निजी अस्पतालों की आड़ में चल रहे फर्जी मेडिकल स्टोर, रोजाना डकार जाते हैं जीएसटी के लाखों रुपये
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सीएमओ के अधीन 900 से अधिक निजी अस्पतालों का संचालन हो रहा है। इनमें ज्यादातर के पास निजी मेडिकल स्टोर का लाइसेंस नहीं है या फिर उसका रिन्यूवल नहीं हुआ है। यानी ऐसे अस्पतालों ने अवैध तरीके से मेडिकल स्टोर खोल रखे हैं, जहां कंपनी के सप्लायर के जरिये दवाएं पहुंच रही हैं। निजी अस्पताल मरीजों को अस्पताल के पर्चे पर ही मेडिकल स्टोर से खरीदी जाने वाली दवाओं का बिल दे रहे हैं।
सिर्फ मरीज की ही जेब नहीं कटती
दुबग्गा-कुर्सी रोड पर तो खूब अवैध कारोबार
दुबग्गा में करीब 150 निजी अस्पताल, क्लीनिक चल रही हैं। इनमें कुछ बड़े संस्थान को छोड़कर ज्यादातर के पास मेडिकल स्टोर का लाइसेंस नहीं है। इसी तरह गुडंबा कुर्सी रोड, डालीगंज, मड़ियांव आईआईएम रोड, बीकेटी रोड, काकोरी, माल, मलिहाबाद, मोहनलालगंज, गोसाईंगंज के ज्यादातर अस्पतालों में बिना लाइसेंस के मेडिकल स्टोर चल रहे हैं।
इन मेडिकल स्टोरों में जीएसटी तक की कटौती नहीं की जाती। एक अनुमान के मुताबिक अवैध तरीके से चल रहे मेडिकल स्टोरों पर रोजाना औसतन दस हजार रुपये की दवा की बिक्री होती है। इस हिसाब से देखा जाए तो ये रोजाना औसतन दस लाख रुपये जीएसटी का डकार जाते हैं।
विभाग के पास रिकॉर्ड तक नहीं
एफएसडीए के अफसरों के पास निजी अस्पतालों में चल रहे मेडिकल स्टोरों के लाइसेंस का रिकॉर्ड तक नहीं है। ड्रग इंस्पेक्टर बृजेश बताते हैं कि संचालक अस्पताल के नाम से लाइसेंस लेने के बजाए दूसरे नाम से इसे जारी करा लेते हैं। ऐेसे में जांच के बाद ही अवैध मेडिकल स्टोर का पता चलेगा।
सूची तैयार की और भूल गए
सूची तैयार की और भूल गए
इस सवाल का जवाब जानने को आप इन तथ्यों को जान लें। सूत्रों के मुताबिक एफएसडीए ने करीब तीन साल पहले ट्रांसगोमती समेत अन्य इलाकों के निजी अस्पतालों में फर्जी मेडिकल स्टोर की सूची तैयार की थी। अफसर उस सूची पर कार्रवाई की बजाए उसे गायब कर गए।
सवाल- 2 : क्यों नहीं लग रहा मनमानी पर अंकुश
दो ड्रग इंस्पेक्टर के भरोसे अस्पताल
राजधानी में सरकारी और निजी अस्पतालों की दवाओं की जांच दो ड्रग इंस्पेक्टर के भरोसे है। यही नहीं थोक और फुटकर दवाएं बेचने वाले मेडिकल स्टोरों की जांच करने की जिम्मेदारी भी इन्हीं पर है। ऐसे में अस्पतालों में दवाओं की निगरानी भगवान भरोसे है। इनकी गुणवत्ता की भी कोई गारंटी नहीं है।
सवाल -3 : फिर भी, कार्रवाई क्यों नहीं करते अधिकारी?
पहले एक दूसरे पर जवाबदेही टालने से तो बचें
सवाल किए जाने पर असिस्टेंट कमिश्नर ड्रग डीके तिवारी ने जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ते हुए ड्रग इंस्पेक्टर पर मामला डाल दिया। कहा, मुझे लखनऊ के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं है। मामले को लेकर शनिवार को हमने सहायक आयुक्त लखनऊ मंडल ड्रग रमाशंकर से सवाल किए तो उन्होंने कहा कि मैं छुट्टी पर हूं। अभी मेरे पास कोई रिकॉर्ड नहीं है। फाइल देखे बिना कोई जानकारी नहीं दे पाऊंगा। सोमवार को दोबारा कॉल करने पर कहा, निजी अस्पतालों में खुले मेडिकल स्टोर के लाइसेंस का रिकॉर्ड मेरे पास नहीं है, इसकी जानकारी ड्रग इंस्पेक्टर दे पाएंगे।
आठ-दस निजी अस्पतलाओं ने दिया ब्यौरा
निजी अस्पताल में खुले मेडिकल स्टोरों का अलग से रिकॉर्ड नहीं है। सभी थोक-फुटकर दवा विक्रेताओं के लाइसेंस का रिकॉर्ड है। आप सीएमओ कार्यालय से पता कर लें। - बृजेश, ड्रग इंस्पेक्टर,
नए पंजीकरण में मेडिकल स्टोर के लाइसेंस का कॉलम ऑनलाइन होने से इस बार निजी अस्पताल भरकर दे रहे हैं। नए आवेदन में अभी तक महज आठ-दस ने इसका ब्यौरा दिया है। पिछले साल तक पंजीकरण व नवीनीकरण की व्यवस्था ऑफलाइन थी। उस व्यवस्था में मेडिकल स्टोर होने का जिक्र नहीं होता था। - डॉ नरेंद्र अग्रवाल सीएमओ