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Hindi News ›   Lifestyle ›   World Environment Day 2021 covid 19 how far we have come in our food and clothing habits in hindi

कोरोना महामारी और पर्यावरण के सबक: खान-पान से लेकर पहनने- ओढ़ने तक कितना दूर रहा पर्यावरण?

Fri, 04 Jun 2021 11:16 PM IST
तेजस्वी मेहता लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: तेजस्वी मेहता Updated Fri, 04 Jun 2021 11:16 PM IST
सार

पर्यावरण और प्रकृति का हमारे रहन-सहन और खान-पान से बहुत पुराना संबंध है लेकिन समय के साथ मानव इस संबंध को पीछे छोड़ते जा रहा है। पहनावे और खान-पान के साथ किया गया बदलाव पर्यावरण और इंसान के लिए नुकसानदायक साबित हो रहा है जिसके कई सारे उदाहरण हमारे सामने हैं। 

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World Environment Day 2021 covid 19 how far we have come in our food and clothing habits in hindi
विश्व पर्यावरण दिवस 2021: आने वाली पीढ़ियों के नुकसान के बारे में तक नहीं सोचा - फोटो : Social Media

विस्तार

मनुष्य की उत्पत्ति से लेकर आजतक खान-पान से लेकर पहनावे तक में कई सारे परिवर्तन हुए हैं लेकिन यदि यह परिवर्तन पर्यावरण और प्रकृति के लिहाज से फलदायक होते तो जीवन की सार्थकता थी लेकिन परिवर्तन ने गलत दिशा को चुना और देखा-देखी की लहर की चपेट में हम सभी इस तरह से आ गए हैं कि हमने खुद के और आने वाली पीढ़ियों के नुकसान के बारे में तक नहीं सोचा। पिछले सालों इस तरह की बातें खूब चर्चा में थीं कि चीन के लोगों द्वारा विभिन्न प्रजातियों के जीव-जंतुओं के सेवन का निष्कर्ष है कोरोना लेकिन यह बात भी आई-गई हो गई, आज बर्ड फ्लू के नए म्यूटेंट की बातें हम सभी के सामने हैं और कल पर्यावरण का कोई नया शाप हमें झेलना हो, किसे ही खबर है। आइए जानते हैं कि पिछले समय हमने अपने खान-पान और पहनावे को किस दिशा में मोड़कर खुद से ही प्रकृति और स्वयं को संकट में डाल दिया है। 

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प्रकृति से थी मनुष्य की शुरुआत
प्राचीन काल में मनुष्य ने जब इस धरती पर रहने की शुरुआत की थी तो पर्यावरण का महत्वपूर्ण अंग अर्थात हमारी प्रकृति ने ही उसे घर और जीवनचर्या दी थी। समय के साथ मस्तिष्क का इस्तेमाल करके इंसान आगे बढ़ता गया और प्रकृति कहीं पीछे रह गई। पाषाणकाल से भी पहले इंसान पेड़ों से फल तोड़ना जानता था जो कि उसका हर दिन का आहार था और कपड़ों के रूप में वो पेड़ों के पत्तों का इस्तेमाल किया करता था। प्रकृति से ही मनुष्य की शुरुआत है। सभ्यता की सभ्यताएं नदियों के किनारे बस गईं क्योंकि हमारे पूर्वज इस बात को भली भांति जानते थे कि जल बिना जीवन और प्रगति दोनों ही संभव नहीं है। 

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विश्व पर्यावरण दिवस 2021: व्रत में भारतीय जड़ से उगने वाली शाक या फलों का सेवन नहीं करते हैं - फोटो : SELF

फल और शाक से जीवन था स्वस्थ 
मनुष्य को जब खेती और पशुपालन का ज्ञान हुआ तब गाय, भैंस का ताजा दूध पीकर, खेतों से ताजा फल और शाक तोड़कर, घी, दही आदि का सेवन करके उसका जीवन चल रहा था। उसे किसी प्रकार का कोई रोग नहीं था। दिनभर खेतों में काम करने के बाद खेत से प्याज और मिर्च तोड़कर रोटी खा लेने से भी उसके शरीर को कोई नुकसान नहीं होता था, वो लंबी आयु जीता था। मौसमी फलों का सेवन उसके शरीर को सभी आवश्यक पोषक तत्व दिया करते थे। 

