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सीएजी का खुलासा : 20 साल जनरेटर से चला प्लांट, 40 रुपये यूनिट बिजली के बोझ से बंद हुआ एटा का यार्न संयंत्र

Sat, 12 Aug 2023 01:43 PM IST
ishwar ashish अभिषेक गुप्ता, अमर उजाला, लखनऊ
अभिषेक गुप्ता, अमर उजाला, लखनऊ Published by: ishwar ashish Updated Sat, 12 Aug 2023 01:43 PM IST
सार

1997 में स्थापित यार्न संयंत्र सेंट्रल स्लिवर बिजली न मिलने से बंद हो गया। जनरेटर से सयंत्र चलाने में इसके उत्पादों की कीमत काफी ज्यादा थी क्योंकि उसकी लागत का 41 फीसदी हिस्सा तो डीजल का दाम ही था। एक अच्छी खासी इकाई सरकारी लापरवाही के कारण बंद हो गई।
 

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A MSME production unit closed down for not getting electricity.
प्रतीकात्मक तस्वीर

विस्तार

एक अच्छी खासी इकाई किस तरह लापरवाह सरकारी कार्यशैली की भेंट चढ़ती है, इसका उदाहरण है एटा का यार्न संयंत्र सेंट्रल स्लिवर। 1997 में स्थापित यह इकाई 2020 में केवल इसलिए बंद कर दी गई क्योंकि इसे बिजली कनेक्शन नहीं मिल सका। इस दौरान इकाई पूरी तरह जनरेटर पर चलती रही। इससे बिजली की लागत 5 रुपये यूनिट के बजाय 40 रुपये यूनिट हो गई। उत्पादन लागत ज्यादा होने से आखिरकार इकाई पर ताला लग गया।

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केंद्रीय एमएसएमई विभाग के अधीन खादी ग्रामोद्योग आयोग ने एटा में यह इकाई स्थापित की थी। सीएजी ने इसके बंद होने के कारणों की पड़ताल की। इसमें पता चला कि अगर समय रहते बिजली कनेक्शन मिल गया होता तो संयंत्र को बचाया जा सकता था। इस प्लांट की स्थापना 1997 में खादी संस्थानों को मीडियम काउंट रोविंग की आपूर्ति के लिए की गई थी। यूनिट को पावर कॉरपोरेशन ने 1996 में 250 केवीए के स्वीकृत भार के साथ बिजली कनेक्शन दिया था। इसके एवज में सिक्योरिटी के रूप में 16.13 लाख रुपये लिए थे। 1999 में प्लांट ने बिजली आपूर्ति बार-बार बाधित होने से कनेक्शन कटवा दिया। कनेक्शन काटने के बाद प्लांट द्वारा सिक्योरिटी के रूप में जमा 16.13 लाख रुपये भी वापस नहीं किए गए।
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प्रतिस्पर्धा के बीच 100 फीसदी प्लांट डीजल पर चला
बिजली कनेक्शन कटने के बाद पूरा प्लांट डीजल जनरेटर पर चलता रहा। हद तो यह कि एक तरफ बाजार में उत्पादों की कीमत को लेकर गलाकाट प्रतिस्पर्धा थी तो दूसरी तरफ प्लांट 35 से 40 रुपये यूनिट वाली बिजली के दम पर चल रहा था। प्लांट से तैयार उत्पाद की लागत बाजार से बहुत ज्यादा हो गई क्योंकि उसकी कीमत में 41 फीसदी हिस्सा अकेले डीजल का था। डीजल की उच्च लागत को देखते हुए केंद्रीय खादी ग्रामोद्योग आयोग ने पावर कॉरपोरेशन में 11 केवी की स्वतंत्र लाइन का आवेदन किया। कॉरपोरेशन ने पुन: कनेक्शन जोड़ने के लिए 41 लाख रुपये मांगे। 2009 में आयोग ने 50 लाख के अनुदान को मंजूरी दे दी। बाद में कॉरपोरेशन ने सूचित किया कि नई विद्युत लाइन की लागत गलत तरीके से निकाली गई है। अब इसके लिए 95 लाख रुपये देने होंगे। अचानक इसकी लागत दोगुनी बढ़ने से बिजली कनेक्शन फिर नहीं मिल सका।

आयोग ने भी नहीं दिखाई रुचि
आखिरकार 40 रुपये यूनिट बिजली की लागत प्लांट को खा गई। फरवरी 2019 में खादी ग्रामोद्योग आयोग ने इकाई को बंद करने का निर्णय लिया। इकाई के नवीनीकरण के लिए खादी सुधार व विकास कार्यक्रम (केआरडीपी) के तहत आवंटित 7.27 करोड़ रुपये एमएसएमई मंत्रालय को वापस कर कर दिए गए। सीएजी ने कहा कि प्लांट की गुणवत्ता में कमी नहीं थी क्योंकि इसे चलाने के लिए चार संस्थानों ने प्रस्ताव दिया था। ऑडिट में पाया गया कि करीब 3.30 करोड़ से 0.50 मेगावाट क्षमता का सौर संयंत्र स्थापित करने की योजना बनी थी, लेकिन आयोग ने इसका पालन नहीं किया। इसके लिए वापस किए गए 7.27 करोड़ का उपयोग किया जा सकता था। इस तरह प्लांट उच्च लागत के कारण बंद हुआ न कि परिचालन की वजह से। सीएजी ने सवाल उठाए कि इकाई स्थापित होने के 20 साल बाद भी नियमित बिजली कनेक्शन प्राप्त नहीं कर सका।

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