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कैंसर टेस्ट कराना है तो मीठा खाएं
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
Updated Fri, 12 Jul 2013 01:53 PM IST
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वैज्ञानिकों को आपका मुंह मीठा कराने का एक हेल्दी बहाना मिल गया है। हाल में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसमें मीठे में मौजूद ग्लूकोज की मदद से कैंसर की जांच हो सकती है।
लंदन कॉलेज के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसमें शरीर द्वारा ग्लूकोज सोखने का परीक्षण करके मैलिजेंट ट्यूमर का पता लगाया जा सकता है। शरीर में मौजूद मैलिजेंट ट्यूमर को ग्लूकोज की आवश्यकता अधिक होती है इसलिए शरीर में ग्लूकोज की खपत तेजी से होती है।
इस विधि में एमआरआई स्कैनर को इस तरह से एडजस्ट किया जाएगा कि वह शरीर द्वारा ग्लूकोज की खपत का रिकॉर्ड ले सके। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह कैंसर के परीक्षण के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली रेडियोएक्टिव तकनीक का प्रभावी विकल्प हो सकती है।
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यह तकनीक 18 महीनों के बाद इस्तेमाल में लाने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाएगी। वरिष्ठ शोधकर्ता प्रोफेसर मार्क लाइथगो के अनुसार, 'हम खुद यह उम्मीद नहीं कर रहे थे कि इस अध्ययन का ऐसा निष्कर्ष हो सकता है। अब महज चॉकलेट या फ्रूट जूस के सेवन के बाद ही कैंसर का परीक्षण हो सकता है। हमने शुरुआती दौर के परीक्षणों में इस विधि से काफी हद तक सफलता पाई है।'
शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन फिलहाल चूहों पर किया है और इसकी सफलता के बाद अब वह इसके अगले चरण पर काम कर रहे हैं। यह शोध जर्नल ऑफ नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है।
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लंदन कॉलेज के शोधकर्ताओं ने एक ऐसी तकनीक विकसित की है जिसमें शरीर द्वारा ग्लूकोज सोखने का परीक्षण करके मैलिजेंट ट्यूमर का पता लगाया जा सकता है। शरीर में मौजूद मैलिजेंट ट्यूमर को ग्लूकोज की आवश्यकता अधिक होती है इसलिए शरीर में ग्लूकोज की खपत तेजी से होती है।
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इस विधि में एमआरआई स्कैनर को इस तरह से एडजस्ट किया जाएगा कि वह शरीर द्वारा ग्लूकोज की खपत का रिकॉर्ड ले सके। वैज्ञानिकों का दावा है कि यह कैंसर के परीक्षण के लिए इस्तेमाल में लाई जाने वाली रेडियोएक्टिव तकनीक का प्रभावी विकल्प हो सकती है।
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यह तकनीक 18 महीनों के बाद इस्तेमाल में लाने के लिए पूरी तरह तैयार हो जाएगी। वरिष्ठ शोधकर्ता प्रोफेसर मार्क लाइथगो के अनुसार, 'हम खुद यह उम्मीद नहीं कर रहे थे कि इस अध्ययन का ऐसा निष्कर्ष हो सकता है। अब महज चॉकलेट या फ्रूट जूस के सेवन के बाद ही कैंसर का परीक्षण हो सकता है। हमने शुरुआती दौर के परीक्षणों में इस विधि से काफी हद तक सफलता पाई है।'
शोधकर्ताओं ने यह अध्ययन फिलहाल चूहों पर किया है और इसकी सफलता के बाद अब वह इसके अगले चरण पर काम कर रहे हैं। यह शोध जर्नल ऑफ नेचर मेडिसिन में प्रकाशित हुआ है।