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झारखंड शिक्षक नियुक्ति: झारखंड हाईकोर्ट ने 14 माह की देरी पर खारिज की पुनर्विचार याचिका
Mon, 12 Oct 2026 09:33 PM IST
प्रतीक पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, रांची
Published by: प्रतीक पांडेय
Updated Mon, 12 Oct 2026 09:33 PM IST
सार
झारखंड हाईकोर्ट ने स्नातक प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्ति मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिका को 14 महीने की देरी के आधार पर खारिज कर दिया। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति एके राय की खंडपीठ ने पहले के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया।
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झारखंड उच्च न्यायालय
- फोटो : ANI
विस्तार
झारखंड उच्च न्यायालय ने स्नातक प्रशिक्षित शिक्षक नियुक्ति मामले में दाखिल पुनर्विचार याचिका को खारिज कर दिया है। मुख्य न्यायाधीश एमएस सोनक और न्यायमूर्ति एके राय की खंडपीठ ने इस मामले में एकल पीठ के निर्णय में हस्तक्षेप करने से साफ मना कर दिया। अदालत ने याचिका दाखिल करने में हुई 14 माह की लंबी देरी को इसका मुख्य आधार माना है। इस आदेश के बाद शिक्षक बहाली से जुड़ी कानूनी प्रक्रिया को लेकर स्थिति और स्पष्ट हो गई है।
नियुक्ति मामले में देरी बनी खारिज होने की मुख्य वजह
उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष झारखंड कर्मचारी चयन आयोग ने अपना पक्ष रखा। आयोग ने एकल पीठ को अवगत कराया था कि सत्यजीत कुमार से जुड़े प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के 2 अगस्त, 2022 के आदेश का पूरी तरह पालन किया गया है। इसके तहत याचिकाकर्ता नागेंद्र नाथ परिहार की उम्मीदवारी का आकलन राज्यस्तरीय मेधा सूची के आधार पर किया गया था। याचिकाकर्ता ने बीसी-2 श्रेणी के अंतर्गत अपना आवेदन प्रस्तुत किया था।
राज्यस्तरीय मेधा सूची के आंकड़ों के अनुसार याचिकाकर्ता के प्राप्तांक बीसी-1 और बीसी-2 दोनों श्रेणियों में अंतिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों के अंकों से कम पाए गए थे। अंकों में अंतर होने के कारण आयोग ने याचिकाकर्ता का चयन सूची में समावेश नहीं किया। इसी दलील को स्वीकार करते हुए पूर्व में एकल पीठ ने याचिका खारिज की थी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने खंडपीठ में अपील की थी, जहां एकल पीठ के निर्णय को सही ठहराया गया था।
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सर्वोच्च न्यायालय से भी नहीं मिली थी कोई राहत
खंडपीठ से याचिका खारिज होने के बाद प्रार्थी ने सर्वोच्च न्यायालय का द्वार खटखटाया था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रार्थी को किसी प्रकार की राहत देने से इन्कार कर दिया था। इसके उपरांत प्रार्थी ने पुनः झारखंड उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने अब 14 महीने के विलंब को देखते हुए इस पुनर्विचार याचिका को भी पूरी तरह निरस्त कर दिया है।
लोहरदगा के 15 शिक्षकों के तबादले पर निर्णय लेंगे उपायुक्त
एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने लोहरदगा जिले में 15 सरकारी शिक्षकों के स्थानांतरण से संबंधित याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने इस प्रकरण में लोहरदगा के उपायुक्त को कानून तथा निर्धारित नियमों के आलोक में उचित निर्णय लेने का स्पष्ट निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि शिक्षकों की याचिका को एक संयुक्त अभ्यावेदन के रूप में स्वीकार करते हुए उस पर विधि सम्मत फैसला लिया जाए।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह प्रावधान भी किया है कि जब तक इस संयुक्त अभ्यावेदन पर अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक वर्ष 2023 में जारी स्थानांतरण आदेश को लागू नहीं किया जाएगा, यदि वह वर्तमान समय तक क्रियान्वित नहीं हुआ है।
स्थानांतरण प्रक्रिया और निजी संस्थाओं की भूमिका पर सवाल
शिक्षकों के पक्षकार अधिवक्ताओं मनोज टंडन और सिद्धार्थ रंजन ने अदालत में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लोहरदगा जिला शिक्षा अधीक्षक ने 27 जुलाई 2023 को एक पत्र जारी किया था। इस आदेश के जरिये 15 शिक्षकों को उनके विद्यालयों में अतिरिक्त घोषित करते हुए अन्य विद्यालयों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि इस निर्देश के जारी होने के बाद लंबा समय बीत जाने पर भी इसे लागू नहीं किया जा सका।
