{"_id":"5d6e0bdb8ebc3e93dd48d984","slug":"bone-marrow-transplant-in-thalassemia-patient-in-sgpgi","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"पीजीआई का दावाः यूपी में पहली बार थैलेसीमिया के मरीज में बोन मैरो ट्रांसप्लांट, इतना आता है खर्च","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पीजीआई का दावाः यूपी में पहली बार थैलेसीमिया के मरीज में बोन मैरो ट्रांसप्लांट, इतना आता है खर्च
Tue, 03 Sep 2019 04:46 PM IST
Amulya Rastogi
चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ
चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ
Published by: Amulya Rastogi
Updated Tue, 03 Sep 2019 04:46 PM IST
विज्ञापन
पीजीआई
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
संजय गांधी पोस्टग्रेजुएट इंस्टीट्यूट (एसजीपीजीआई) में थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे में बोन मैरो ट्रांसप्लांट (बीएमटी) शुरू हो गया है। हमीरपुर निवासी चार साल के बच्चे में किया गया प्रत्यारोपण पूरी तरह सफल रहा है। पीजीआई का दावा है कि थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे में प्रदेश में पहली बीएमटी हुई है। हमीरपुर जिले के राठ निवासी चार साल के बच्चे के सालभर का होने के बाद थैलेसीमिया से पीड़ित होने की जानकारी मिली।
विज्ञापन
वह वर्ष 2015 में पीजीआई पहुंचा। इसे बोन मैरो ट्रांसप्लांट की जरूरत थी, जिसमें करीब 10 लाख का खर्चा आता। परिवारीजनों की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी। इसी बीच कोल इंडिया से पीजीआई को आर्थिक मदद मिली। इस पर बच्चे की बीएमटी करने का निर्णय लिया गया। उसे बीएमटी यूनिट में करीब 15 दिन रखा गया।
विज्ञापन
भाई का बोन मैरो सैंपल मिलने के बाद बीते 15 मई को ट्रांसप्लांट किया गया। हिमोटोलॉजी की विभागाध्यक्ष डॉ. सोनिया नित्यानंद की अगुवाई में डॉ. अंशु गुप्ता व डॉ. संजीव ने ट्रांसप्लांट किया। माहभर अस्पताल में रखने के बाद बच्चे को डिस्चार्ज कर दिया गया। वह स्वस्थ है।
विज्ञापन
एक बच्चे पर 10 लाख का खर्च
डॉक्टर सोनिया
- फोटो : amar ujala
डॉ. सोनिया ने बताया कि एक बच्चे पर करीब 10 लाख का खर्चा आता है। जल्द ही तीन अन्य बच्चों में प्रत्यारोपण की तैयारी है। दूसरे चरण में अन्य बच्चों का भी प्रत्यारोपण किया जाएगा। संस्थान में अब तक 88 बोन मैरो ट्रांसप्लांट हो चुके हैं, लेकिन थैलेसीमिया पीड़ित मरीज का पहली बार किया गया है।
20 बच्चों के प्रत्यारोपण की योजना
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग और कोल इंडिया के बीच दिसंबर 2018 में समझौता हुआ है। थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को बोनमैरो प्रत्यारोपण के लिए कोल इंडिया ने करीब दो करोड़ की मदद देने का वादा किया है। इसके तहत 20 बच्चों का प्रत्यारोपण करने की योजना है।
20 बच्चों के प्रत्यारोपण की योजना
स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग और कोल इंडिया के बीच दिसंबर 2018 में समझौता हुआ है। थैलेसीमिया पीड़ित बच्चों को बोनमैरो प्रत्यारोपण के लिए कोल इंडिया ने करीब दो करोड़ की मदद देने का वादा किया है। इसके तहत 20 बच्चों का प्रत्यारोपण करने की योजना है।
सेंटर बनने से मिल रहा मरीजों को फायदा
प्रतीकात्मक तस्वीर
जानिए, क्या है थैलेसीमिया
डॉ. सोनिया ने बताया कि थैलेसीमिया अनुवांशिक बीमारी है। हीमोग्लोबिन दो तरह के प्रोटीन से बनता है, अल्फा ग्लोबिन और बीटा ग्लोबिन। थैलेसीमिया इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है। इससे लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं। बार-बार रक्त चढ़ाने से मरीज के शरीर में जमा होने वाले लौह तत्व से हृदय, यकृत और फेफड़ों के लिए घातक हो जाता है। यही वजह है कि बोन मैरो प्रत्यारोपण को उपयुक्त माना गया है।
पीजीआई में हिमैटोलॉजी विभाग के तहत बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन यूनिट, स्टेम सेल रिसर्च सेंटर बना है। करीब 41 करोड़ की लागत से तैयार इस सेंटर का उद्घाटन अक्टूबर 2018 में हुआ था। इसमें बीएमटी के लिए नौ बेड और वार्ड के लिए 40 बेड आरक्षित हैं। इस विभाग की सभी सुविधाएं एक ही छत के नीचे मिल रही है।
डॉ. सोनिया ने बताया कि थैलेसीमिया अनुवांशिक बीमारी है। हीमोग्लोबिन दो तरह के प्रोटीन से बनता है, अल्फा ग्लोबिन और बीटा ग्लोबिन। थैलेसीमिया इन प्रोटीन में ग्लोबिन निर्माण की प्रक्रिया में खराबी होने से होता है। इससे लाल रक्त कोशिकाएं नष्ट हो जाती हैं। बार-बार रक्त चढ़ाने से मरीज के शरीर में जमा होने वाले लौह तत्व से हृदय, यकृत और फेफड़ों के लिए घातक हो जाता है। यही वजह है कि बोन मैरो प्रत्यारोपण को उपयुक्त माना गया है।
पीजीआई में हिमैटोलॉजी विभाग के तहत बोन मैरो ट्रांसप्लांटेशन यूनिट, स्टेम सेल रिसर्च सेंटर बना है। करीब 41 करोड़ की लागत से तैयार इस सेंटर का उद्घाटन अक्टूबर 2018 में हुआ था। इसमें बीएमटी के लिए नौ बेड और वार्ड के लिए 40 बेड आरक्षित हैं। इस विभाग की सभी सुविधाएं एक ही छत के नीचे मिल रही है।