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अतीत भूलकर आगे बढ़ना चाहती है अयोध्या, दर्द बयां करते फफक पड़े कई पीड़ित, दादा को खोने वाली बेटी कर रही डॉक्टरी
Wed, 30 Sep 2020 12:15 AM IST
शाहरुख खान
धीरेंद्र सिंह, अमर उजाला, अयोध्या
धीरेंद्र सिंह, अमर उजाला, अयोध्या
Published by: शाहरुख खान
Updated Wed, 30 Sep 2020 12:15 AM IST
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अयोध्या
- फोटो : amar ujala
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श्रीरामजन्मभूमि परिसर में राममंदिर के लिए नींव की खोदाई चल रही है। मशीनों की आवाज कजियाना मोहल्ला स्थित बाबरी मस्जिद के इमाम रहे अब्दुल गफ्तार के घर तक आ रही है, जहां उनके दो जवान बेटे शाबिर और नाजिर का छह दिसंबर को उपद्रवियों ने कत्ल कर दिया था। सदमे में गफ्तार चाचा भी ज्यादा दिन जिंदा नहीं रहे।
लेकिन, अब नजारा बिल्कुल बदला हुआ है...। इमाम के पोते शाहिद अपनी बेटी से फोन पर बात करते हुए बेहद खुश हैं, आखिर बिटिया ने मेधा का परचम लहराते हुए पिछले साल बीएचयू वाराणसी से एमबीबीएस में प्रवेश जो लिया है। शाहिद कहते हैं कि ई-रिक्शा चलाकर पढ़ाया, पूरे इलाके को उस पर नाज है।
इस विवाद में बेटी का नाम देने से अच्छा नहीं लगेगा। वह कहती हैं कि मंदिर-मस्जिद का झगड़ा हमारी पीढ़ी को पसंद नहीं है। हम सब इंसानियत की सेवा को धर्म मानते हैं। ढांचा ध्वंस के 28 साल पूरे होने में सिर्फ 66 दिन बाकी है। इतने साल की जांच और सुनवाई के बाद अब बुधवार को लखनऊ की विशेष कोर्ट फैसला सुनाने जा रही है।
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इधर, अयोध्या का माहौल बिल्कुल बदला बदला सा है, न कहीं तल्खी दिख रही है न ही सियासतदानों के बीच तकरार के स्वर गूंज रहे हैं। यह बदलाव बरसी पर पिछले साल 9 नवंबर को आए राममंदिर फैसले के बाद मनी छह दिसंबर की बरसी पर दिखने लगा था। तब मुद्दई पक्षकार इकबाल अंसारी ने यौमेगम मनाने से इनकार कर दिया था।
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लेकिन, अब नजारा बिल्कुल बदला हुआ है...। इमाम के पोते शाहिद अपनी बेटी से फोन पर बात करते हुए बेहद खुश हैं, आखिर बिटिया ने मेधा का परचम लहराते हुए पिछले साल बीएचयू वाराणसी से एमबीबीएस में प्रवेश जो लिया है। शाहिद कहते हैं कि ई-रिक्शा चलाकर पढ़ाया, पूरे इलाके को उस पर नाज है।
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इस विवाद में बेटी का नाम देने से अच्छा नहीं लगेगा। वह कहती हैं कि मंदिर-मस्जिद का झगड़ा हमारी पीढ़ी को पसंद नहीं है। हम सब इंसानियत की सेवा को धर्म मानते हैं। ढांचा ध्वंस के 28 साल पूरे होने में सिर्फ 66 दिन बाकी है। इतने साल की जांच और सुनवाई के बाद अब बुधवार को लखनऊ की विशेष कोर्ट फैसला सुनाने जा रही है।
