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क्या होगा जब बच्चे पैदा करने के लिए पुरुषों की नहीं पड़ेगी जरूरत?

Sun, 12 Jul 2020 04:11 PM IST
सोनू शर्मा बीबीसी हिंदी
बीबीसी हिंदी Published by: सोनू शर्मा Updated Sun, 12 Jul 2020 04:11 PM IST
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What will change the world when the decision to have children will be made by women
प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay

दुनिया जब से बनी है यहां हर क्षेत्र में मर्दों का ही दबदबा रहा। औरत को हर लिहाज से कमतर और मर्दों के मातहत ही माना गया। मेडिकल साइंस के क्षेत्र में भी जितनी रिसर्च हुई मर्दों को ही केंद्र में रखकर और उन्हीं के नजरिए से हुई हैं। कहना गलत नहीं होगा कि हमने दुनिया को मर्दों के चश्मे से ही देखा और जाना है। 

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बच्चे की पैदाइश के मामले में भी बहुत समय तक यही माना जाता रहा कि मर्द की वजह से ही महिला बच्चा पैदा करने के लायक हो पाती है। औरत का इसमें कोई रोल नहीं, लेकिन नई रिसर्च ने इन सभी दावों को गलत साबित कर दिया है। इनके मुताबिक बहुत सी प्रजातियों में मादाएं बच्चा पैदा करने के लिए बहुत से तरीके अपनाती हैं। 
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मिसाल के लिए महिला की बच्चेदानी अपनी पसंद के शुक्राणु को ही अंडे तक आने देता है। वो स्पर्म की गति को कम या ज्यादा भी करता है। इसी तरह मादा ड्रोसोफिला मक्खियां शुक्राणु को विशेष अंगों में जमा कर सकती हैं। फिर बाद में पसंदीदा नर के साथ इन शुक्राणु का उपयोग कर सकती हैं। 
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आज महिलाओं के पास भी बच्चे पैदा करने या नहीं करने का निर्णय लेने की आजादी है। बाजार में बहुत तरह के गर्भनिरोधक मौजूद हैं। इसके अलावा गर्भपात का विकल्प भी खुला है, लेकिन समाज का ताना-बाना ऐसा है कि महिलाएं इन विकल्पों का इस्तेमाल मर्जी से नहीं कर सकतीं। कई बार मर्द भी महिलाओं को इसकी इजाजत नहीं देते। कभी समाज आड़े आ जाता है तो कभी धर्म और संस्कृति। बहुत से देशों में आज भी गर्भपात कराना असंवैधानिक है। अमेरिका और आयरलैंड जैसे विकसित देशों में भी गर्भपात कराने में कई तरह के कानूनी पेंच हैं। 

प्रजनन के नियंत्रण के तरीकों तक पहुंच बनाने का मतलब ये नहीं है कि वो सभी तरीके अचूक होंगे। बहुत बार गर्भनिरोधक भी विफल हो जाते हैं। सेक्स वर्कर्स पर सुरक्षा के लिए दबाव डाला जाता है। महिलाओं को कब और किन परिस्थितियों में सेक्स करना है, इसमें अक्सर महिलाओं की मर्जी पूरी तरह दरकिनार होती है। अक्सर सेक्स वर्करों का बलात्कार होता है। 

महिलाओं को मर्जी के मर्द और मर्जी से गर्भधारण का अख्तियार मिल जाए तो इससे समाज और महिलाओं, दोनों का भला होगा। समाज में उनका रोल भी बड़ा हो जाएगा। इस बात की भी पूरी संभावना है कि ऐसी महिलाएं उन लोगों के निशाने पर आ जाएंगी जो इस तरह के नियंत्रण के पक्ष में नहीं हैं। आज हम खुद को सभ्य और विकसित समाज कहते हैं, लेकिन सच तो ये है कि हम आज भी ऐसी दुनिया में रहते हैं, जहां महिलाओं का अपने ही शरीर पर अधिकार और नियंत्रण नहीं है। 

अनचाही प्रेगनेंसी

2012 के सबसे ताजा आंकड़ों के मुताबिक दुनिया में हर साल करीब 8.5 करोड़ महिलाएं अपनी मर्जी के खिलाफ गर्भधारण करती हैं। अमेरिका जैसे देशों में तो ये अनुपात और भी ज्यादा है। गैर इरादतन प्रेग्नेंसी से बचने के लिए दुनिया में करीब 50 करोड़ महिलाएं गर्भ निरोधक गोलियां खाती हैं और कई परेशानियां मोल ले लेती हैं। इसमें तनाव, माइग्रेन, चिंता, खून के थक्के जमना जैसी परेशानियां आम बात है। बहुत-सी महिलाएं अनचाही प्रेगनेंसी से बचने के लिए नसबंदी का सहारा लेती हैं, लेकिन ये सबसे ज्यादा खतरनाक है। इसमें महिला की मौत तक हो सकती है। 

