टोस्ट हो या पराठे, हर चीज के स्वाद को दोगुना कर देता है मक्खन
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टोस्ट हो या पराठे, मक्खन किसी भी व्यंजन में पड़ जाए तो समझिए मजा दोगुना हो जाता है। मक्खन पीला हो या सफेद उससे जरा भी फर्क नहीं पड़ता। जर्मन और फ्रांसीसी मक्खन तो इतना नायाब समझा जाता है कि उनके नाम के साथ भौगोलिक ‘जन्म स्थान’ का विशेषण जोड़ना कानूनन अनिवार्य है।
भारत के मिथकीय आख्यानों में श्रीकृष्ण के बालस्वरूप का वर्णन ‘माखन चोर’ के रूप में होता रहा है और यह निष्कर्ष निकालना तर्कसंगत है कि हम हिंदुस्तानी मक्खन से सुपरिचित हैं। ‘मैया मोरी, मैं नहीं माखन खायो’ की परिणति यशोदा के ब्रह्मांड दर्शन में होती है और माखन मिस्री का भोग लगया जाता है। यों, हमारे खानपान में घी (घृत) का माहात्म्य सर्वाधिक है, जिसे सर्वोत्तम चिकनाई वाला माना जाता है। पर घी भी आखिर मक्खन को पकाकर ही तो बनाया जाता है!
आम आदमी के मन में मक्खन पश्चिमी उत्पाद है- जिसे ‘टोस्ट’ पर लगाया जाता है। वैसे ‘मक्खन लगाने’ वाला मुहावरा खालिस देसी है। कुछ पीढ़ी पहले तक मक्खन सभी जगह सुलभ नहीं था- टिन में ‘पॉलसन’ जैसे ब्रांड शहरों की फैशनेबल दुकानों में दिखाई देते थे। श्वेत क्रांति के बाद अमूल कंपनी ने इसे लोकप्रिय बनाया। ‘पाश्चराइजेशन’ की प्रक्रिया मक्खन को खराब होने से बचाती है। रेफ्रिजरेशन में सुधार ने भी मक्खन को टिकाऊ बनाया है।
दूध के जल वाले अंश को अलग कर मात्र वसा और ठोस प्रोटीन वाले अंश को ही मक्खन का नाम दिया जा सकता है। जो बचता है वह छाछ है। भले ही यह तंज कसा जाता है ‘माखन तो संत निबटा देते हैं, भक्तों के लिए छूटती है छाछ’ पर यह अपने आप में काफी गुणों से संपन्न रहती है। बॉडी बिल्डर्स नियमित रूप से ‘व्हे’ प्रोटीन का उपयोग करते हैं। कुछ लोग मक्खन से इसलिए कतराते हैं कि कहीं कोलेस्ट्रॉल न बढ़ जाए। परंतु जानकारों का मत है कि कई रिफाइंड तेलों की तुलना में सीमित मात्रा में मक्खन का उपयोग निरापद है।
वैसे मक्खन कोको से भी प्राप्त होता है तथा बादाम और अखरोट के गूदों से भी। जो लोग ‘वीगन’ हैं अर्थात पशुजनित पदार्थ नहीं खाते-पीते, वह इन्हीं मक्खनों का प्रयोग करते हैं। एवोकाडो और नाशपाती जैसे फल को मक्खन फल इसलिए कहते हैं कि उसके गूदे में भी सेहत के लिए फायदेमंद वसा होती है, जो बिल्कुल मक्खन जैसे लगती है।
भारत में ‘नवनीत’ यानी मक्खन बिना दही को मथकर निकाला जाता रहा है- विदेशों में इसे मलाई से अलग कर बनाते हैं। उत्तराखंड के गांवों में आज भी यह ‘नौणी’ की शक्ल में कहीं-कहीं मिल जाता है। पंजाब के गांवों का सफेद मक्खन इसी का सहोदर है, जिसका आनंद पराठे के साथ लिया जाता है।
केक-पेस्ट्री आदि के लिए सफेद मक्खन का इस्तेमाल किया जाता है
पॉपकॉर्न तथा मकई के उबले दानों की कल्पना मक्खन के बिना नहीं की जा सकती। ऐस्पैरागस जैसी नाजुक सब्जियों को सिर्फ जरा से मक्खन में ही बहुत हल्का तलकर पेश किया जाता है। मक्खन पर्याय है रेशम जैसी चिकनाहट का जिसका स्पर्श सुख अनिर्वचनीय है। दाल मखनी अपने नाम से ही इसका संकेत देती है। मक्खन गाय तथा भैंस के दूध से ही नहीं बकरी, याक, ऊंट आदि के दूध से भी तैयार होता है। कुछ जर्मन तथा फ्रांसीसी मक्खन इतने नायाब समझे जाते हैं कि उनके नाम के साथ भौगोलिक ‘जन्म स्थान’ का विशेषण (जियोग्राफिकल इंडिकेटर) जोड़ना कानूनन अनिवार्य है।