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इधर, अयोध्या का माहौल बिल्कुल बदला बदला सा है, न कहीं तल्खी दिख रही है न ही सियासतदानों के बीच तकरार के स्वर गूंज रहे हैं। यह बदलाव बरसी पर पिछले साल 9 नवंबर को आए राममंदिर फैसले के बाद मनी छह दिसंबर की बरसी पर दिखने लगा था। तब मुद्दई पक्षकार इकबाल अंसारी ने यौमेगम मनाने से इनकार कर दिया था।
अब वे कहते हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद के दावे को खारिज करके राम मंदिर का फैसला दे दिया तो, मुकदमा और सजा का क्या मतलब है। पीएम मोदी और सीएम योगी से हम सब चाहते हैं कि अयोध्या के प्रस्तावित वैश्विक पर्यटन विकास में पीड़ित परिवारों को रोजगार देकर आंसू पोछें।
चाहे 6 दिसंबर को उपद्रव के शिकार यहां के मुसलमान परिवार हों या 2 नवंबर को पुलिस फायरिंग में मारे गए कार सेवक के परिवार। कहते हैं कि पहले की किसी सरकार ने कभी आंसू नहीं पोछा। घर-बार जलाने और लाखों की तबाही के साथ जानमाल के भारी नुकसान के बावजूद मुलायम सरकार ने सिर्फ 2-2 लाख का मुआवजा दिया था।
श्रीराम जन्मभूमि परिसर के ठीक पीछे आलमगंज कटरा मोहल्ले में मिले मोहम्मद अजीज बताते हैं कि 7 दिसंबर को सुबह 6 बजे उपद्रवियों ने उनके वालिद समेत 3 लोगों को मार डाला। कोर्ट को न्याय करना है तो छोटा-मोटा जुर्माना और कुछ दिन की सजा न दे, सीधे दोषियों को फांसी पर लटका दिया जाए। या तो सभी को छोड़ दिया जाए।
पड़ोसी मोहम्मद समी बताते हैं कि उनके भाई को मारा गया था, अब इतने साल बाद कोर्ट की सजा का क्या मतलब है। हमें तो सरकार से दो जून की रोटी की व्यवस्था चाहिए। टेढ़ीबाजार मोहल्ला में में टेलर सलमान की मौत हुई थी, बहन सायराबानो उस दिन का मंजर को याद कर कांप उठती हैं, फफकते हुए कहतीं हैं कि खुदा ऐसा दिन कभी न दिखाए।
चाहे 6 दिसंबर को उपद्रव के शिकार यहां के मुसलमान परिवार हों या 2 नवंबर को पुलिस फायरिंग में मारे गए कार सेवक के परिवार। कहते हैं कि पहले की किसी सरकार ने कभी आंसू नहीं पोछा। घर-बार जलाने और लाखों की तबाही के साथ जानमाल के भारी नुकसान के बावजूद मुलायम सरकार ने सिर्फ 2-2 लाख का मुआवजा दिया था।
श्रीराम जन्मभूमि परिसर के ठीक पीछे आलमगंज कटरा मोहल्ले में मिले मोहम्मद अजीज बताते हैं कि 7 दिसंबर को सुबह 6 बजे उपद्रवियों ने उनके वालिद समेत 3 लोगों को मार डाला। कोर्ट को न्याय करना है तो छोटा-मोटा जुर्माना और कुछ दिन की सजा न दे, सीधे दोषियों को फांसी पर लटका दिया जाए। या तो सभी को छोड़ दिया जाए।
पड़ोसी मोहम्मद समी बताते हैं कि उनके भाई को मारा गया था, अब इतने साल बाद कोर्ट की सजा का क्या मतलब है। हमें तो सरकार से दो जून की रोटी की व्यवस्था चाहिए। टेढ़ीबाजार मोहल्ला में में टेलर सलमान की मौत हुई थी, बहन सायराबानो उस दिन का मंजर को याद कर कांप उठती हैं, फफकते हुए कहतीं हैं कि खुदा ऐसा दिन कभी न दिखाए।
