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झारखंड: फैमिली कोर्ट का आदेश हाईकोर्ट ने पलटा, मां को मिली साढ़े चार साल की बेटी की अंतरिम कस्टडी
Fri, 11 Sep 2026 09:56 PM IST
तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी
न्यूज डेस्क, अमर उजाला रांची
न्यूज डेस्क, अमर उजाला रांची
Published by: तरुणेंद्र कुमार चतुर्वेदी
Updated Fri, 11 Sep 2026 09:56 PM IST
सार
झारखंड हाईकोर्ट ने हजारीबाग फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें करीब साढ़े चार साल की बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को देने से इनकार किया गया था। हाईकोर्ट ने कहा कि मुख्य अभिभावकता याचिका पर अंतिम फैसला होने तक बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां के पास रहेगी, जबकि पिता को मुलाकात का अधिकार मिलेगा।
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झारखंड हाईकोर्ट
- फोटो : अमर उजाला
विस्तार
झारखंड हाईकोर्ट ने अहम फैसले में हजारीबाग फैमिली कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें करीब साढ़े चार साल की मासूम बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां को सौंपने से मना कर दिया गया था। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब तक मुख्य अभिभावकता याचिका पर अंतिम निर्णय नहीं आ जाता, तब तक बच्ची की अंतरिम कस्टडी मां के पास ही रहेगी। बच्ची के पिता को मिलने-जुलने का अधिकार प्राप्त रहेगा।
जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने बच्चे के हित को सर्वोपरि करार दिया। उच्च न्यायालय ने समीक्षा में पाया कि हजारीबाग फैमिली कोर्ट ने अंतरिम कस्टडी की मूल मांग पर विचार करने के बजाय केवल मुलाकात के अधिकार पर फैसला सुना दिया था। खंडपीठ ने इस व्यवस्था को कानूनी प्रक्रिया के प्रतिकूल और गंभीर त्रुटि मानते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि अभिभावकता से जुड़े किसी भी विवाद में माता-पिता के आपसी अधिकारों से बढ़कर बच्चे का कल्याण और सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता होती है।
सहायक प्राध्यापक दंपती की कानूनी लड़ाई
यह पूरा मामला विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में कार्यरत दो सहायक प्राध्यापकों के बीच बढ़ा विवाद है। सहायक प्राध्यापक डॉ. संगीता विश्वकर्मा और सहायक प्राध्यापक राहुल रंजन का विवाह 16 मई, 2017 को हुआ था। बाद में 8 मार्च, 2022 को आईवीएफ तकनीक के माध्यम से उनकी पुत्री एकांशी शर्मा का जन्म हुआ। दंपती के बीच मतभेद गहराने के बाद बच्ची को अपने पास रखने के लिए कानूनी संघर्ष शुरू हो गया। मां का आरोप था कि पति ने बच्ची को अपने पास रखकर उसे अपनी बेटी से मिलने तक नहीं दिया। हालांकि पति ने अदालत के समक्ष सभी आरोपों को गलत बताया।
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ये भी पढ़ें- बिहार: मौत भी जुदा न कर सकी दोस्ती, जाति की दीवार तोड़ एक ही कब्र में दफन हुईं दो सहेलियां
पांच वर्ष से छोटे बच्चे का कल्याण
सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6(ए) व 13 तथा गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 का विशेष उल्लेख किया। अदालत ने रेखांकित किया कि कानून के अनुसार पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी स्वाभाविक रूप से मां को मिलनी चाहिए, जब तक कि इसके विपरीत कोई अत्यंत ठोस कारण मौजूद न हो।
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसलों का संदर्भ देते हुए खंडपीठ ने कहा कि छोटे बच्चों को माता- पिता दोनों के प्यार की जरूरत होती है। फिर भी, अंतरिम कस्टडी तय करते समय न्यायालय को बच्चे की मानसिक, शारीरिक, नैतिक तथा भावनात्मक भलाई को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होती है। फिलहाल स्थायी कस्टडी का मुख्य मुकदमा फैमिली कोर्ट में चलता रहेगा।
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जस्टिस सुजीत नारायण प्रसाद और जस्टिस संजय प्रसाद की खंडपीठ ने बच्चे के हित को सर्वोपरि करार दिया। उच्च न्यायालय ने समीक्षा में पाया कि हजारीबाग फैमिली कोर्ट ने अंतरिम कस्टडी की मूल मांग पर विचार करने के बजाय केवल मुलाकात के अधिकार पर फैसला सुना दिया था। खंडपीठ ने इस व्यवस्था को कानूनी प्रक्रिया के प्रतिकूल और गंभीर त्रुटि मानते हुए निरस्त कर दिया। अदालत ने कहा कि अभिभावकता से जुड़े किसी भी विवाद में माता-पिता के आपसी अधिकारों से बढ़कर बच्चे का कल्याण और सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण प्राथमिकता होती है।
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सहायक प्राध्यापक दंपती की कानूनी लड़ाई
यह पूरा मामला विनोबा भावे विश्वविद्यालय, हजारीबाग में कार्यरत दो सहायक प्राध्यापकों के बीच बढ़ा विवाद है। सहायक प्राध्यापक डॉ. संगीता विश्वकर्मा और सहायक प्राध्यापक राहुल रंजन का विवाह 16 मई, 2017 को हुआ था। बाद में 8 मार्च, 2022 को आईवीएफ तकनीक के माध्यम से उनकी पुत्री एकांशी शर्मा का जन्म हुआ। दंपती के बीच मतभेद गहराने के बाद बच्ची को अपने पास रखने के लिए कानूनी संघर्ष शुरू हो गया। मां का आरोप था कि पति ने बच्ची को अपने पास रखकर उसे अपनी बेटी से मिलने तक नहीं दिया। हालांकि पति ने अदालत के समक्ष सभी आरोपों को गलत बताया।
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पांच वर्ष से छोटे बच्चे का कल्याण
सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने हिंदू माइनॉरिटी एंड गार्जियनशिप एक्ट, 1956 की धारा 6(ए) व 13 तथा गार्जियंस एंड वार्ड्स एक्ट, 1890 की धारा 12 का विशेष उल्लेख किया। अदालत ने रेखांकित किया कि कानून के अनुसार पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे की कस्टडी स्वाभाविक रूप से मां को मिलनी चाहिए, जब तक कि इसके विपरीत कोई अत्यंत ठोस कारण मौजूद न हो।
सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व फैसलों का संदर्भ देते हुए खंडपीठ ने कहा कि छोटे बच्चों को माता- पिता दोनों के प्यार की जरूरत होती है। फिर भी, अंतरिम कस्टडी तय करते समय न्यायालय को बच्चे की मानसिक, शारीरिक, नैतिक तथा भावनात्मक भलाई को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देनी होती है। फिलहाल स्थायी कस्टडी का मुख्य मुकदमा फैमिली कोर्ट में चलता रहेगा।