शिक्षकों की ओर से अदालत से इस स्थानांतरण आदेश को निरस्त करने का आग्रह किया गया था। याचिका में सरकारी शिक्षकों के तबादले और पदस्थापन में निजी व्यक्तियों अथवा गैर-सरकारी संस्थाओं के हस्तक्षेप तथा भूमिका को भी चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान शिक्षकों के अधिवक्ताओं ने कहा कि चूंकि आदेश अभी तक लागू नहीं हुआ है, इसलिए अधिकारियों को अभ्यावेदन पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश देना न्यायसंगत रहेगा। राज्य सरकार के प्रतिनिधि ने भी सहमति जताते हुए कहा कि शिक्षक अपनी बात सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रख सकते हैं।
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नियुक्ति मामले में देरी बनी खारिज होने की मुख्य वजह
उच्च न्यायालय की खंडपीठ के समक्ष झारखंड कर्मचारी चयन आयोग ने अपना पक्ष रखा। आयोग ने एकल पीठ को अवगत कराया था कि सत्यजीत कुमार से जुड़े प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय के 2 अगस्त, 2022 के आदेश का पूरी तरह पालन किया गया है। इसके तहत याचिकाकर्ता नागेंद्र नाथ परिहार की उम्मीदवारी का आकलन राज्यस्तरीय मेधा सूची के आधार पर किया गया था। याचिकाकर्ता ने बीसी-2 श्रेणी के अंतर्गत अपना आवेदन प्रस्तुत किया था।
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राज्यस्तरीय मेधा सूची के आंकड़ों के अनुसार याचिकाकर्ता के प्राप्तांक बीसी-1 और बीसी-2 दोनों श्रेणियों में अंतिम रूप से चयनित अभ्यर्थियों के अंकों से कम पाए गए थे। अंकों में अंतर होने के कारण आयोग ने याचिकाकर्ता का चयन सूची में समावेश नहीं किया। इसी दलील को स्वीकार करते हुए पूर्व में एकल पीठ ने याचिका खारिज की थी। इसके बाद याचिकाकर्ता ने खंडपीठ में अपील की थी, जहां एकल पीठ के निर्णय को सही ठहराया गया था।
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सर्वोच्च न्यायालय से भी नहीं मिली थी कोई राहत
खंडपीठ से याचिका खारिज होने के बाद प्रार्थी ने सर्वोच्च न्यायालय का द्वार खटखटाया था। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रार्थी को किसी प्रकार की राहत देने से इन्कार कर दिया था। इसके उपरांत प्रार्थी ने पुनः झारखंड उच्च न्यायालय में पुनर्विचार याचिका दायर की थी। उच्च न्यायालय ने अब 14 महीने के विलंब को देखते हुए इस पुनर्विचार याचिका को भी पूरी तरह निरस्त कर दिया है।
लोहरदगा के 15 शिक्षकों के तबादले पर निर्णय लेंगे उपायुक्त
एक अन्य महत्वपूर्ण मामले में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति दीपक रोशन की अदालत ने लोहरदगा जिले में 15 सरकारी शिक्षकों के स्थानांतरण से संबंधित याचिका पर सुनवाई की। अदालत ने इस प्रकरण में लोहरदगा के उपायुक्त को कानून तथा निर्धारित नियमों के आलोक में उचित निर्णय लेने का स्पष्ट निर्देश दिया है। अदालत ने कहा कि शिक्षकों की याचिका को एक संयुक्त अभ्यावेदन के रूप में स्वीकार करते हुए उस पर विधि सम्मत फैसला लिया जाए।
उच्च न्यायालय ने अपने आदेश में यह प्रावधान भी किया है कि जब तक इस संयुक्त अभ्यावेदन पर अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक वर्ष 2023 में जारी स्थानांतरण आदेश को लागू नहीं किया जाएगा, यदि वह वर्तमान समय तक क्रियान्वित नहीं हुआ है।
स्थानांतरण प्रक्रिया और निजी संस्थाओं की भूमिका पर सवाल
शिक्षकों के पक्षकार अधिवक्ताओं मनोज टंडन और सिद्धार्थ रंजन ने अदालत में विस्तृत जानकारी दी। उन्होंने बताया कि लोहरदगा जिला शिक्षा अधीक्षक ने 27 जुलाई 2023 को एक पत्र जारी किया था। इस आदेश के जरिये 15 शिक्षकों को उनके विद्यालयों में अतिरिक्त घोषित करते हुए अन्य विद्यालयों में स्थानांतरित करने का निर्देश दिया गया था। हालांकि इस निर्देश के जारी होने के बाद लंबा समय बीत जाने पर भी इसे लागू नहीं किया जा सका।
शिक्षकों की ओर से अदालत से इस स्थानांतरण आदेश को निरस्त करने का आग्रह किया गया था। याचिका में सरकारी शिक्षकों के तबादले और पदस्थापन में निजी व्यक्तियों अथवा गैर-सरकारी संस्थाओं के हस्तक्षेप तथा भूमिका को भी चुनौती दी गई थी। सुनवाई के दौरान शिक्षकों के अधिवक्ताओं ने कहा कि चूंकि आदेश अभी तक लागू नहीं हुआ है, इसलिए अधिकारियों को अभ्यावेदन पर नए सिरे से विचार करने का निर्देश देना न्यायसंगत रहेगा। राज्य सरकार के प्रतिनिधि ने भी सहमति जताते हुए कहा कि शिक्षक अपनी बात सक्षम प्राधिकारी के समक्ष रख सकते हैं।