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ये है याददाश्त बढ़ाने के साथ सफल होने का जबरदस्त नुस्खा

Fri, 01 Jun 2018 10:54 AM IST
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला
लाइफस्टाइल डेस्क, अमर उजाला Updated Fri, 01 Jun 2018 10:54 AM IST
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Learn HOW to enhance memory and to succeed IN LIFE

याददाश्त बढ़ाने के लिए लोग अक्सर एक ही नुस्खा सुझाते हैं। ज्यादा से ज्यादा याद करने की आदत डालिए। मगर, कई बार सब कुछ छोड़कर, यानी रट लगाना छोड़कर शांत बैठने से भी याददाश्त बढ़ सकती है।

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कोशिश करें कि आप अपने कमरे की रोशनी कम कर दें। आराम से बस लेटे रहें। आंखें बंद कर लें और ख़ुद को रिलैक्स महसूस कराएं। ऐसा करने से भी कई बार आप देखेंगे कि आपने जो कुछ याद करने की कोशिश की है, वो आपको अच्छे से याद रह जाता है।

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आम तौर पर याददाश्त बेहतर करने के लिए यही कहा जाता है कि कम से कम वक्त में हम ज़्यादा से ज़्यादा बातें सीखें, जानें, समझें। मगर, कुछ देर तक बिना किसी खलल के आराम से, शांति से बैठे रहना भी आपकी याददाश्त को तेज कर सकता है। इस दौरान आपका खाली दिमाग, याददाश्त के खजाने को भरता है। आपको इसके लिए आपके दिमाग को पूरा सुकून देना होगा, ताकि वो ख़ुद को रिचार्ज कर सके।

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सुकून के पलों में ई-मेल चेक करना या सोशल मीडिया को खंगालना हमारे दिमाग के सुकून में खलल डालता है। कुछ न करना किसी आलसी छात्र के लिए भले ही एक बहानेबाजी हो। लेकिन जिनकी याददाश्त कमजोर है, उनके लिए ये नुस्खा बेहद कारगर हो सकता है। हम सब के अंदर ये क्षमता होती है कि हम शांत रहकर, खाली बैठे या लेटे रहकर अपनी याददाश्त मजबूत कर सकते हैं।

ये खोज सबसे पहले सन् 1900 में एक जर्मन मनोवैज्ञानिक ज्योर्ग एलियास म्यूलर और उनके शागिर्द अल्पोंस पिल्जेकर ने की थी। याददाश्त जमा करने के अपने तमाम तजुर्बों के तहत पिल्जेकर और म्यूलर ने लोगों से बिना मतलब वाले कुछ शब्द याद कराए। कुछ देर आराम के बाद उन्हें फिर से नए शब्द याद करने को दिए गए। वहीं कुछ लोगों को आराम का मौका नहीं दिया गया।

डेढ़ घंटे बाद जब इन लोगों से पूछा गया, तो दोनों ही समूहों के लोगों के जवाब एकदम अलग थे। जिन्हें ब्रेक दिया गया था, उन्हें पहली सूची के आधे शब्द याद रहे थे। वहीं, जिन्हें बिना ब्रेक के दूसरी लिस्ट थमा दी गई थी, उन्हें पहली सूची के केवल 28 प्रतिशत शब्द याद रहे थे।

साफ है कि हमारा दिमाग लगातार नई चीजें याद नहीं कर पाता। हम दो चीजें याद करने के बीच अगर उसे कुछ आराम दें, तो हमारी याददाश्त बेहतर हो सकती है। इन दो वैज्ञानिकों के तजुर्बे के बाद पिछली करीब एक सदी तक इस तरह के दूसरे रिसर्च भी हुए। साल 2000 की शुरुआत में स्कॉटलैंड की एडिनबरा यूनिवर्सिटी के सर्जियो डेला साला और अमरीकी की मिसौरी यूनिवर्सिटी के नेल्सन कोवान ने एक जबरदस्त रिसर्च की।

ये दोनों ही टीमें ये जानना चाहती थीं कि ब्रेक दिए जाने पर क्या हमारा दिमाग़ ज़्यादा चीजें याद रख पाता है। दोनों ही टीमों ने म्यूलर और पिल्फ़ाइजर के तरीके को आजमाया। उन्होंने अपनी रिसर्च में शामिल लोगों को 15 शब्द दिए और दस मिनट बाद उनसे फिर से उन शब्दों के बारे में पूछा। इस दौरान कुछ लोगों को तो ब्रेक मिला, मगर कुछ को दूसरे रिसर्च में उलझाए रखा गया।

जिन्हें भी आराम का छोटा सा टुकड़ा मिला था, उन्हें लिस्ट के 49 फीसद तक शब्द याद रह गए। जबकि बिना आराम के शब्द बताने वाले सिर्फ़ 14 प्रतिशत लफ़्ज याद रख सके। इसी रिसर्च के तहत लोगों के दो समूहों को एक कहानी सुनाई गई।  इनमें से कुछ को एक घंटे का ब्रेक दिया गया। वहीं, कुछ लोगों को आराम नहीं दिया गया। जिन लोगों को आराम नहीं दिया गया, वो कहानी से जुड़े सवालों के केवल 7 फीसद जवाब सही दे सके। यानी वो 93 फ़ीसद कहानी भूल गए थे। वहीं, आराम का मौका पाने वालों ने कहानी से जुड़े 79 फीसद सवालों के सही जवाब दिए।

