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अमर उजाला लघु फिल्म प्रतियोगिता: डॉ. चंद्र प्रकाश बोले- भाषा हमारी संस्कृति की वाहक, यह सिर्फ अभिव्यक्ति के लिए नहीं

Sun, 03 Apr 2022 08:31 PM IST
प्रशांत कुमार न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, लखनऊ Published by: प्रशांत कुमार Updated Sun, 03 Apr 2022 08:31 PM IST
सार

‘हिंदी हैं हम’ अभियान के तहत अमर उजाला लघु फिल्म प्रतियोगिता सम्मान समारोह दीप प्रज्ज्वलन के साथ हुआ। कार्यक्रम में जाने-माने फिल्म निर्देशक डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी मुख्य अतिथि और उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक विशेष अतिथि रहे।

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Amar Ujala Short Films Premiere and Award Ceremony With Director Dr. Chandraprakash Dwivedi Today
मुख्य अतिथि डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमर उजाला लघु फिल्म प्रतियोगिता सम्मान समारोह डालीबाग स्थित गन्ना संस्थान के सभागार में संपन्न हुआ। इस अभियान के तहत आयोजित प्रतियोगिता में एक हजार से अधिक प्रविष्टियां प्राप्त हुई थीं। लखनऊ संस्करण संपादक राजीव सिंह ने मुख्य अतिथि फिल्म निर्देशक डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी, विशेष अतिथि उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक व सभागार में मौजूद सभी लोगों का स्वागत करते हुए कहा कि अभियान को लेकर सभी जिलों में कार्यशालाएं आयोजित की गईं। हिंदी के जरिए युवा अपने भविष्य कैसे संवार सकते हैं, इस बारे में विस्तार से चर्चा की गई। 

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'राष्ट्र निर्माण में भारतीय भाषाओं की भूमिका' पर पद्म श्री डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी का व्याख्यान
मुख्य अतिथि फिल्म निर्देशक पद्म श्री डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने 'राष्ट्र निर्माण में भारतीय भाषाओं की भूमिका' पर व्याख्यान में सबसे पहले कहा कि मुझे 1993-94 में हिंदी की सेवा के लिए सम्मान में दो लोगों को आमंत्रित किया गया था। उनमें स्व. अटल बिहारी वाजपेयी के साथ मैं था। उन्हें यूपी सरकार ने यूएन में उनके हिंदी भाषण के लिए सम्मानित किया था। ये बात कितना आश्चर्यचकित करती है कि हिंदी बोलने के लिए सम्मानित किया जाता है। अटल जी ने वह पुरस्कार राशि हिंदी की सेवा में दान कर दी थी। अटल जी ने एक बात कही थी- एक बार उनकी मुलाकात ब्रिटेन की प्रधानमंत्री मारग्रेट थैचर से हुई। इस दौरान इंदिरा गांधी ने अटल जी का थैचर से यह कहते हुए परिचय कराया कि ये अटल जी हैं, हिंदी में बहुत अच्छा भाषण देते हैं। अटल जी ने कहा कि एक बार ऐसा सोच कर देखें कि अगर मैं ब्रिटेन में हूं और कोई मेरा परिचय उनसे कराए और कहे कि यह मारग्रेट थैचर हैं और बहुत अच्छी अंग्रेजी बोलती हैं, तो कैसा लगेगा। अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा कि अगर हिंदी में हम अपनी बात नहीं कहेंगे तो किस भाषा में कहेंगे।
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हिंदी की एक बहन भी होती है, जिसे मासी कहते हैं
मुझे किसी भी भाषा से कोई शिकायत नहीं है। हम अंग्रेजी से किसी प्रकार की शत्रुता निभा रहे हैं, ऐसा बिल्कुल नहीं है। मां हमें प्यारी होती है, लेकिन हिंदी की एक बहन भी होती है, जिसे मासी कहते हैं। मैं जो महसूस करता हूं कि जैसे ही आप मातृभाषा को खोते जाते हैं, उसके साथ पूरी एक धरोहर खो देते हैं। 
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मेडिकल और देश में तकनीकी शिक्षा मातृ भाषा में क्यों नहीं
मुख्य अतिथि फिल्म निर्देशक पद्म श्री डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने कहा कि हिंदी हमारे देश में अभी भी बहुत बड़े पैमाने पर बोली जाती है। अभी इस बात पर जोर दिया जा रहा है बच्चे को उसकी मातृ भाषा में पढ़ाया जाए। लेकिन उच्च शिक्षा में हमें लगता है कि अंग्रेजी अनिवार्य है। पूरे देश में मेडिकल की पढ़ाई अंग्रेजी में ही होती है। जो भारतीय दूसरे मुल्कों में पढ़ाई के जाते हैं उनको उस देश की भाषा सीखनी होती है। हमारे देश के विद्यार्थी एक वर्ष में उस देश की भाषा सीख लेते हैं। हमारे देश में मेडिकल और तकनीकी शिक्षा मातृ भाषा में क्यों नहीं हो सकती है। व्यस्तता के चलते उप-मुख्यमंत्री चले गए, अगर वह यहां मौजूद होते तो मैं उनसे इस मामले पर प्रकाश डालने के लिए जरूर कहता।

