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भैया दूज 2018: डिजिटल छांव में आजाद होती बहनें 

Fri, 09 Nov 2018 11:33 AM IST
अमर उजाला डेस्क
अमर उजाला डेस्क Updated Fri, 09 Nov 2018 11:33 AM IST
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bhai dooj - फोटो : file photo

रक्षाबंधन हो या भाई-दूज, भारतीय संस्कृति के ये दोनों ही पर्व परिवार के भीतर भाई-बहन के रिश्तों में प्यार और मिठास घोलते हैं। दोनों ही त्योहारों में भाई के लिए बहन की रक्षा, उसकी खुशी और उसके प्रति हर जिम्मेदारी का संकल्प निहित है। बहन भी भाई के प्रति प्रेम, स्नेह और उसकी लंबी उम्र की कामना करती है। दोनों ही पर्व पौराणिक कथाओं, मान्यताओं और हमारी पारंपरिक जीवन की समृद्धि के कथानक हैं। खास बात यह है कि बीते दो दशकों में दोनों ही त्योहार पर बाजार का प्रभाव रहा है तो वहीं दूसरी ओर भाई-बहन के रिश्तों के ये पर्व नई पहचान के साथ मजबूत भी हुए हैं। 

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भाई दूज

विज्ञापन संस्कृति और डिजिटल मीडिया में त्योहार 
बीते एक दशक में महानगरीय जीवनशैली और विशेष रूप से तकनीक ने हमारे सांस्कृतिक पर्वों और परंपराओं को नया आकार भी दिया है। खासतौर पर रक्षाबंधन और भाई-दूज जैसे पर्वों पर विज्ञापन संस्कृति, डिजिटल मीडिया और फिल्मों की बदलती दुनिया का असर साफ दिखार्इ देता है। पहले जहां रक्षाबंधन के भीतर पारिवारिक जीवन की मर्यादा और भावनात्मक संबंधों की प्रगाढ़ता दिखाई देती थी, वहीं विज्ञापन और विशेष रूप से डिजिटल मीडिया ने इसमें सामाजिक यथार्थ के परिदृश्य को भी रेखांकित किया है। इसमें प्रगतिशील सोच और बदलती सोच दिखाई दी। बहनों की केवल भाई पर निर्भरता, उसकी रक्षा और उसे पिता के दायित्व के हस्तांतरण के रूप में देखने का नजरिया एक स्तर पर जाकर बदला। 

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bhai dooj

उत्तर आधुनिक समय में तेजी से बदलती तकनीक और शिक्षा के चलते खुद लड़के भी अपनी बहनों को आत्मनिर्भर, जिम्मेदार, अलर्ट, अपने पैरों पर खड़ी रहने वाली और जमाने के साथ कदमताल करते हुए देखना चाहते हैं। हालांकि यह बदलाव व्यापक नहीं है, लेकिन भाई-बहन के बीच प्यार और स्नेह को बढ़ाती इन परंपराओं के भीतर भाइयों पर रक्षा का भार, बहनों की इच्छाओं पर बंदिश और उसकी आजादी के हनन की परिपाटी बदली जरूर है। रक्षाबंधन और भार्इ-दूज जैसे पर्व बहनों को आगे बढ़ाने, उन्हें अच्छी और बेहतर शिक्षा और निजी जीवन में फैसले देने की आजादी में एक नई भूमिका निभाते हैं। 

बदलाव के बीच भैया दूज और रक्षा बंधन के पर्व 
भाई-दूज और रक्षा बंधन जैसे पारिवारिक संबंधों को मजबूत करने वाले इन पर्वों को डिजिटल मीडिया नई परिभाषा के साथ गढ़ता दिखाई देता है। भारतीय संस्कृति की उत्सवधर्मिता सेलिब्रेशन जैसे शब्दों में फेसबुक, ट्विटर, व्हाट्सएप और इंस्टाग्राम पर पारिवारिक तस्वीरे पर व्यक्तिगत आजादी के साथ भी दिखाई देती है। आत्मनिर्भर, सशक्त और एक जिम्मेदार रिश्ता इन्हीं पर्वों के भीतर से निकलता दिखाई देता है।

हालांकि हमारे देश में एक हिस्सा ऐसा भी है जहां कस्बाई और ग्रामीण जीवन के भीतर ये सुंदर परंपराएं रूढ़ियों में बंधी हैं और इसका खामियाजा लड़कियों ने ज्यादा उठाया है। उनकी निजता का हनन हुआ है और उनकी सामाजिक जीवन की इच्छाओं पर बंदिशें भी लगी हैं। लेकिन बदलाव के इस दौर में भाई-बहन के बीच प्यार बढ़ाते दोनों ही पर्व हमारे सामाजिक और पारिवारिक ढांचे को मजबूत भी प्रदान करते हैं। डिजिटल मीडिया इसमें एक अहम भूमिका निभा रहा है। 

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