आजम खां को सौगात दे गए राज्यपाल कुरैशी
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अपने पूर्ववर्ती टीवी राजेश्वर व बीएल जोशी की आपत्तियों को दरकिनार करते हुए राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी ने सपा के कद्दावर नेता मो. आजम खां के रामपुर स्थित मौलाना मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक का दर्जा दिए जाने संबंधी विधेयक को मंजूरी दे दी।
राजेश्वर और जोशी ने इस विधेयक को इसलिए रोक रखा था क्योंकि इसमें संविधान के अनुसार अल्पसंख्यक दर्जे के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी लिए जाने का प्रावधान नहीं था।
इस विधेयक को लेकर कई वर्षों से आजम खां व राजभवन के बीच रिश्ते तल्ख बने हुए थे। आजम खां अपने जौहर विश्वविद्यालय को माइनॉरिटी दर्जा दिलाना चाहते हैं।
2007 से लंबित था विधेयक
इसके लिए विधानमंडल से विधेयक पास कराकर 2007 में राज्यपाल के पास मंजूरी के लिए भेजा गया था। तब से यह विधेयक लंबित पड़ा था।
विधायी विभाग के सूत्रों का कहना है कि पूर्ववर्ती राज्यपालों ने विधेयक को इस आधार पर रोका था कि इसमें विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक दर्जा देने के लिए राष्ट्रपति की मंजूरी लेने का प्रावधान नहीं था जो संविधान के प्रावधानों के अनुसार जरूरी है।
इसके बजाय विश्वविद्यालय को अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान किए जाने के लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) की अनुमति को आधार बनाया गया है।
दूर हो गईं कानूनी बाधाएं
विधायी मामलों के जानकारों का कहना है कि विवि को अल्पसंख्यक दर्जा प्रदान करने के लिए नियमों में यूजीसी के अनुमोदन की कोई व्यवस्था नहीं है जबकि राज्य सरकार ने इसी आधार पर विवि को अल्पसंख्यक दर्जा देने का विधेयक पास कराया है।
बीएल जोशी के इस्तीफे के बाद उत्तराखंड के राज्यपाल डॉ. कुरैशी को यूपी की भी जिम्मेदारी मिली तो उन्होंने विधानमंडल से पारित हो चुके विधेयक को मंजूरी देकर न सिर्फ जौहर विवि को अल्पसंख्यक दर्जा मिलने में आ रही बाधा को दूर कर दिया बल्कि भविष्य में राजनीतिक वजहों से विश्वविद्यालय पर किसी तरह की आंच न आए इसका भी इंतजाम कर दिया।
अब राज्यपाल की मंजूरी मिलने के बाद जौहर विवि को अल्पसंख्यक दर्जा मिलने की सभी कानूनी बाधाएं दूर हो गई हैं।
दूसरे राज्यपालों ने गलती की
राज्यपाल डॉ. अजीज कुरैशी ने जौहर विश्वविद्यालय विधेयक को मंजूरी देने के फैसले को सही ठहराते हुए कहते हैं कि अगर दूसरे राज्यपालों ने विधेयक को रोककर गलती की तो क्या उसी गलती को वे भी आगे बढ़ाएं?
उनका साफ कहना है कि उन्होंने कुछ भी गलत नहीं किया। उन्होंने विश्वविद्यालय, प्रदेश व अल्पसंख्यक समुदाय के हित में विधेयक को मंजूरी दी है। नाइंसाफी हो रही थी, लिहाजा उन्होंने इंसाफ किया है। पेश है डॉ. कुरैशी से बातचीत के प्रमुख अंश-
सवाल-जौहर विवि विधेयक पिछले कई वर्षों से राजभवन में लंबित था। आपने किस आधार पर मंजूरी दी?
जवाब-यह विधेयक विधानसभा और विधान परिषद में पास हो चुका है। राजभवन में पेंडिंग था। महाधिवक्ता की राय मौजूद थी। मैंने महाधिवक्ता को बुलाकर बातचीत की और संतुष्ट होने के बाद इसे मंजूरी दे दी।
कुरैशी बोले, सब कुछ कानूनी तौर पर किया
सवाल-आपत्ति तो विधेयक में विश्वविद्यालय के अल्पसंख्यक दर्जे के संबंध में प्रावधान को लेकर थी?
जवाब-विश्वविद्यालय अनुदान आयोग दो साल पहले ही जौहर विवि को माइनॉरिटी स्टेटस प्रदान कर चुका है। यह मुद्दा तो खत्म हो चुका है। विधानमंडल ने जिस विधेयक को पास कर दिया उसे गवर्नर को मंजूरी देनी चाहिए थी।
सवाल-क्या सब कुछ कानूनी तौर पर ठीक हुआ है?
जवाब-बिल्कुल। महाधिवक्ता की राय मौजूद है। सब ऑन रिकार्ड है। महाधिवक्ता को बुलाकर बातचीत भी की। मैंने ऐसा कुछ नहीं किया जो नहीं होना चाहिए। जो सही था, वही किया।
सवाल-लेकिन आपके पूर्ववर्ती दो राज्यपालों ने इस पर आपत्ति लगाकर रोक रखा था?
जवाब-क्या मै उनके निर्णय से बंधा हूं या उनका निर्णय मेरे लिए बाध्यकारी हैं? अगर उन्होंने कोई गलत काम किया तो क्या मै भी गलत करूं। मैंने जो कुछ भी किया बिल्कुल सही किया।
विवि, प्रदेश और अल्पसंख्यक समुदाय के हित को ध्यान में रखते हुए किया। मुझे खुशी है कि मैं इसे कर पाया। यह मेरे लिए गौरव की भी बात है। जौहर विश्वविद्यालय के साथ नाइंसाफी हो रही थी, मैंने इस मामले में केवल इंसाफ किया है।