भाषा को बनने में हजारों वर्ष लगते हैं
हम लोगों ने हिंग्लिश में समाचार देना शुरू किया। भाषा को बनने में हजारों वर्ष लगते हैं लेकिन लोगों ने भाषा को ध्वस्त कर दिया। क्या ये भाषा के प्रति अपराध नहीं है। अभी भी दूरदर्शन के समाचारों की भाषा तुलना दुसरों की अपेक्षा बेहतर है। परिवर्तन से पहले जड़ता होती है। कहा कि जितनी सार्वजनिक जगह हैं, वहां पहले अंग्रेजी फिर हिंदी बोली जाती। आखिर पहले हिंदी क्यों नहीं बोली जाती। देश में दिए जाने वाले सम्मान समारोहों में भी पहले अंग्रेजी भाषा बोली जाती है, उसके बाद अंग्रेजी। मैंने प्रण लिया है कि फिल्में हिंदी भाषा में ही लिखूंगा।

भाषा संस्कृति की वाहक है
डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने कहा कि भाषा एक प्रवाह है। आज जो भाषा है कल ऐसी बोली जाएगी, ऐसा भी नहीं है। भाषा कैसी होनी चाहिए इसका प्रमाण मुझे कामसूत्र से मिला। रामकथा लगभग भारत की हर भाषा में लिखी गई है। राम का चरित्र ऐसा है कि भारत की हर भाषा उसे अभिव्यक्त करना चाहती है। भाषा संस्कृति की वाहक है। 

2014 के बाद देश में हुए बदलाव गर्व महसूस कराते हैं
डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने कहा कि ने कहा कि संघर्ष भाषाओं का नहीं है। इस देश में 2014 के बाद देश को ऐसा राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री गृहमंत्री मिला है, जो हिंदी में बोलता है। अगर आप अपनी भाषा में बोलने में हिचकिचाहट नहीं महसूस करेंगे तो ऐसे समारोह की जरूरत नहीं होगी। अपने संबोधन में उन्होंने संत कबीर के दोहे  'सार-सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय' का भी जिक्र किया। साथ ही अपनी आने वाली फिल्म पृथ्वीराज का भी जिक्र किया, जोकि तीन जून को आएगी।

मासूम के सवाल पर डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी का जवाब
नई शिक्षा नीति को लेकर एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि आप जो भी शिक्षा लें, उसमें भारत ज्ञान समाहित होना चाहिए। वहीं सुलेख को लेकर एक बच्ची के सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि स्कूल के दिनों में मेरे अक्षर इतने अच्छे होते थे कि सभी कार्यक्रमों में भाग लेता था। धीरे-धीरे मैंने लिखना बंद किया। उसका परिणाम ये हुआ कि लिखावट बिगड़ गई। इसलिए सुझाव है कि रोज लिखें। 



हिंदी में जो लिखा जाता है वही पढ़ा जाता है
उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने मंच व सभागार में सभी अतिथियों का अभिनंदन करते हुए कहा कि फिल्म निर्देशक डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी ने समाज को सिखाया है कि हमें अपने मूल्यों की रक्षा के लिए सब कुछ त्याग कर देना चाहिए। कहा कि हिंदी का नाम आते ही हमें मां की याद आती है। अंग्रेजी हुकूमत हम पर ऐसी हावी हुई कि हम भारतीयता ही भूलने लगे। हमारी संस्कृति को ध्वस्त करने के बहुत प्रयास किए गए। इतिहास के पन्नों में सब कुछ दर्ज है। लेकिन हाल के वर्षों में भारत ने वो मुकाम बनाया है, जिसकी चर्चा विश्व में होती है। रूस और यूक्रेन युद्ध में भारत की आवाज की चर्चा हो रही है। कई देश भारत के पक्ष का इंतजार कर रहे हैं।