हम सब ने थाना रामजन्मभूमि में भागकर जान बचाई थी। टेढ़ी बाजार में ही प्राइमरी के अध्यापक शौकत उल्लाह और उनके 12 साल के मासूम बेटे टोनी को बेकाबू भीड़ ने मार डाला था। अब 40 साल के हो चुके दूसरे पुत्र परवेज कहते हैं कि जब मस्जिद के विरोध में फैसला आ गया तो अब क्या बोलें..।
उपद्रव में गई थी 18 जानें, सैंकड़ों हुए थे घायल
- तब पॉलीटेक्निक के छात्र रहे टेढ़ीबाजार के समाजसेवी आफाक अहमद उर्फ भोलू ने अपनी छत से बाबरी ध्वंस का पूरा मंजर देखा था। वे कहते हैं कि दोपहर से शाम तक मस्जिद गिराई गई, फिर एक भारी भीड़ ठीक थाना रामजन्मभूमि के पीछे टेढ़ीबाजार मोहल्ले में घुस आई। देखते ही देखते दंगे से कोहराम मच गया।
दो दिन तक हालात बेकाबू रहे। कुल आठ लोग इसी मोहल्ले से मारे गए, जबकि आलमगंज कटरा, कजियाना, कोट आदि मोहल्ले से करीब 18 मौतें हुईं, सैकड़ों घायल हुए। किसी ने एक भी रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई है, बल्कि पुलिस की ओर से बाबरी मस्जिद ढहाने व दंगा मामले की एफआईआर 197/1992 में हत्या-बलवा आदि भी जोड़ा गया
पुलिस ने जिसे गवाह बनाया, उसने गवाही दी। बोले्- न्याय क्या होगा, यह कोर्ट को तय करना है लेकिन यहां की फिजा में अब जहरीली हवाएं नहीं बहती। सब चाहते हैं कि मोदी-योगी दंगा पीड़ितों को नई अयोध्या में रोजगार व तरक्की से जोड़ें। रामराज्य का बड़ा दिल दिखाएं, अभी तक मृतक आश्रितों को सिर्फ मुलायम सरकार में दो लाख रुपये ही मिले हैं।
उपद्रव में गई थी 18 जानें, सैंकड़ों हुए थे घायल
- तब पॉलीटेक्निक के छात्र रहे टेढ़ीबाजार के समाजसेवी आफाक अहमद उर्फ भोलू ने अपनी छत से बाबरी ध्वंस का पूरा मंजर देखा था। वे कहते हैं कि दोपहर से शाम तक मस्जिद गिराई गई, फिर एक भारी भीड़ ठीक थाना रामजन्मभूमि के पीछे टेढ़ीबाजार मोहल्ले में घुस आई। देखते ही देखते दंगे से कोहराम मच गया।
दो दिन तक हालात बेकाबू रहे। कुल आठ लोग इसी मोहल्ले से मारे गए, जबकि आलमगंज कटरा, कजियाना, कोट आदि मोहल्ले से करीब 18 मौतें हुईं, सैकड़ों घायल हुए। किसी ने एक भी रिपोर्ट दर्ज नहीं कराई है, बल्कि पुलिस की ओर से बाबरी मस्जिद ढहाने व दंगा मामले की एफआईआर 197/1992 में हत्या-बलवा आदि भी जोड़ा गया
पुलिस ने जिसे गवाह बनाया, उसने गवाही दी। बोले्- न्याय क्या होगा, यह कोर्ट को तय करना है लेकिन यहां की फिजा में अब जहरीली हवाएं नहीं बहती। सब चाहते हैं कि मोदी-योगी दंगा पीड़ितों को नई अयोध्या में रोजगार व तरक्की से जोड़ें। रामराज्य का बड़ा दिल दिखाएं, अभी तक मृतक आश्रितों को सिर्फ मुलायम सरकार में दो लाख रुपये ही मिले हैं।