कुछ जानकारों का कहना है कि नियंत्रण अपने हाथ में आ जाने के बाद महिलाओं के सेक्स पार्टनर बढ़ जाएंगे और असुरक्षित सेक्स करने से उन्हें तरह-तरह की यौन संक्रमण हो सकते हैं, लेकिन रिसर्च बताती हैं कि ऐसा नहीं है। गर्भनिरोधक तक महिलाओं की पहुंच बन जाने से न सिर्फ अनचाहे गर्भधारण में कमी आई है बल्कि गर्भपात की दर में भी कमी आई है। एक अमेरिकी स्टडी से पता चलता है कि गर्भनिरोधक का सबसे ज्यादा फायदा किशोरियों को हुआ है। उनके गर्भपात में भी भारी गिरावट आई है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक हर साल 2.5 करोड़ महिलाओं का असुरक्षित गर्भपात होता है। 

अक्सर गर्भपात करने वाले अनाड़ी होते हैं। साफ सफाई का ख्याल नहीं रखा जाता जिसकी वजह से कई तरह के संक्रमण हो जाते हैं और बहुतों की मौत हो जाती है। अमेरिका में ऐसी महिलाओं के इलाज के लिए 5.5 करोड़ डॉलर खर्च करने पड़ते हैं। जानकारों का कहना है कि पश्चिमी देशों में गर्भपात कराना बहुत सुरक्षित है। लिहाजा यहां किसी की सेहत को कोई खतरा नहीं होता जबकि लैटिन अमेरिका या सहारा क्षेत्र के अफ्रीकी देशों में गर्भपात का मतलब जान को जोखिम में डालना है। 

अगर गर्भधारण पर महिलाओं का नियंत्रण होगा तो उनकी प्रेगनेंसी भी योजनाबद्ध होगी और अगले नौ महीने तक डॉक्टरों की देखरेख में वो अपना ध्यान भी रखेंगी। अगर वो किसी मेडिकल परेशानी या किसी और वजह से गर्भपात कराना चाहें, तो वो सुरक्षित होगा। साथ ही प्लान्ड प्रेगनेंसी से जन्म दर भी कम होगी। इसका मतलब ये नहीं कि रातों रात आबादी पर नियंत्रण हो जाएगा। बहुत सी महिलाएं अभी भी कई बच्चों की ख्वाहिश रखती हैं। कुछ पर ज्यादा बच्चे पैदा करने का सामाजिक दबाव भी होता है। कई बार लड़के की चाहत में भी ज्यादा बच्चे पैदा कर लिए जाते हैं। 

गर्भधारण का फैसला महिलाएं लें तो क्या होगा?

इन सबके बावजूद अगर महिलाओं का गर्भधारण पर नियंत्रण होगा, तो इससे न केवल महिलाओं को फायदा होगा बल्कि समाज के हित में भी लाभकारी होगा। समय रहते वो अपनी तालीम पूरी कर पाएंगी और कहीं काम करके आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो पाएंगी। उन्हें अपने फैसले लेने की आजादी होगी, जिससे मर्द-औरत के रिश्ते की नई परिभाषा तैयार होगी। 

प्रगतिशील देशों में तो ये बदलाव बहुत ही चमत्कारी साबित होगा। महिलाएं निर्णय लेने की स्थिति में होंगी तो उससे एक सुखी, दयालु और शांतिपूर्ण समाज तैयार होगा। महिलाओं का आत्मविश्वास एक तंदुरूस्त समाज के लिए ऑक्सीजन की तरह है। वो समाज में जितनी ज्यादा जिम्मेदारियां निभाएंगी, समाज उतना ही बेहतर होगा। उनके पास अपने लिए पर्याप्त समय होगा। 

गर्भधारण का फैसला लेने की आजादी होने पर ज्यादा उम्रवाली महिलाएं भी मां बनती नजर आएंगी। वैसे भी महिलाओं की एक बड़ी संख्या अभी भी ज्यादा उम्र में बच्चा पैदा करना पसंद कर रही हैं। अगर महिलाओं को आश्वासन होगा कि वो ज्यादा उम्र होने पर भी मां बन सकती हैं, तो उन पर जल्द से जल्द पहला बच्चा पैदा करने का दबाव नहीं होगा। 

हालांकि जानकार इस संभावना से भी इनकार नहीं करते कि बढ़ती उम्र में मां बनने से कई तरह के खतरे पैदा हो सकते हैं, लेकिन मेडिकल साइंस की तरक्की से उन पर काबू पाया जा सकता है। कम उम्र की तुलना में थोड़ी ज्यादा उम्र में बच्चा पैदा करना ज्यादा सहज है। 

आज मेडिकल साइंस इतनी विकसित है कि स्पर्म को भविष्य में इस्तेमाल के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। महिला जब चाहे इसका इस्तेमाल करके गर्भधारण कर सकती है। उसे आजादी होगी कि वो मर्जी के मर्द का बच्चा अपनी कोख से पैदा कर सकती है, लेकिन जानकारों का कहना है कि हमारा समाज अभी इसके लिए तैयार नहीं है। 

मर्द ये कभी बर्दाश्त ही नहीं कर पाएंगे कि उनकी औरत की कोख किसी और पुरुष के स्पर्म से भरे बल्कि महिलाओं को इस तरह की आजादी मिलने के बाद पुरुष, हर महिला को सिर्फ शक की नजर से देखेंगे। महिलाओं को उनके शरीर और गर्भधारण की आजादी देने के लिए सबसे पहले मर्दों को अपनी सोच बदलनी होगी।  
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