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साबरमती ब्लास्ट: 17 साल बाद दोष मुक्त हुआ अजहर, ‘आतंकी’ बनने पर ये बोले पिता

Sun, 21 May 2017 02:16 PM IST
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ
ब्यूरो/अमरउजाला, लखनऊ Updated Sun, 21 May 2017 02:16 PM IST
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2000 sabarmati blast accused gulzar ahmed wani father shares his grief
डेमो प‌िक

करीब 17 साल पहले 14 अगस्त 2000 की रात फैजाबाद से लखनऊ जा रही साबरमती एक्सप्रेस में करीब 11 बजे रौजागांव रेलवे स्टेशन पर बम विस्फोट हुआ था। 

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इस घटना में 11 यात्रियों की मौत हो गई थी वहीं 40 घायल हुए थे। पुलिस व खुफिया एजेंसियों ने इस मामले में जीआरपी बाराबंकी में हत्या, हत्या के प्रयास के अलावा, देशद्रोही गतिविधियों में केस दर्ज किया था। 
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पुलिस ने साजिश रचने के आरोप में गुलजार वानी व सिमी के सक्रिय कार्यकर्ता अहमद मुबीन, मारूफ व मोहम्मद आकिल को पकड़ा था। इन आरोपियों ने वारदात को अयोध्या में विवादित ढांचा विध्वंस करने का बदला बताया था। 
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शनिवार को बाराबंकी सेशन कोर्ट द्वारा बेटे गुलजार वानी को रिहा करने के बाद उसके पिता गुलाम मोहम्मद वानी ने इसे देर से ही सही, पर इंसाफ की जीत बताया है। 

लेकिन उन्हें मलाल इस बात का है कि जब गुलजार 12 साल की उम्र में कश्मीर छोड़ अपना भविष्य बनाने यूपी आया, पहले आजमगढ़ और फिर एएमयू अलीगढ़ में तालीम हासिल की, दो बार नेट पास कर चुका था, ऐसे में उस पर आतंकी होने का आरोप कैसे लग गया? 

यह बातें उनकी समझ से परे हैं। अमर उजाला से बातचीत में गुलाम मोहम्मद ने कहा, उन्हें अपने बेटे के खराब हो चुके 16 वर्षों के लिए किसी सरकार से मुआवजा नहीं चाहिए लेकिन वह चाहेंगे कि अल्लाह की अदालत में इन 16 वर्षों का इंसाफ उन्हें मिले।

ग‌िरफ्तारी के वक्त र‌िसर्च कर रहा था गुलजार

2000 sabarmati blast accused gulzar ahmed wani father shares his grief
ब्लास्ट के बाद साबरमती के कोच की हालत - फोटो : amar ujala
गुलाम मोहम्मद ने बताया कि जब गुलजार को गिरफ्तार किया गया तब वह एएमयू से अरबी में रिसर्च कर रहा था। उसे नेट जेआरएफ के लिए भी चुना गया था। इसी बीच 28 साल की उम्र में सुरक्षा एजेंसियों ने उसे आतंकी बताकर पकड़ लिया। 

कश्मीर में बिजली विभाग में चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी पद से 2013 में रिटायर हुए गुलाम कहते हैं कि गुलजार उनका सबसे बड़ा बेटा है। उसके दो छोटे भाई और तीन बहनें हैं। उन्होंने बड़े बेटे की शिक्षा और उसे आगे बढ़ाने में अपना सब कुछ लगा दिया था।

उम्मीद थी कि वह परिवार का सहारा बनेगा, लेकिन उसकी जवानी और सारी मेहनत छीन ली गई। वह बताते हैं- गुलजार जब पढ़ता था, तब हमारे खर्च कम थे। मगर, उसके जेल जाने के बाद खर्चे बढ़ गए। पुश्तैनी जमीन बेचनी पड़ गई ताकि हम केस लड़ सकें।

हम पर आसमान टूट पड़ा

2000 sabarmati blast accused gulzar ahmed wani father shares his grief
फाइल फोटो
गुलाम बताते हैं कि कश्मीर में गुलजार को कोई नहीं जानता। जब एएमयू में पढ़ाई के दौरान उसे गिरफ्तार कर आतंकी कहा गया तो हमारे परिवार पर जैसे आसमान टूट पड़ा। उन्हें समझ नहीं आया कि क्या करें, बेटे को कैसे आरोपों से मुक्त करवाएं। पूरी लड़ाई 16 साल चली।

गुलाम ने बताया कि रिहाई के बाद वह अपने बेटे को वापस कश्मीर ले जाएंगे। पता नहीं वह शिक्षा में अपना कॅरिअर कैसे बढ़ाएगा, लेकिन अब वे उसे अपने साथ रखेंगे। वे चाहते थे कि गुलजार पढ़ लिखकर इन्सानियत की खिदमत करे लेकिन अब शायद उसके लिए सामान्य जीवन जीना मुश्किल होगा।

अभी रिहाई में समय लगेगा: वकील

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डेमो इमेज - फोटो : Internet

रिहाई मंच के संस्थापक अध्यक्ष व अधिवक्ता मोहम्मद शुएब ने बताया कि गुलजार की लखनऊ जेल से अभी रिहाई नहीं हो सकेगी। 

उसके खिलाफ महाराष्ट्र में भी आतंक के आरोप में एक केस चलाया गया था। इसमें सेशन कोर्ट ने उसे सजा दी थी लेकिन नागपुर हाईकोर्ट ने बाइज्जत बरी कर दिया था। लखनऊ जेल अधिकारियों को उसके बरी होने का प्रमाणित आदेश पिछले महीने दिया गया लेकिन उन्होंने कानून से बंधे होने की बात कहते हुए महाराष्ट्र से ही जेल से रिहाई वारंट जमा करवाने को कहा है। 

ऐसे में संभव है कि गुलजार को नागपुर जेल ले जाया जाए। यहां हाईकोर्ट के आदेशों के आधार पर सेशन कोर्ट में उसकी रिहाई वारंट के लिए प्रार्थना पत्र दिया जाएगा। इसके बाद रिहाई संभव हो सकेगी। सिद्धार्थनगर का अब्दुल मुबीन पहले से ही जमानत पर है।

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