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देर तक खड़े रहने से पैर सूजें तो मामला है गंभीर
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
Updated Sat, 13 Apr 2013 04:35 PM IST
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अगर आप लंबे समय तक खड़े होकर ही काम करते हैं, देर तक पैर लटकाकर कुर्सी पर बैठते हैं या टाइट जीन्स पहनकर दिन भर भागदौड़ करते हैं तो अब भी समय है, अपनी इन आदतों को बदल लें। नहीं तो लंबे समय तक आपकी ये आदतें आपको वैरिकोज वेन्स का मरीज बना सकती हैं।
जी हां, कुछ लोगों को अक्सर पैरों में दर्द, सूजन, खुजली या चकत्ते की समस्या हो जाती है जिसकी वजह शुरुआत में तो समझ में नहीं आती है, लेकिन आगे चलकर उनकी दिक्कत उन्हें खड़ा होने तक में असमर्थ बना सकती है।
दरअसल, यही समस्या है वैरिकोज वेन्स जो बदलती जीवनशैली की वजह से किसी भी उम्र के लोगों, खासतौर पर महिलाओं में बेहद आम होती जा रही है। नई दिल्ली के फोर्टिस वसंत कुंज अस्पताल में इंटरनेंशनल न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप मूले से जानिए, वैरीकोज वेन्स से जुड़े सभी पहलू।
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क्या है वैरिकोज वेन्स
आमतौर पर हमारे पैर की नसों में तीन से पांच वाल्व होते हैं जो पैरों से रक्त को नीचे से ऊपर हृदय की ओर ले जाने में मदद करते हैं। अगर ये वॉल्व खराब हो जाएं तो रक्त ऊपर की ओर सही तरीके से नहीं चढ़ पाता और पैरों में ही जमा होता जाता है।
इससे पैरों की नसें कमजोर होकर फैलने लगती हैं या फिर मुड़ जाती हैं और पैरों में दर्द, सूजन, खुजली या छाले जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। इनमें बरती गई लापरवाही आगे चलकर आपको चलने लायक तक नहीं छोड़ती।
किसे हो सकती है यह समस्या
यह बीमारी दो तरीके से हो सकती है। पहली तो जन्मजात बच्चों में जिसके बहुत ही कम मामले सामने आते हैं और दूसरी, 20 से ऊपर की उम्र के लोगों को उम्र बढ़ने के साथ-साथ इसका खतरा अधिक होता है। महिलाओं, खासतौर पर गर्भवती महिलाओं को भी यह समस्या अधिक होती है। इसके अलावा, इन स्थितियों में भी इसकी आशंका अधिक रहती है -
- लगातार घंटों तक खड़े रहकर काम करने वाले लोगों में।
- लगातार देर तक पैर लटकाकर कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले लोगों में।
- बहुत अधिक लो राइज या टाइट जीन्स पहनने वाले लोगों में।
- बहुत टाइट बेल्ट लगाने वाले लोगों में।
- ऊंची हील पहनने वाली महिलाओं में।
- बहुत अधिक मोटे लोगों में।
- जो लोग व्यायाम नहीं करते या शारीरिक श्रम कम करते हैं।
- मॉल में सेल्समैन, ट्रैफिक पुलिस, नर्स, डॉक्टर या उन पेशों में जिनमें देर तक खड़े रहना या लगातार पैर लटकाकर बैठना मजबूरी है।
ये हैं लक्षण
इस समस्या की शुरुआत में पैरों में अक्सर दर्द रहता है। आगे चलकर यह पैरों में सूजन, खुजली और छाले जैसी समस्याओं में बदल जाता है। कई बार इसकी अनदेखी के कारण खड़े होने और चलने तक में दिक्कत आ सकती है।
संभव है इलाज
वैरिकोज वेन्स का उपचार इसके चरणों के आधार पर है। शुरुआती दौर में हल्की शिकायत होने पर अक्सर डॉक्टर इससे राहत के लिए स्टॉकिंग्स पहनने और दवाओं से दर्द को कम करने का प्रयास करते हैं। समस्या अधिक हो तो इसके लिए सर्जिकल व नॉन सर्जिकल, दोनों तरह के ट्रीटमेंट अब उपलब्ध हैं।
सर्जिकल ट्रीटमेंट के दौरान ओपन सर्जरी की जाती है जिसमें रोगी तीन से चार हफ्तों तक रिकवर करता है, हालांकि इसमें रिस्क अधिक होता है और यह तकनीक अब पुरानी हो चुकी है। जबकि नॉन सर्जिकल तरीके से रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन नामक प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है।
ओपन सर्जरी के दौरान आमतौर पर 50,000 से 70,000 तक का खर्च आता है जबकि रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन के दौरान रोग की जटिलता के आधार पर 40,000 से 70,000 तक का खर्च आ सकता है।
यहां बदलाव जरूरी
इस रोग से बचाव के लिए आपको अपनी इन आदतों को बदलना होगा -
