था। इससे पार्टी के मुस्लिम विधायकों में असहजता नजर आने लगी थी। श्रावस्ती से बसपा विधायक असलम राइनी पिछले वर्ष पार्टी लाइन से हटकर विधानसभा के विशेष सत्र में शामिल हुए। उन्होंने सत्र में शामिल न होने के लिए बसपा पर सवाल भी उठाए। राइनी ने कई बार मुख्यमंत्री योगी के कई निर्णयों की तारीफ भी की। पर, पार्टी राइनी के खिलाफ चुप रही। बसपा नेतृत्व के निर्णय को यह खुली चुनौती थी। पार्टी ने तब भी विधायकों के मिजाज का नोटिस लेने की जरूरत नहीं समझी।
बसपा के कई विधायकों को लग रहा था कि भाजपा राज्यसभा चुनाव में नौवां प्रत्याशी जरूर उतारेगी। बसपा विपक्षी दलों से कोई आंतरिक समझ बनाकर संख्या बल में कमजोर होने के बावजूद प्रत्याशी उतार रही है और चुनाव होगा। ऐसे में असंतुष्ट नजर आने वाले कई बसपा विधायक भी पार्टी प्रत्याशी के पक्ष में आ गए थे, मगर जब भाजपा ने सर्वाधिक अतिरिक्त वोट होने के बावजूद नौवां प्रत्याशी नहीं उतारा तो भाजपा विरोधी वोटों से सीट निकालने वाले विधायकों को अपना सियासी भविष्य संकट में नजर आने लगा। उन्हें अंदाजा हो गया कि पार्टी का आंतरिक पैक्ट विपक्षी दलों से न होकर सत्ताधारी दल से हो गया है और जनता में इस मैसेज के बाद उनकी चुनौती बढ़ सकती है। ऐसे में बसपा के आधा दर्जन विधायक खुलकर बगावती तेवर में आ गए। बसपा के लिए यह सबसे बड़ा झटका है।
बहुजन समाज का विश्वास खोने की आशंका
इसका असर आने वाले दिनों में और तेजी से महसूस होने की संभावना है। बसपा इस राज्यसभा चुनाव में अपने प्रत्याशी रामजी गौतम को भले जिता ले, लेकिन बहुजन समाज खासकर अल्पसंख्यक मतों को सहेज पाना मुश्किल साबित हो सकता है। नए समीकरण का पहला असर विधानसभा उपचुनाव में नजर आने से इनकार नहीं किया जा सकता।