यूपीः पांचवी के 56 प्रतिशत बच्चे हिंदी में हैं फिसड्डी!
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‘रामपुर में एक मैदान था। वहां कुछ नहीं उगता था। यहां कोई खेलने नहीं जाता था। एक दिन कुछ लोग आए। उन्होंने गांव के लोगों को बुलाया। सबने मिलकर तय किया कि यहां बगीचा बनाया जाए। खाद मंगाकर हर तरह के पौधे लगाए गए। सही समय पर पानी दिया गया। आज यहां एक सुंदर बगीचा है। इसलिए यहां सभी खेलने जाते हैं’।
यह एक छोटा सा पैराग्राफ है जिसे उत्तर प्रदेश के ग्रामीण सरकारी स्कूल की कक्षा 5 में पढ़ रहे 55.9 प्रतिशत बच्चे नहीं पढ़ पाते। दूसरी ओर ग्रामीण इलाकों में 4.1 प्रतिशत बच्चे आज भी स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, जबकि राष्ट्रीय स्तर पर यह औसत 2.9 प्रतिशत है। वहीं कक्षा 5 में पढ़ रहे 8.2 प्रतिशत बच्चे अक्षर भी पढ़ना नहीं जानते। वहीं, देश में इसी कक्षा के 5.7 प्रतिशत बच्चे अक्षर नहीं पढ़ पाते।
असर संस्था की ओर से वर्ष 2014 के लिए मंगलवार को जारी वार्षिक स्टेटस एजूकेशन सैंपल सर्वे रिपोर्ट में यह हकीकत सामने आई। इसमें ग्रामीण भारत में स्कूली शिक्षा और बुनियादी शिक्षण को लेकर अध्ययन किया गया है।
रिपोर्ट में सामने आई पढ़ाई की हकीकत
नई दिल्ली में जारी संस्था की इस दसवीं रिपोर्ट में देश के 585 जिले शामिल किए गए थे, जिनमें 69 जिले यूपी के थे। वहीं देश के 5.7 लाख बच्चों पर यह सैंपल सर्वे किया गया। इनमें उत्तर प्रदेश के 92 हजार बच्चे थे। इस दौरान बच्चों के स्कूल जाने, सरल पाठ पढ़ सकने, बुनियादी गणित को जानने जैसी बातों के बारे में जानकारी जुटाई गई।
प्रदेश में 7 से 16 साल के बच्चों में 7.7 प्रतिशत स्कूल नहीं जा रहे हैं, जबकि देश में यह प्रतिशत 5.6 ही है। 7 से 10 साल के प्रदेश के 2.5 प्रतिशत बच्चे और 3.1 प्रतिशत बच्चियां स्कूल नहीं जातीं। 11 से 14 वर्ष आयु वर्ग में यह प्रतिशत क्रमश: 6.4 और 9.2 है। 15 से 16 वर्ष के 19.4 लड़के और 22.7 प्रतिशत लड़कियां स्कूल नहीं जा पा रही हैं। यह बताता है कि लड़कियों को आज भी स्कूल में भेजने में झिझक बाकी है।
पढ़ना-लिखना कमतर
प्रदेश में 2006 में कक्षा 5 के 37.1 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे, तो 2014 में यह आंकड़ा 44.1 प्रतिशत पर पहुंच गया है। कक्षा पांच के 8.2 प्रतिशत बच्चे अक्षर तक नहीं पढ़ पा रहे तो 18.1 प्रतिशत केवल अक्षर पढ़ सकते हैं, 13.8 प्रतिशत केवल शब्द पढ़ पा रहे हैं।
15.2 प्रतिशत बच्चे ही कक्षा 1 के स्तर का पाठ पढ़ सकते हैं और 44.7 प्रतिशत कक्षा 2 का पाठ सही तरीके से पढ़ सकते हैं। यानी कक्षा 5 में पढ़ रहे 53.3 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 के स्तर से कहीं नीचे हैं। कक्षा आठ के 3.4 प्रतिशत बच्चे एक अक्षर भी नहीं पढ़ सकते तो 9.7 प्रतिशत अक्षर, 8 प्रतिशत शब्द और 13.5 प्रतिशत कक्षा 1 के स्तर का पाठ पढ़ पा रहे हैं। कक्षा 8 के 29.2 प्रतिशत बच्चे कक्षा 2 के स्तर से भी बेहद नीचे पाए गए।
2010 में हुए इसी अध्ययन के अनुसार सरकारी स्कूलों में कक्षा 4 के 46.2 प्रतिशत बच्चे कम से कम कक्षा 1 के स्तर का पाठ पढ़ सकते थे, लेकिन 2014 में यह आंकड़ा महज 26.9 प्रतिशत रह गया। देश के स्तर पर भी यह प्रतिशत 65.5 से घटकर 49.2 रह गया है। यह बताता है कि किस तरह शिक्षा की क्वालिटी को लेकर बातें तो बहुत हो रही हैं, लेकिन क्वालिटी लगातार गिर रही है।
गणित में फिसड्डी होते जा रहे
प्रदेश में वर्ष 2007 में कक्षा 3 के 25 प्रतिशत बच्चे घटाव कर सकते थे, 2014 में यह 23.3 प्रतिशत पाया गया। इसी तरह कक्षा 5 के 29.7 प्रतिशत बच्चे भाग करना जानते थे, अब यह प्रतिशत 25.8 प्रतिशत रह गया है। कक्षा 5 के 5.6 प्रतिशत बच्चों में 9 तक के अंकों की पहचान की समझ तक नहीं है। कक्षा 4 के सरकारी स्कूलों के घटाव कर पाने वाले बच्चों की संख्या 2010 में जहां 32.6 प्रतिशत थी, अब यह घटकर 17.5 प्रतिशत ही रह गई है।
2007 में प्रदेश में कक्षा 5 के 45.5 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी के शब्द पढ़ पाते थे, अब यह संख्या बढ़कर 43.7 प्रतिशत रह गई है। वहीं 2007 में कक्षा 7 के 44.4 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी के वाक्य पढ़ लेते थे, अब यह संख्या घटकर 34 प्रतिशत रह गई है। कक्षा 8 के 8.9 प्रतिशत बच्चे अंग्रेजी के कैपिटल अल्फाबेट्स नहीं जानते हैं।
सर्वे के अनुसार 2010 में सरकारी स्कूलों की कक्षा 5 तक के 50.7 प्रतिशत बच्चे ट्यूशन नहीं जा रहे थे, लेकिन 2014 में यह संख्या 43.8 प्रतिशत रह गई है। दूसरी ओर प्राइवेट स्कूलों में ट्यूशन नहीं लेने वाले इन्हीं कक्षाओं के बच्चों का प्रतिशत 40.4 प्रतिशत से बढ़कर 42.7 प्रतिशत हो गया है।
2006 में यूपी के ग्रामीण क्षेत्रों में 30.3 फीसदी बच्चे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ रहे थे, वहीं 2014 में यह संख्या बढ़कर 51.7 प्रतिशत हो गई है। देश में यह प्रतिशत 20.2 से बढ़कर 34.5 प्रतिशत हुआ है।