अमर उजाला की इस मुहिम से जुड़ें, अपनी भाषा का और प्रचार-प्रसार करें
हिंदी के लिए अभियान चलाने पड़ रहे हैं। पूरे देश मे इस प्रकार की परंपरा बनानी होगी कि हिंदी फले-फूले। हिंदी का शब्दकोश अनंत है। हिंदी प्रतिदिन कई शब्दों को खुद में शामिल करती है। वहीं, अंग्रेजी में कई उच्चारणों का कोई लिखित तर्क नहीं है। हमारे अंदर इस बात का गर्व होना चाहिए कि हम जो कह रहे हैं, वही सही है। वेद आज भी हमारी संस्कृति को दर्शाते हैं। हमारा सभी से आग्रह है कि अमर उजाला की इस मुहिम से जुड़कर हम सबको अपनी भाषा का और प्रचार-प्रसार करना चाहिए। विज्ञान कितना भी आगे बढ़ जाए लेकिन हमारी संस्कृति सर्वोपरि है। 

‘हिंदी माथे की बिंदी’ सर्वश्रेष्ठ लघु फिल्म
फिल्म मेकर गौरव मिश्रा की लघु फिल्म 'हिंदी माथे की बिंदी' के लिए उनको पांच लाख रुपये का पुरस्कार देकर मुख्य अतिथि उप-मुख्यमंत्री व संपादक राजीव सिंह ने सम्मानित किया। श्रेष्ठ फिल्मों में ‘किताबी कीड़ा’ के लिए शांभव पांडेय, ‘धन्यवाद’ के लिए शिवेंद्र प्रताप सिंह की अनुपस्थिति में प्रशांत कुमार को, ‘गाय’ के लिए अक्षांश योगेश्वर, ‘सुकून’ के लिए नवीन अग्रवाल की अनुपस्थिति में उनके मित्र ऋषि  और ‘मदर टंग’ के लिए यशवर्धन गोस्वामी को एक-एक लाख रुपये पुरस्कार राशि देकर सम्मानित किया गया।

सर्वश्रेष्ठ लघु फिल्म लघु फिल्म- हिंदी माथे की बिंदी
फिल्म मेकर गौरव मिश्रा रेगमाल फिल्म्स के बैनर तले देशभर में एड फिल्म और डॉक्यूमेंट्री फिल्मों के माध्यम से कहानियां सुनाते हैं। गौरव ने व्हिस्लिंग वुड्स मुंबई से फिल्म निर्देशन की पढ़ाई की है। साथ ही लखनऊ से दाना-पानी के नाम से देश के कई राज्यों में सोशल कैंपेन भी चलाते हैं। ‘हिंदी माथे की बिंदी’ नामक फिल्म बनाकर पांच लाख रुपये का सर्वोच्च पुरस्कार जीता है। फिल्म में दिखाया है कि विद्यालय का आखिरी आदमी, जो सिर्फ कक्षाओं को बंद करने, उनकी सार-संभाल और देखभाल करने के लिए है, जब अपने काम को अंजाम देता हुआ अचानक ब्लैक बोर्ड देखता है तो उसके हाथ में आया चॉक उसे सबसे बड़ा शिक्षक बना देता है।

विशेष सम्मान के लिए चयनित लघु फिल्म- मदर टंग
जयपुर और मुंबई स्थित लेखक और फिल्म मेकर हैं यशवर्धन। कॉलेज के दिनों से लेकर अब तक कुल 30 से ज्यादा लघु फिल्में बनाईं, जो मुंबई, यूके और कतर एशियन फेस्टिवल आदि में भी विजेता रह चुकी हैं। आजकल डिज्नी प्लस व हॉट स्टार के लिए बतौर क्रिएटिव डायरेक्टर व लेखक काम कर रहे हैं। यशवर्धन की बनाई पुरस्कृत फिल्म मदर टंग बताती है कि मां की तरह साथ देती है भाषा। मातृभाषा दुनिया की सबसे अनमोल भाषा होती है और सबसे ताकतवर भी।

