Medicine: क्या होती हैं जेनेरिक दवाएं जिसको बढ़ावा देने पर सुप्रीम कोर्ट ने दिया जोर, आम दवाओं से कितनी अलग?
क्या आप जानते हैं कि कई बार जिन दवाओं के लिए आप हजारों रुपये तक खर्च करने के लिए मजबूर होते हैं, उस महंगी दवा का किफायती विकल्प भी है जो उतना ही कारगर है। यहीं से शुरू होता है जेनेरिक और ब्रांडेड मेडिसिन का खेल।
विस्तार
जेनेरिक दवाओं की आपने भी खूब चर्चा सुनी होगी। माना जाता रहा है कि अगर इन दवाओं का इस्तेमाल बढ़ता है तो न सिर्फ लोगों की जेब पर पड़ने वाला भार कम होगा साथ ही बीमारियों के इलाज पर होने वाले खर्च को भी कम किया जा सकेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने भी शुक्रवार को जेनेरिक दवाइयां के इस्तेमाल को बढ़ावा देने की सलाह दी है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा, डॉक्टर अगर सिर्फ जेनेरिक दवाएं लिखना शुरू कर दें तो इससे दवा कंपनियों की घूसखोरी कम या बंद हो सकती है।
सुप्रीम कोर्ट उस याचिका की सुनवाई कर रही थी जिसमें फार्मास्युटिकल मार्केटिंग की समान संहिता पर कानून बनने तक दवा कंपनियों की अनैतिक मार्केटिंग प्रथाओं को नियंत्रित करने की दिशा-निर्देश की मांग की गई थी।
इस पर सुनवाई के दौरान जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संजय करोल और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने कहा कि दवा कंपनियां अत्यधिक और तर्कहीन दवाएं लिखने के लिए डॉक्टर्स पर दबाव बनाती हैं, खास ब्रांड पर जोर देने के लिए रिश्वत की भी पेशकश करती हैं। इसपर अंकुश तभी लगेगा जब डॉक्टर्स के लिए जेनेरिक दवाएं ही लिखने का वैधानिक आदेश आएगा।
अब आपके मन में भी सवाल आ रहा होगा कि आखिर ये जेनेरिक दवाएं क्या हैं और इनके इस्तेमाल को बढ़ाने से किस प्रकार से लोगों को लाभ मिल सकता है?
क्या आप जानते हैं कि कई बार जिन दवाओं के लिए आप हजारों रुपये तक खर्च करने के लिए मजबूर होते हैं, उस महंगी दवा का किफायती विकल्प भी है जो उतना ही कारगर है। यहीं है जेनेरिक और ब्रांडेड मेडिसिन का खेल।
मेडिकल एक्सपर्ट्स बताते हैं कि जेनेरिक दवाएं किसी दवा का मूल रूप होती हैं। अपने ब्रांड वाले नाम की ही तरह इनमें भी वही सॉल्ट होते हैं। हालांकि, ये आमतौर पर ब्रांडेड दवाओं की तुलना में बहुत कम कीमत पर उपलब्ध होती हैं।
जेनेरिक दवाओं के बारे में जानिए
आम तौर पर सभी दवाएं एक तरह का केमिकल सॉल्ट होती हैं। इन्हें शोध के बाद अलग-अलग बीमारियों के लिए बनाया जाता है। जेनेरिक दवा जिस सॉल्ट से बनी होती है, उसी के नाम से जानी जाती हैं।
जेनेरिक दवाइयां या ब्रांडेड दवाइयों में कोई फर्क नहीं होता यह दोनों एक जैसे ही काम करती हैं, फर्क सिर्फ इतना है कि ब्रांडेड दवाइयां महंगी होती हैं क्योंकि उन पर दवा कंपनियों द्वारा मार्केटिंग करने का खर्च शामिल होता है। इसके अलावा उनका रिसर्च एंड डेवलपमेंट का खर्च भी शामिल होता है बल्कि जो जेनेरिक दवाइयां हैं उनमें दवा कंपनियों का सिर्फ बनाने का खर्चा होता है इसलिए वह सस्ती होती हैं।
ब्रांडेड दवाएं और इनकी कीमत
ब्रांडेड दवाएं महंगी होतीं हैं क्योंकि ब्रांडेड दवाई के सॉल्ट का अविष्कार किसी कंपनी द्वारा किया जाता है। जो उसके मूल्य में उसमें अविष्कार का खर्च, उसकी मार्केटिंग का खर्च, डॉक्टरों में दवाई का प्रचार करने का खर्च और उसके अलावा उस दवाई को बनाने के लिए जो उन्होंने पूंजी लगाई उसका ब्याज जुड़ा होता है। इसके अलावा दवाई के मूल्य में अत्यधिक लाभ भी जोड़ा जाता है। इन सबको मिलाने से दवाई का दाम काफी ज्यादा हो जाता है।
जेनेरिक दवाओं को शुरुआती शोध लागत में कमी का भी लाभ मिलता है।
वहीं ब्रांडेड दवाओं को अपनी सुरक्षा और प्रभावकारिता साबित करने के लिए पशुओं और नैदानिक अध्ययनों पर महंगा खर्च करना पड़ता है। इसके लिए ब्रांड उसी दवा की पैकेजिंग को आकर्षक बनाने और उसे बेचने के लिए मार्केटिंग पर भी खर्च करती हैं जिसके कारण इनकी कीमत जेनेरिक की तुलना में अधिक होती है।
क्या जेनेरिक दवाएं भी प्रभावी हैं?
अब सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या जेनेरिक दवाएं भी ब्रांडेड दवाओं की तरह प्रभावी होती हैं?
अमेरिका की ऑफिस ऑफ जेनेरिक ड्रग्स (ओजीडी) के अनुसार सभी स्वीकृत जेनेरिक दवाओं को उनके ब्रांड-नाम के समकक्षों के समान गुणवत्ता, शुद्धता और प्रभावशीलती को पूरा करना चाहिए।
जेनेरिक दवाएं कितनी असरदार होती हैं इसे जानने के लिए एक अध्ययन किया गया जिसमें शोधकर्ताओं ने पाया कि ब्रांडेड और जेनेरिक दवाओं का असर एक समान था। उच्च रक्तचाप, मधुमेह, ऑस्टियोपोरोसिस और अवसाद जैसी समस्याओं में दोनों प्रकार की दवाओं ने एक तरह से काम किया।
उपलब्धता में कमी और मेडिकल मार्केट के दबाव के चलते जेनेरिक दवाएं कम लिखी जा रही हैं, जिसे बढ़ाने को लेकर अब सुप्रीम कोर्ट ने जोर दिया है।
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नोट: यह लेख मेडिकल रिपोर्टस से एकत्रित जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।
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