बुजुर्गों को नहीं अब युवाओं को ज्यादा पड़ने लगे हैं दौरे
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
14 सालों के दौरान इन अस्पतालों की तादाद में 1,961 की बढ़ोत्तरी हुई। विशेषज्ञों का कहना है कि दौरा पड़ने की समस्या के लिए कुछ हद तक स्वास्थ्य के लिहाज से खराब जीवनशैली जिम्मेदार है। हालांकि बढ़ती हुई जनसंख्या और अस्पताल में इलाज के तरीके में बदलाव की भी एक भूमिका है।
उनका कहना है कि दौरा पड़ना अब बुजुर्गों की बीमारी नहीं मानी जानी चाहिए।
मुश्किल हालात
खून के थक्के बनने या मस्तिष्क में रक्तस्राव होने से भी दौरे पड़ते हैं और इससे लंबे समय तक विकलांगता की स्थिति भी हो सकती है। 65 साल से ज्यादा उम्र के लोगों में ऐसी समस्या पाई जाती है लेकिन इस रिपोर्ट के मुताबिक़ युवाओं में इसका जोखिम बढ़ रहा है।
विशेषज्ञों ने राष्ट्रीय स्तर पर साल 2000 से 2014 तक इस समस्या की वजह से अस्पताल में भर्ती हुए मरीजों के आंकड़े का विश्लेषण किया।
30-40 साल के लोगों में यह समस्या ज्यादा देखी जा रही है। वहीं 40-54 उम्र वर्ग की महिलाओं में 2000 के मुकाबले 2014 में दौरा पड़ने के 1,075 अतिरिक्त मामले दर्ज किए गए थे।
किस पर करें नियंत्रण
विशेषज्ञों का कहना है कि मोटापा बढ़ने, गतिहीन जीवन और जंक फूड से खून का थक्का बनने का जोखिम बढ़ा है।
रिपोर्ट के मुताबिक इस समस्या से उबरने वाले मरीज़ों को नौकरी में वापसी करने में मुश्किल हो सकती है और उन्हें अपनी कंपनियों से ज्यादा समर्थन की ज़रूरत होगी।
ब्रिटिश हार्ट फाउंडेशन चैरिटी में डॉ। माइक नैप्टन ने कहा कि युवा पुरुषों और महिलाओं में बढ़ रही यह समस्या चिंता का विषय है।
उन्होंने कहा, "इन निष्कर्षों से यह बात सामने आ रही है कि रक्तचाप और कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने पर ज़ोर दिया जाना चाहिए और 40 साल की उम्र में स्वास्थ्य जांच ज़रूर कराना चाहिए।"