विशेष सम्मान के लिए चयनित लघु फिल्म- सुकून
उत्तरांचल में जन्मे, राजस्थान में शिक्षित एवं अमेरिका में सॉफ्टवेयर के पेशे में कार्यरत नवीन अग्रवाल बचपन से ही हिंदी कविता, कहानी, लेखन-पठन में रुचि लेते रहे हैं। बदलते समय के साथ फिल्म एवं डिजिटल कथा चित्रों को अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम बना रहे हैं। पुरस्कार के लिए चुनी गई फिल्म सुकून में उनका विषय है कि एक प्रवासी जब दूसरे देश से आता है तो उसका सुकून कहां से आता है।

विशेष सम्मान के लिए चयनित लघु फिल्म- गाय से ज्ञान तक
प्रयागराज से मुंबई पहुंचे और फिल्म सिनेमेटोग्राफर के रूप में अक्षांश योगेश्वर ने खास पहचान बनाई। कई कलात्मक लघु फिल्मों के साथ-साथ कुछ फीचर फिल्मों का फिल्मांकन किया। कई कला संस्थानों से पुरस्कार और सम्मान प्राप्त हैं। कई महत्वपूर्ण धारावाहिकों तथा वेब सीरीज का फिल्मांकन और संपादन किया है। प्रतियोगिता में पुरस्कार के लिए चुनी गई फिल्म ‘गाय से ज्ञान तक’ बताती है कि आगे बढ़ने की होड़ में कई बार हम अपनी संस्कृति की भाषा से दूर हो जाते हैं और हमारी स्थिति हास्यास्पद हो जाती है।

विशेष सम्मान के लिए चयनित लघु फिल्म- धन्यवाद
फिल्मकार, लेखक, पूर्व सिविल सेवक और फिल्म एवं टेलीविजन संस्थान पुणे से प्रशिक्षित हैं शिवेंद्र प्रताप सिंह। नवोदित फिल्म निर्देशक के रूप में शिवेंद्र की पहली फिल्म द पॉपकॉर्न को 42 से ज्यादा देशों में देखा और सराहा गया। इसे कई पुरस्कारों से नवाजा गया है। लखनऊ और मुंबई के बीच में कुछ उल्लेखनीय प्रोजेक्ट पर काम किया है। पुरस्कार के लिए चुनी गई फिल्म ‘धन्यवाद’ का संदेश है कि जिंदगी को सिर्फ शब्द नहीं चाहिए होते हैं, जिंदगी को चाहिए ऐसी भाषा जो दिल को छू ले।

विशेष सम्मान के लिए चयनित लघु फिल्म- किताबी कीड़ा
प्रयागराज से दिल्ली होते हुए मुंबई की राह पकड़ी। पहले एक विज्ञापन एजेंसी के आइडिएशन विभाग में विज्ञापन लिखे। फिर एक प्रतिष्ठित कंटेंट स्टूडियो में सह निर्माता बने। अब स्वतंत्र विषयवस्तु रचनाकार हैं। शांभव की लेखन, संभाषण और हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में गहन रुचि है। उनकी बनाई फिल्म किताबी कीड़ा का सार है ‘एक मशहूर लाइब्रेरी के अमर शब्दों का रस अब एक कीड़ा पीता है। धुरंधर पढ़ाकुओं की राह देखती अद्भुत दुनिया में अब वही रहता है।’


उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक समारोह में पहुंचे
उत्तर प्रदेश के उप-मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने समारोह को लेकर कहा कि अमर उजाला फाउंडेशन सामाजिक कार्यक्रमों में सदैव सहभागी रहता है। इस आयोजन के जरिए अमर उजाला ने हमारी संस्कृति के लिए बेहतरीन काम किया। इससे युवाओं और साहित्य से जुड़े लोगों को मौका मिलेगा। पाठक ने कहा कि हिंदी की बिंदी हमारा अभिमान है। हम सभी को अपनी भाषा पर गर्व करना चाहिए। अमर उजाला को इस आयोजन के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद। 

प्रतियोगिता की विषय वस्तु- हिंदी हैं हम
हिंदी हैं हम, प्रतियोगिता की विषय वस्तु थी, जिस पर दो मिनट की फिल्म बनाकर भेजनी थी। जिन फिल्मों का चयन किया गया है, उनकी एक खास बात ये रही कि ये सभी आम आदमी के बीच के खास विषय हैं।

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