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शरीर में मौजूद टी-सेल्स वायरस को खत्म करने में होती है मददगार
Sun, 02 Aug 2020 03:48 AM IST
योगेश साहू
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन।
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वॉशिंगटन।
Published by: योगेश साहू
Updated Sun, 02 Aug 2020 03:48 AM IST
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प्रतीकात्मक तस्वीर
- फोटो : Pixabay
कोरोना संक्रमण की चपेट में न आने के बाद भी कुछ लोगों के शरीर में वायरस से लड़ने की क्षमता रहती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि ऐसे लोगों में संक्रमण अगर होता है तो रोग के घातक होने का खतरा कम रहता है।
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जर्मनी में 68 स्वस्थ युवाओं पर हुए शोध में देखने को मिला है कि बिना संक्रमण की चपेट में आए ही उनके शरीर में वायरस से लड़ने की क्षमता है। नेचर जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार वैज्ञानिक उस वक्त हैरान रह गए जब उन्हें पता चला कि इनमें से 35 फीसदी युवाओं के शरीर में टी-सेल्स भी हैं जो वायरस को खत्म करने में मददगार होती है।
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संक्रमण के खिलाफ 'क्रॉस रिएक्टिविटी'
वैज्ञानिकों का तर्क है कि बिना संक्रमण की चपेट में आए लोगों के शरीर में टी-सेल्स की मौजूदगी का मतलब पहले हुए किसी संक्रमण से ये सक्रिय हुई हों जो कोरोना में सुरक्षा दे रही हैं। टी-कोशिका की मेमोरी शरीर में उसी प्रकार के वायरस के प्रवेश करने पर शरीर की इम्यूनिटी को सक्रिय कर देती है जिसे वैज्ञानिक भाषा में ‘क्रॉस-रिएक्टिवटी’ कहते हैं।
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कोरोना के 89 फीसदी मरीजों में टी-सेल्स...
वैज्ञानिक 21 वर्ष से 81 वर्ष की उम्र के 18 कोरोना संक्रमित मरीजों और 20 से 64 वर्ष के स्वस्थ लोगों के रक्त के सैंपल की जांच के बाद इस परिणाम पर पहुंचे हैं। कोरोना के 83 फीसदी मरीजों में टी-कोशिका है। संभव है कि अधिक संख्या में बच्चे और युवा कोरोना संक्रमण की चपेट में इसी कारण नहीं आ रहे, क्योंकि उनके भीतर टी-सेल्स की मौजूदगी पहले से है।
दो तरह की टी-कोशिकाएं रखती हैं सुरक्षित
टी-सेल्स दो तरह की होती हैं। एक को हेल्पर और दूसरी किलर-टी सेल्स। किलर टी-सेल्स संक्रमित हो चुकी कोशिकाओं को खत्म करती है। हेल्पर टी-सेल्स का काम शरीर की इम्यूनिटी के साथ समन्वय स्थापित करना होता है। केमिकल संदेशों के जरिए वो टी-सेल्स को अलर्ट करती है। टी-सेल्स या कोशिकाएं बोन मैरो में होती हैं।