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‘हाय मिर्ची हाय, हाय मिर्ची!’
पुष्पेश पंत, लेखक
Updated Mon, 06 Nov 2017 10:44 AM IST
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मिर्च, मसाले के रूप में ही नहीं, सब्जी की तरह भी इस्तेमाल की जाती है। हैदराबादी मिर्च का सालन हो या गुजराती सांभरिया, इसी की मिसाल है। हरी या लाल मिर्च के अचार के दर्जनों स्थानीय-पारिवारिक नुस्खे हैं, तो बघार या तड़के में मिर्ची का इस्तेमाल बेहद लोकप्रिय है।
दुस्तानी खाने के बारे में विदेशों में यह भ्रम फैला है कि वह बहुत तीखे मसाले वाला होता है और जिगरेवाला ही उसका मजा ले सकता है। दिलचस्प बात यह है कि जो लोग इस बात से परिचित भी हैं कि मिर्च पुर्तगालियों के साथ भारत पहुंची, वह भी यह मान कर चलते हैं कि चार-पांच सौ साल पहले हमारा भोजन मिर्ची के अभाव में नीरस, फीका-फीका ही रहा होगा।
हम यह जाने क्यों भूल जाते हैं कि काली मिर्च ही ‘मरीच’ नाम से जाने जाती थी और स्पेन तथा पुर्तगालवासी इसी स्वादिष्ट मसाले की तलाश में उसकी जन्मभूमि तक पहुंचने के लिए जहाजी बेड़े ले समुद्री लहरों से जूझने निकले थे। पीपली भी कम तीखी नहीं होती। इसके अंग्रेजी नाम का अनुवाद ‘लंबी काली मिर्च’ ही होता है। सौंठ अर्थात् सूखी अदरक का तीखापन कम मजेदार नहीं होता।
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दुस्तानी खाने के बारे में विदेशों में यह भ्रम फैला है कि वह बहुत तीखे मसाले वाला होता है और जिगरेवाला ही उसका मजा ले सकता है। दिलचस्प बात यह है कि जो लोग इस बात से परिचित भी हैं कि मिर्च पुर्तगालियों के साथ भारत पहुंची, वह भी यह मान कर चलते हैं कि चार-पांच सौ साल पहले हमारा भोजन मिर्ची के अभाव में नीरस, फीका-फीका ही रहा होगा।
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हम यह जाने क्यों भूल जाते हैं कि काली मिर्च ही ‘मरीच’ नाम से जाने जाती थी और स्पेन तथा पुर्तगालवासी इसी स्वादिष्ट मसाले की तलाश में उसकी जन्मभूमि तक पहुंचने के लिए जहाजी बेड़े ले समुद्री लहरों से जूझने निकले थे। पीपली भी कम तीखी नहीं होती। इसके अंग्रेजी नाम का अनुवाद ‘लंबी काली मिर्च’ ही होता है। सौंठ अर्थात् सूखी अदरक का तीखापन कम मजेदार नहीं होता।
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बहरहाल, जो बात हमारे लिए लंबे समय से अबूझ पहेली बनी हुई है, वह यह है कि अगर मिर्च पुर्तगाली भारत लाए (तंबाकू, आलू, अमरूद और टमाटर के साथ) तब यह उत्तर-पूर्वी राज्यों एवं भूटान जैसे दुर्गम प्रदेश तक पहुंच कर जनसाधारण के पारंपरिक भोजन का अभिन्न अंग कैसे बन गई? आज विश्व भर में मिर्च के जितने प्रकार (प्रजातियां) दिखलाई देते हैं,
उनमें सबसे तेज ‘नागा मिर्ची-राजा मिर्ची’ को माना जाता है। इसी का एक और नाम ‘भूत झोलकिया’ भी है। भूटान में याक के दूध से बनने वाली पनीर तथा मिर्ची की जुगलबंदी ने वहां के राष्ट्रीय व्यंजन ‘इमा दात्से’ को जन्म दिया है।
यह बात गले के नीचे उतरती नहीं कि जिस दुर्गम भू-भाग के देहाती अंचल तक पहुंचना आज भी बेहद कष्ट साध्य है, वहां मिर्ची के बीज ‘हवा के साथ उड़कर’ गोवा से अराकान के जंगलों की सरहद तक पहुंच गए।
उनमें सबसे तेज ‘नागा मिर्ची-राजा मिर्ची’ को माना जाता है। इसी का एक और नाम ‘भूत झोलकिया’ भी है। भूटान में याक के दूध से बनने वाली पनीर तथा मिर्ची की जुगलबंदी ने वहां के राष्ट्रीय व्यंजन ‘इमा दात्से’ को जन्म दिया है।
यह बात गले के नीचे उतरती नहीं कि जिस दुर्गम भू-भाग के देहाती अंचल तक पहुंचना आज भी बेहद कष्ट साध्य है, वहां मिर्ची के बीज ‘हवा के साथ उड़कर’ गोवा से अराकान के जंगलों की सरहद तक पहुंच गए।
बंगाल में मिर्ची ‘लौंका’ कहलाती है, जो यह सोचने को मजबूर करती है कि यह राई के दाने से कुछ ही बड़ी पर आंखों से पानी और मुंह से सिसकारी छुटाने वाली महारानी यहां पहुंची कहां से? और कैसे इसका नामकरण हुआ?
