भारत की आजादी में कई वीरों का अहम योगदान रहा है। अंग्रेजी हुकूमत से आजादी आसानी से नहीं मिली है, काफी संघर्ष के बाद 15 अगस्त 1947 का वो दिन आया, जब भारत एक स्वतंत्र राष्ट्र बना। भारत की आजादी की लड़ाई काफी वर्षों तक चली। कई वीर सपूतों ने देश में आजादी के लिए क्रांति लाने के लिए गीत भी लिखे थे। अंग्रेजी हुकूमत ने इन गीतों पर पूरी तरह से पांबदी लगा रखी थी और इन गीतों को लिखने वालों का अंग्रेज सरकार ने काफी उत्पीड़न भी किया था। अगली स्लाइड्स में जानिए वे गीत जिन पर अंग्रेजी हुकूमत ने पाबंदी लगा रखी थी...
Indian Independence Day 2020: इन गीतों पर अंग्रेजी हुकूमत ने लगा रखी थी पाबंदी, देशभक्ति के रंग में भर देते हैं ये गीत
देशभगत का प्रलाप- कमल
हमारा हक है हमारी दौलत़ किसी के बाबा का जर नहीं है,
है मुल्क भारत वतन हमारा, किसी की खाला का घर नहीं है।
ये आत्मा तो अजर-अमर है निसार तन-मन स्वदेश पर है
है चीज क्या जेल, गन, मशीनें, कजा का भी हमको डर नहीं है।
न देश का जिनमें प्रेम होवे, दु:खी के दु:ख से जो दिल न रोए,
खुशामदी बन के शान खोए वो खर है हरगिज बशर नहीं है।
हुकूक अपने ही चाहते हैं न कुछ किसी का बिगाड़ते हैं,
तुझे तो ऐ खुदगरज ! किसी की भलाई मद्देनजर नहीं है।
हमारी नस-नस का खून तूने बड़ी सफाई के साथ चूसा,
है कौन-सी तेरी पालिसी वो कि जिसमें घोला जहर नहीं है।
बहाया तूने हैं खूं उसी का, है तेरी रग-रग में अन्न जिसका,
बता दे बेदर्द तू ही हक से, सितम यह है या कहर नहीं है।
जो बेगुनाहों को सताता, कभी न वो सुख से बैठ पाता,
बड़े-बड़े मिट गए सितमगर, तुझे क्या इसकी खबर नहीं है।
वो दिन भी आएगा- गनी
वो दिन भी आएगा जब फिर बहार देखेंगे,
गरीब हिंद को हम ताजदार देखेंगे।
घड़ी वो दूर नहीं, ऐ वतन के शैदाओं!
कि मुल्के हिंद को फिर पुरबहार देखेंगे।
अदू की सख्तियां उल्टा असर दिखाएंगी,
वो गाफिलो को फिर अब होशियार देखेंगे।
बढ़े चलो ऐ जवानों फतह हमारी है,
वतन को जल्द ही बाइख्तियार देखेंगे।
हरीफ सख्तियां कर-करके हार जाएगा,
गली में गांधी के नुसरत का हार देखेंगे।
मिलेगा हिंद को सौराज एक दिन खुर्शीद,
खिजां को देखने वाले बहार देखेंगे।
जलियाँवाला बाग- सरजू
बेगुनाह पर बमों की बेखतर बौछार की,
दे रहे हैं धमकियाँ बंदूक और तलवार की।
बागे-जलियां में निहत्थों पर चलाईं गोलियां,
पेट के बल भी रेंगाया, जुल्म की हद पार की।
हम गरीबों पर किए जिसने सितम बेइंतहा,
याद भूलेगी नहीं उस डायरे-बद्कार की।
या तो हम मर ही मिटेंगे या तो ले लेंगे स्वराज,
होती है इस बार हुज्जत खत्म अब हर बार की।
शोर आलम में मचा है लाजपत के नाम का,
ख्वार करना इनको चाहा अपनी मिट्टी ख्वार की।
जिस जगह पर बंद होगा शेरे-नर पंजाब का,
आबरू बढ़ जाएगी उस जेल की दीवार की।
जेल में भेजा हमारे लीडरों को बेकसूर,
लॉर्ड रीडिंग तुमने अच्छी न्याय की भरमार की।
खूने मजलूमों की सूरत अब तो गहरी धार है,
कुछ दिनों में डूबती आबरू अगियार की।
भारत की आन- रौशन
आन भारत की चली इसको बचा लो अब तो,
कौम के वास्ते दु:ख-दर्द उठा लो अब तो।
देश के वास्ते गर जेल भी जाना पड़े,
शौक से हथकड़ी कह दो कि लगाओ हमको।
है मुखालिफ जो कोई उसका न कुछ खौफ करो,
जेल का डर जो दिलों में है निकालो अब तो।
अब नहीं वक्त कि तकलीफ को महसूस करो,
बोझ जो सिर पर पड़े उसको उठा अब तो।
जो करो दिल से करो, मुल्क की खातिर करो,
बात सच कहता है ‘रोशन’ कि न टालो अब तो।