यानी आराम की वजह से याददाश्त 11 गुना तक बढ़ गई! सर्जियो डेला साला और नेल्सन कोवान के रिसर्च में शामिल रहीं माइकेला डेवार ने ख़ुद भी बाद में कई तजुर्बे किए हैं। इनमें पता चला है कि अगर हम पढ़ने-लिखने के बीच थोड़ी देर आराम कर लेते हैं। दिमाग को सुकून से रहने देते हैं तो, हमारी याददाश्त काफी बेहतर हो सकती है। इस दौरान याद की गई चीजें काफी वक्त तक हमारे जहन में रहती हैं। ये नुस्खा सिर्फ़ जवां लोगों के लिए नहीं, बल्कि उम्रदराज लोगों के लिए भी कारगर है।

माइकेला डेवार कहती हैं कि आराम के दौरान हमें अपने दिमाग के सुकून में कोई खलल नहीं डालना चाहिए। वरना याददाश्त पर बुरा असर पड़ सकता है। इस दौरान मोबाइल-लैपटॉप का इस्तेमाल न करें। टीवी न देखें। कोशिश करें कि दिमाग में कोई और ख़्याल न आए।

हालांकि अभी ये बात खुलकर साफ नहीं हुई है कि दिमाग स्मृतियों को कैसे सहेजता है। मगर रिसर्च ये बताते हैं कि दिमाग में कोई चीज दर्ज हो जाने के बाद वो अलग-अलग दौर से गुजरती है। इस दौरान उस स्मृति को मजबूती हासिल होती जाती है।

पहले हम ये मानते थे कि आम तौर पर हमारा दिमाग यादों को सोते वक़्त सहेजता है। इस दौरान हमारे दिमाग के हिप्पोकैम्पस और कॉर्टेक्स हिस्से आपस में सूचनाओं का लेन-देन करते हैं। हमारे दिमाग के हिप्पोकैम्पस हिस्से में याददाश्त बनती है।वहीं, कॉर्टेक्स हिस्सा इन्हें सजेह कर रखता है।

शायद यही वजह है कि हम जो चीजें रात में जानते-समझते हैं, वो हमें ज़्यादा याद रह जाती हैं। लेकिन 2010 में न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी की लीला दावाची ने एक रिसर्च में पाया कि याद रखने की ये ख़ूबी सिर्फ़ सोने के दौरान नहीं हासिल होती। हम सुकून के पल सोने के अलावा भी गुजारें, तो हमारी याददाश्त मजबूत होती है।

लीला ने कुछ लोगों को कुछ तस्वीरें और आकृतियां दिखाकर उन्हें थोड़ी देर आराम करने दिया। फिर उन तस्वीरों को फिर याद करने को कहा गया। इस आराम के दौरान भी रिसर्च में शामिल लोगों के दिमाग के हिप्पैकैम्पस और कॉर्टेक्स के बीच संवाद होता देखा गया।

शायद हमारा दिमाग़ सुकून के हर पल का इस्तेमाल याददाश्त को मजबूत करने में करता है। इस दौरान पड़ने वाला कोई भी खलल हमारी याददाश्त को कमजोर ही करता है। इस नुस्खे से अल्ज़ाइमर और दौरे के शिकार लोगों को भी मदद मिल सकती है।

कुछ मनोवैज्ञानिक इन रिसर्च को लेकर काफी उत्साहित हैं। उन्हें लगता है कि ये कई दिमाग़ी बीमारियों के इलाज में कारगर साबित हो सकती हैं। यॉर्क यूनिवर्सिटी के एडियान हॉर्नर इन्हीं लोगों में से एक हैं।

हालांकि हॉर्नर का मानना है कि 'हम ये तय नहीं कर सकते कि कितने ब्रेक से हमारी याददाश्त शानदार हो जाएगी। लेकिन अल्जाइमर बीमारी के शिकार लोगों को आराम के पल देकर हम उनकी काफी मदद कर सकते हैं।

ब्रिटेन की नॉटिंघम ट्रेंट यूनिवर्सिटी के थॉमस बैगुले कहते हैं कि अल्जाइमर के मरीजों को अभी भी ऐसे रेस्ट की सलाह दी जाती है ताकि उनका दिमाग तरो-ताजा महसूस कर सके। हालांकि थॉमस को लगता है कि डिमेंशिया यानी सब कुछ भूल जाने की बीमारी के शिकार लोगों को इससे फायदा नहीं होगा।

कुल मिलाकर, सभी जानकार इस बात पर एक राय रखते हैं कि छोटे-छोटे ब्रेक लेने से हमें नई चीजें सीखने और याद रखने में काफी मदद मिलेगी। इससे छात्रों की ग्रेड 10 से 30 प्रतिशत तक बेहतर हो सकती है। किसी भी सबक को दोबारा याद करने से पहले अगर ब्रेक ले लेते हैं तो, उसे याद रखना ज़्यादा आसान होगा

याद रखिए कि सूचना क्रांति के इस दौर में हमें सिर्फ़ स्मार्टफोन नहीं, बल्कि अपने दिमाग को भी रिचार्ज करने की जरूरत है।

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