जीव हत्या का पलटवार भोग रहा है विश्व
शिकार करके मांस का सेवन राजाओं के बीच भारत में प्रचलित हुआ करता था लेकिन यह हर घर में हो, ये हमारे देश में संभव नहीं था और इसकी भी अपनी कुछ मर्यादाएं थीं। सांप, केकड़े, बिच्छु आदि का सेवन विदेशों में प्रचलित है। भारत में तो ऐसे महान धर्म हुए हैं जिन्होंने अपना पेट भरने के लिए जीवाणुओं की हत्या तक को नकार दिया है, यही कारण है कि आज भी व्रत में भारतीय जड़ से उगने वाली शाक या फलों का सेवन नहीं करते हैं। चीन जैसे देश ने जानवर की किसी प्रजाति को नहीं छोड़ा, पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने में कोई कसर नहीं रखी जिसका खामियाजा कोरोना के रूप में पिछले डेढ़ वर्ष से संपूर्ण विश्व भुगत रहा है। 


 

 

 

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विश्व पर्यावरण दिवस 2021: मोटापे जैसी समस्याएं दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है - फोटो : iStock

पैकेज्ड और जंक फूड बीमारियों का है घर
पैकेज्ड और जंक फूड पाश्चात्य सभ्यता की देन है। मैदे से बनी खाद्य सामग्रियों का सेवन बीमारियों को न्योता देता है। छोटे बच्चों में तक डायबिटीज और मोटापे जैसी समस्याएं दिन-ब-दिन बढ़ती जा रही है। इसके पीछे मुख्य कारण है पर्यावरण से दूरी अर्थात फल और ताजा शाक से दूरी और भूख लगने पर मैगी, चिप्स एवं अन्य पैकेज्ड फूड का सेवन। बच्चे ही क्या बड़े भी इन सभी चीजों का सेवन खूब करते हैं जिसका परिणाम हम रक्तचाप, शुगर, पेट संबंधी समस्याओं और मोटापे के रूप में देख ही रहे हैं। आने वाले समय में तो हालात और भी बिगड़ना ही हैं, यदि अब भी समझ नहीं पकड़ी तो। 

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विश्व पर्यावरण दिवस 2021: जीन्स जैसा पहनावा मजदूरों के लिए बनाया गया था - फोटो : सोशल मीडिया

फैशन के नाम पर अन्याय
तरह-तरह के फैब्रिक बनाने के लिए पर्यावरण को न जाने कितना नुकसान पहुंचाया जाता है चमड़े के रूप में उदाहरण हमारे सामने ही है। महात्मा गांधी ने संपूर्ण विश्व को खादी पहनने के लिए सिर्फ इसलिए ही प्रेरित नहीं किया था कि यह शरीर के लिए आरामदायक है बल्कि पर्यावरण को भी खादी से कोई नुकसान नहीं है लेकिन यह सिर्फ खादी केंद्रों तक ही सीमित रह गई है। जीन्स जैसा पहनावा जो कि मजदूरों के लिए बनाया गया था आज फैशन बन चुका है। हमारा शरीर जो कि प्रकृति का हिस्सा है, भीषण गर्मी में भी जीन्स जैसा कपड़ा पहनना क्या उसके साथ अन्याय नहीं है। 

टैटू और पियर्सिंग का ट्रेंड
तरह-तरह की इंक का प्रयोग करके शरीर पर टैटू गुदवाना और पेट की नाभि पर पियर्सिंग करवाना, शरीर के विभिन्न अंगों पर छेद करवाकर अलग-अलग मेटल की जूलरी को उनमें फंसाना शरीर की प्रकृति को नुकसान पहुंचाता है। यह पर्यावरण के नियमों के खिलाफ है। फैशन के नाम पर शरीर को नुकसान पहुंचाना कहां तक सही दिखाई पड़ता है? फैशन के नाम पर किसी भी ट्रेंड का पालन करना प्रकृति के साथ छेड़छाड़ है। 

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