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खूबसूरती में दाग नहीं बनेगी डैमेज आंख, जानिए कैसे

Fri, 07 Feb 2014 10:52 AM IST
धर्मेन्द्र त्यागी/अमर उजाला, आगरा
धर्मेन्द्र त्यागी/अमर उजाला, आगरा Updated Fri, 07 Feb 2014 10:52 AM IST
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new treatment for damage eyes

जन्मजात विकृत या फिर दुर्घटना में डैमेज आंख अब खूबसूरती में दाग नहीं बनेगी। यह विकृति लेटेस्ट सर्जरी विधि ‘पोल टू पोल’ के जरिए ठीक हो सकेंगी।

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पढ़ें - आंखों की लेजर सर्जरी की ये है सही उम्र


मरीज की दुरुस्त आंख को स्कैन कर आर्टिफिशियल आइरिस (आंख की पुतली) तैयार होगा। इंप्लेसमेंट यानी आंख लगाए जाने के बाद दोनों आंखों में न तो कोई अंतर दिखाई देगा और रोशनी भी बरकरार रहेगी।
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अभी तक डैमेज आंख के स्थान पर आर्टिफिशियल आंख लगाई जाती रही है। इसमें रोशनी न होने के साथ ही दोनों आंखों में अंतर भी रहता है। पोल टू पोल विधि में मरीज की आंख को स्कैन कर आंख की हूबहू कृत्रिम आंख तैयार की जा सकेगी।
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इस आंख को लेटेस्ट विधि आर्टिफिशियल आइरिस एंड लेंस इंप्लेसमेंट के जरिए डैमेज आंख की जगह लगाया जाएगा। इटली के विशेषज्ञ डा. चेसैरे फर्लिन ने बताया कि दूसरी आंख को स्कैन कर एक्यूरेंस पुतली तैयार होने से एकदम फिट रहती है। उन्होंने बताया कि यह एकदम लेटेस्ट विधि है और इटली में वह इसके 15 ऑपरेशन कर चुके हैं।

फायदे
- आंखों का ऑरिजनल लुक रहता है।
- चकाचौंध और करकराहट नहीं रहती।
- ऑपरेट आंख में विभेद नहीं किया जा सकता।
- चश्मा या फिर अन्य परहेज की जरूरत नहीं।

60 की उम्र में मिलेगी ‘युवा’ रोशनी
उम्र बढ़ने के साथ ही आंखों की रोशनी कम होना प्राकृतिक है। इसका एक प्रमुख कारण मोतियाबिंद है। लेकिन फेम्टोसेकंड लेजर तकनीक से 60 की उम्र में भी आंखों की चमक युवाओं सरीखी होगी। इस तकनीक से माइक्रो होल कर पुतली से सफेद परत हटाकर टोरिक मल्टीफोकल लेंस लगाते हैं।


ऑपरेशन में टांका, चीरफाड़ जैसे पुराने तरीकों से भी निजात मिलेगी। इस लेंस की खासियत यह है कि नजदीक और दूर देखने के लिए एक ही लेंस का प्रयोग होगा। लेंस सहित ऑपरेशन में तकरीबन 80 हजार खर्च है।

आल इंडिया ऑप्थलमोलोजिकल सोसायटी (एआईओएस) के चेयरमैन डॉ. डी. राममूर्ति ने बताया कि मात्र दो एमएम के चीरे से ही मरीज की आंख ऑपरेट हो सकेगी। कृतिम लेंस ऑरिजनल पुतली की तरह कार्य करेगा और बिना चश्मा मरीज का विजन सामान्य युवाओं जैसा होगा।

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