- लगातार खड़े रहकर या लगातार बैठकर काम करने के बजाय बीच-बीच में ब्रेक लें और शरीर को थोड़ा आराम देते रहें।
- टाइट जीन्स, हाइ हील्स, टाइट बेल्ट आदि से परहेज करें।
- हल्का व्यायाम जरूर करें।
- शारीरिक श्रम और हेल्दी लाइफस्टाइल को रुटीन में शामिल करें।
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जी हां, कुछ लोगों को अक्सर पैरों में दर्द, सूजन, खुजली या चकत्ते की समस्या हो जाती है जिसकी वजह शुरुआत में तो समझ में नहीं आती है, लेकिन आगे चलकर उनकी दिक्कत उन्हें खड़ा होने तक में असमर्थ बना सकती है।
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दरअसल, यही समस्या है वैरिकोज वेन्स जो बदलती जीवनशैली की वजह से किसी भी उम्र के लोगों, खासतौर पर महिलाओं में बेहद आम होती जा रही है। नई दिल्ली के फोर्टिस वसंत कुंज अस्पताल में इंटरनेंशनल न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रदीप मूले से जानिए, वैरीकोज वेन्स से जुड़े सभी पहलू।
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क्या है वैरिकोज वेन्स
आमतौर पर हमारे पैर की नसों में तीन से पांच वाल्व होते हैं जो पैरों से रक्त को नीचे से ऊपर हृदय की ओर ले जाने में मदद करते हैं। अगर ये वॉल्व खराब हो जाएं तो रक्त ऊपर की ओर सही तरीके से नहीं चढ़ पाता और पैरों में ही जमा होता जाता है।
इससे पैरों की नसें कमजोर होकर फैलने लगती हैं या फिर मुड़ जाती हैं और पैरों में दर्द, सूजन, खुजली या छाले जैसी समस्याएं शुरू हो जाती हैं। इनमें बरती गई लापरवाही आगे चलकर आपको चलने लायक तक नहीं छोड़ती।
किसे हो सकती है यह समस्या
यह बीमारी दो तरीके से हो सकती है। पहली तो जन्मजात बच्चों में जिसके बहुत ही कम मामले सामने आते हैं और दूसरी, 20 से ऊपर की उम्र के लोगों को उम्र बढ़ने के साथ-साथ इसका खतरा अधिक होता है। महिलाओं, खासतौर पर गर्भवती महिलाओं को भी यह समस्या अधिक होती है। इसके अलावा, इन स्थितियों में भी इसकी आशंका अधिक रहती है -
- लगातार घंटों तक खड़े रहकर काम करने वाले लोगों में।
- लगातार देर तक पैर लटकाकर कुर्सी पर बैठकर काम करने वाले लोगों में।
- बहुत अधिक लो राइज या टाइट जीन्स पहनने वाले लोगों में।
- बहुत टाइट बेल्ट लगाने वाले लोगों में।
- ऊंची हील पहनने वाली महिलाओं में।
- बहुत अधिक मोटे लोगों में।
- जो लोग व्यायाम नहीं करते या शारीरिक श्रम कम करते हैं।
- मॉल में सेल्समैन, ट्रैफिक पुलिस, नर्स, डॉक्टर या उन पेशों में जिनमें देर तक खड़े रहना या लगातार पैर लटकाकर बैठना मजबूरी है।
ये हैं लक्षण
इस समस्या की शुरुआत में पैरों में अक्सर दर्द रहता है। आगे चलकर यह पैरों में सूजन, खुजली और छाले जैसी समस्याओं में बदल जाता है। कई बार इसकी अनदेखी के कारण खड़े होने और चलने तक में दिक्कत आ सकती है।
संभव है इलाज
वैरिकोज वेन्स का उपचार इसके चरणों के आधार पर है। शुरुआती दौर में हल्की शिकायत होने पर अक्सर डॉक्टर इससे राहत के लिए स्टॉकिंग्स पहनने और दवाओं से दर्द को कम करने का प्रयास करते हैं। समस्या अधिक हो तो इसके लिए सर्जिकल व नॉन सर्जिकल, दोनों तरह के ट्रीटमेंट अब उपलब्ध हैं।
सर्जिकल ट्रीटमेंट के दौरान ओपन सर्जरी की जाती है जिसमें रोगी तीन से चार हफ्तों तक रिकवर करता है, हालांकि इसमें रिस्क अधिक होता है और यह तकनीक अब पुरानी हो चुकी है। जबकि नॉन सर्जिकल तरीके से रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन नामक प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता है।
ओपन सर्जरी के दौरान आमतौर पर 50,000 से 70,000 तक का खर्च आता है जबकि रेडियोफ्रीक्वेंसी एब्लेशन के दौरान रोग की जटिलता के आधार पर 40,000 से 70,000 तक का खर्च आ सकता है।
यहां बदलाव जरूरी
इस रोग से बचाव के लिए आपको अपनी इन आदतों को बदलना होगा -
- लगातार खड़े रहकर या लगातार बैठकर काम करने के बजाय बीच-बीच में ब्रेक लें और शरीर को थोड़ा आराम देते रहें।
- टाइट जीन्स, हाइ हील्स, टाइट बेल्ट आदि से परहेज करें।
- हल्का व्यायाम जरूर करें।
- शारीरिक श्रम और हेल्दी लाइफस्टाइल को रुटीन में शामिल करें।