बहरहाल, आज जब हम अपने खाने में लाल मिर्च के पाउडर का इस्तेमाल करते हैं, तो हमारा ध्यान इस और नहीं जाता कि उसकी छोटे से चम्मच के आईने में भारत की विविधता कैसे प्रतिबिंबित होती है। रंग के लिए उसमें कश्मीरी मिर्ची का एक अंश होता है, तो तीखेपन के लिए नागौरी या गुंटूर की लाल मिर्च हाथ बंटाती है।
जोधपुर वालों के लिए ‘मीठी’ सुवासित मैठानी मिर्च का मुकाबला कोई दूसरी मिर्च नहीं कर सकती, तो कर्नाटक-आंध्र की सरहद पर रहने वालों के लिए बड़गी अपनी लाल मिर्च है। नफासत पसंद नजाकत की नुमाइश में माहिर अवधी बावर्ची लाल नहीं, पीली मिर्च का इस्तेमाल करने की राय
देते हैं।
बहरहाल, आज जब हम अपने खाने में लाल मिर्च के पाउडर का इस्तेमाल करते हैं, तो हमारा ध्यान इस और नहीं जाता कि उसकी छोटे से चम्मच के आईने में भारत की विविधता कैसे प्रतिबिंबित होती है। रंग के लिए उसमें कश्मीरी मिर्ची का एक अंश होता है, तो तीखेपन के लिए नागौरी या गुंटूर की लाल मिर्च हाथ बंटाती है।
जोधपुर वालों के लिए ‘मीठी’ सुवासित मैठानी मिर्च का मुकाबला कोई दूसरी मिर्च नहीं कर सकती, तो कर्नाटक-आंध्र की सरहद पर रहने वालों के लिए बड़गी अपनी लाल मिर्च है। नफासत पसंद नजाकत की नुमाइश में माहिर अवधी बावर्ची लाल नहीं, पीली मिर्च का इस्तेमाल करने की राय
देते हैं।
मिर्च, मसाले के रूप में ही नहीं, सब्जी की तरह भी इस्तेमाल की जाती है। हैदराबादी मिर्च का सालन हो या गुजराती सांभरिया इसी की मिसाल है। हरी या लाल मिर्च के अचार के दर्जनों स्थानीय-पारिवारिक नुस्खे हैं, तो बघार या तड़के में मिर्ची का इस्तेमाल बेहद लोकप्रिय है। जोधपुर में जाने कितनी तरह की मिर्ची मुंह में पानी भर देती हैं,
तो गोवा में ‘पेरी-पेरी’ मसाला मिर्च पर पुर्तगाली मुहर लगता नजर आता है। प्रयोगधर्मी बावर्ची मिर्ची के साथ नए-नए तजुर्बे करने लगे हैं। मिर्च की आइसक्रीम/कुल्फी को पेश कर, जो लोग अपने को आविष्कर्ता समझते हैं, उन्हें याद दिलाने की जरूरत महसूस होती है कि बरसों पहले रामपुर जैसी रियासत में शाही दस्तरखान में ‘मिर्ची का हलवा’ ईजाद किया जा चुका था।
खाने के अलावा हमारी बोलचाल की जबान पर भी मिर्ची चढ़ी हुई है- किसी को मिर्च लगाना हो या मिर्च-मसाला मिला बात का बतंगड़ बनाना। लाल छड़ी मैदान खड़ी ललचाती है। यह गुनगुनाने को मजबूर करती है, हाय मिर्ची! हाय-हाय मिर्ची!
तो गोवा में ‘पेरी-पेरी’ मसाला मिर्च पर पुर्तगाली मुहर लगता नजर आता है। प्रयोगधर्मी बावर्ची मिर्ची के साथ नए-नए तजुर्बे करने लगे हैं। मिर्च की आइसक्रीम/कुल्फी को पेश कर, जो लोग अपने को आविष्कर्ता समझते हैं, उन्हें याद दिलाने की जरूरत महसूस होती है कि बरसों पहले रामपुर जैसी रियासत में शाही दस्तरखान में ‘मिर्ची का हलवा’ ईजाद किया जा चुका था।
खाने के अलावा हमारी बोलचाल की जबान पर भी मिर्ची चढ़ी हुई है- किसी को मिर्च लगाना हो या मिर्च-मसाला मिला बात का बतंगड़ बनाना। लाल छड़ी मैदान खड़ी ललचाती है। यह गुनगुनाने को मजबूर करती है, हाय मिर्ची! हाय-हाय मिर्ची!