आज पूरा देश स्वामी विवेकानंद की 156वीं जयंती मना रहा है। उनका जन्म 12 जनवरी 1863 में कोलकाता में हुआ था। उनके विचार आज भी युवाओं को प्रेरणा से भर देते हैं।स्वामी विवेकानंद की बातों को सुनकर किसी भी निराश व्यक्ति के जीवन से उदासी दूर हो सकती है।उनके विचार लोगों के मन को अनंत ऊर्जा से भर देते थे।उन्होंने अपने समय में कहा था कि मैं आज जो कुछ भी देकर जा रहा हूं, वह एक हजार वर्षों की खुराक है। आइए आज इस खास मौके पर जानते हैं इस महान प्रतिभा के स्वामी रहे विवेकानंद जी के जीवन से जुड़ी कई अहम बातें जो आपके जीवन को एक नई दिशा देगी।
Swami Vivekananda Jayanti: जब खून से भरा प्याला एक घूंट में पी गए थे स्वामी विवेकानंद
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अंग्रेजी भाषा में इतने माहिर इसलिए थे स्वामी विवेकानंद
स्वामी विवेकानंद का घर का नाम नरेंद्र दत्त था। उनके पिता श्री विश्वनाथ दत्त पाश्चात्य सभ्यता को पसंद करते थे।यही वजह थी कि वो अपने पुत्र नरेंद्र को भी अंग्रजी सिखाकर पाश्चात्य सभ्यता सिखाना चाहते थे।नरेंद्र बचपन से ही बड़े बुद्धिमान थे।उनके मन में बचपन से ही परमात्मा को पाने की प्रबल लालसा थी।यही वजह है कि वो सबसे पहले ब्रह्म समाज की तरफ आकर्षित हुए लेकिन उनके चित्त को वहां संतोष नहीं मिला।सन् 1884 में पिता विश्वनाथ दत्त की मृत्यु के बाद घर का भार नरेंद्र पर पड़ गया था।अत्यंत गरीबी में भी नरेंद्र घर आए अतिथि का बहुत सम्मान करते थे।वो स्वयं भूखे रहकर अतिथि को भोजन कराते, स्वयं बाहर वर्षा में रातभर भीगते-ठिठुरते पड़े रहते और अतिथि को अपने बिस्तर पर सुला देते।
स्वामी विवेकानन्द ने अपना जीवन अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर दिया।
जब गुरु को समर्पित कर दिया जीवन
रामकृष्ण परमहंस की प्रशंसा सुनकर एक बार नरेंद्र उनके पास तर्क करने की इच्छा से पहुंच गए।परमहंसजी ने जैसे ही विवेकानंद को देखा वो जान गए कि ये तो वही शिष्य है जिसका इंतजार उन्हें लंबे समय से था।परमहंसजी की कृपा से स्वामी को आत्म-साक्षात्कार हुआ।संन्यास लेने के बाद स्वामी का नाम विवेकानंद हो गया। जिसके बाद स्वामी विवेकानन्द ने अपना जीवन अपने गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस को समर्पित कर दिया।
जब गुरु को हुआ कैंसर
स्वामी विवेकानन्द के गुरु स्वामी रामकृष्ण परमहंस के शरीर त्यागने से कुछ दिन पहले विवेकानन्द ने खुद की परवाह किए बिना गुरु सेवा में अपना तन-मन लगा दिया। उनके गुरु को कैंसर होने की वजह से उनका गले से थूंक, रक्त, कफ आदि निकलता था। लेकिन विवेकानन्द सबकी सफाई बहुत मन लगाकर करते थे। एक बार परमहंस के एक शिष्य ने उनकी सेवा करते समय घृणा दिखाई। जिसे देखकर विवेकानन्द क्रोध से भर गए और उन्होंने गुरुदेव की प्रत्येक वस्तु के प्रति प्रेम दर्शाते हुए उनके बिस्तर के पास रक्त, कफ आदि से भरी थूकदानी उठाकर पूरी पी गए।
जब एक फकीर ने बचाई थी विवेकानंद की जान
अगस्त 1890 में अपनी हिमालय यात्रा के दौरान स्वामी विवेकानंद और स्वामी अखंडानंद नैनीताल से पैदल अल्मोड़ा की तरफ चले। खैरना से कुछ दूर आगे काकड़ीघाट में पीपल के पेड़ के नीचे स्वामी विवेकानंद तपस्या करने बैठे।यही वो जगह थी जहां उन्हें ज्ञान की प्राप्ति हुई थी।इसके बाद दोनों पैदल अल्मोड़ा के लिए निकल पड़े।अल्मोड़ा से कुछ दूर चलते हुए करबला कब्रिस्तान के पास स्वामी जी भूख और थकान की वजह से अचेत हो गए।जिसके बाद पास में ही रहने वाले एक फकीर ने उन्हें खीरा खिलाया।
खीरा खाते ही स्वामी विवेकानंद अपनी चेतना में लौटे।बताते हैं कि अमेरिका के धर्म सम्मेलन से लौटने के बाद स्वामी विवेकानंद जब दूसरी बार अल्मोड़ा पहुंचे तो उनका अभूतपूर्व स्वागत हुआ।इस दौरान स्वामी जी उस फकीर को भी पहचान गए, जिसने उनकी जान बचाई थी।स्वामी जी उसके पास गए और उसे दो रुपये भी दिए। अल्मोड़ा में स्वामी विवेकानंद दो बार खजांची मोहल्ला में लाला बद्री साह के मेहमान बनकर कुछ दिन रुके।इस घर को देखने आज भी काफी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं।