अमेरिकी शोधकर्ताओं ने बनाया सिलिकॉन आई-मास्क, 20 बार होगा यूज और संक्रमण का खतरा कम
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कोरोना वायरस महामारी से लड़ रहे फ्रंटलाइन चिकित्साकर्मी, डॉक्टर, नर्स और पुलिसकर्मियों को काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा। कोरोना मरीजों का इलाज करने वाले मेडिकल स्टाफ, डॉक्टर और नर्स मास्क, ग्लव्ज और पीपीई किट की कमी की वजह से किसी ना किसी तरीके से इसे दोबारा पहनने के रास्ते ढूंढ रहे थे।
स्टाफ की इन परेशानियों को देखते हुए कुछ वैज्ञानिकों ने ऐसे उत्पाद विकसित किए जिन्हें पर्सनल हाइजीन और पीपीई किट के रूप में बार-बार इस्तेमाल किया जा सकता है। अमेरिका की मैसाच्यूसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) ने कोरोना वायरस से बचने के लिए एक मास्क बनाया है, इसकी खास बात यह है कि सिलिकॉन से बना है।
शोधकर्ताओं का कहना है कि इसे बार-बार उपयोग में लाया जा सकता है। हालांकि शोधकर्ता अभी भी इस बात की पुष्टि करने में लगे हैं कि इस मास्क के इस्तेमाल से वायरस या हानिकारक कणों को प्रभावी रूप से कितना रोक पाता है। लेकिन एक बात साफ है कि इस मास्क को 20 बार उपयोग किया जा सकता है। शोधकर्ताओं ने इसका नाम आई-मास्क (iMASC) रखा है।
सिलिकॉन रबर और 3डी प्रिंटर से बना
इस मास्क को बनाने वाले शोधकर्ताओं का कहना है कि आई-मास्क, एन95 मास्क की तरह ही कोरोना वायरस से सुरक्षा प्रदान करता है। यह बारीक हानिकारक कणों को शरीर में प्रवेश करने से रोकने के लिए एन95 मास्क के फिल्टर का ही इस्तेमाल करता है। मास्क को बनाने के लिए शोधकर्ताओं ने 3डी प्रिंटर का इस्तेमाल किया है।
इस मास्क को एक विशेष सिलिकॉन रबर की मदद से बनाया गया है ताकि इसे बार-बार इस्तेमाल में लाया जा सके। शोधकर्ताओं का कहना है कि मुंह को कवर करने वाले डबल फिल्टर को हर इस्तेमाल के बाद बदला जा सकता है। शोधकर्तांओं ने इस तरह के दोबारा उपयोग में लाए जाने वाले मास्क को इसलिए बनाया क्योंकि बाजार में पीपीई किट और मास्क की भारी कमी हो जाती है।
हाइड्रोडन पेरोक्साइड के उपयोग से किया विकसित
एन-95 मास्क में उपयोग होने वाले फिल्टरिंग कपड़ा बनाने वाले पीटर त्साई और ड्यूक विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओँ ने हाइड्रोजन पेरोक्साइड का इस्तेमाल कर खुद के फिल्टर तकनीक को विकसित किया है। इस नई फिल्टर तकनीक को आई-मास्क में इस्तेमाल किया गया है।
उन्होंने ऑटोक्लेव, स्टीम स्टेरलाइजर, ओवन में रखना, ब्लीज और आइसोप्रोपिल अल्कोहल में भिगोना जैसे तरीकों को शामिल किया है। हर परीक्षण के बाद मास्क में इस्तेमाल की गई सिलिकॉन सामग्री दोबारा इस्तेमाल करने लायक बन गई और संक्रमण का खतरा कम रहा।