{"_id":"575a526a4f1c1b520a9c55f5","slug":"the-lack-of-funds-to-protect-forests-from-fire","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"J&K: जंगलों को आग से बचाने में फंड की कमी बनी बाधा","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
J&K: जंगलों को आग से बचाने में फंड की कमी बनी बाधा
रवि वर्मा, अमर उजाला/राजोरी
Updated Fri, 10 Jun 2016 11:09 AM IST
विज्ञापन
धधक रहे नौशेरा, रियासी और मंथल के जंगल
- फोटो : Amar Ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जिले में जंगलों के संरक्षण के लिए सरकार द्वारा मास्टर प्लान बनाए जाने के बावजूद जंगलों का संरक्षण सही प्रकार से नहीं हो पा रहा है। इसमें सबसे अधिक बाधा फंड की कमी है।
राजोरी डिवीजन के डीएफओ अनूप सोनी के अनुसार समर सीजन शुरू होने से पहले ही वन विभाग जंगलों में आग लगने की घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाना शुरू कर देता है।
इसके लिए सबसे पहले कई स्थानों पर फायर लाइंस बनाई जाती हैं। यह अस्थायी फायर लाइन काफी हद तक आग पर काबू पाने में सफल होती है। यदि स्थायी तौर पर फायर लाइन बनाई जाएं तो आग पर काबू पाने में अधिक दिक्कतें नहीं आती हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि स्थायी फायर लाइन बनाने के लिए फंड उपलब्ध नहीं होते हैं।
विज्ञापन
कई संवेदनशील स्थानों पर सीजनल फायर वॉचर नियुक्त कर कहीं भी आग लगने पर सूचना शेयर करने का काम भी किया जाता है। डिवीजन में करीब 35 ऐसे वाचर्स नियुक्त किए गए हैं, जो कहीं भी आग की घटना लगने की सूचना विभागीय अधिकारियों को देते हैं। इन वॉचरों की संख्या बढ़ाने की भी जरूरत है। इसके अलावा फायर कंट्रोल रूम भी बनाए गए हैं।
राजोरी डिवीजन में कई संवेदनशील स्थानों पर बनाए गए कंट्रोल रूम में चार से छह कर्मचारी नियुक्त किए गए हैं। ये कर्मचारी भी आग लगने की घटना को अधिकारियों तक पहुंचाते हैं। इसके साथ ही फायर पर नजर रखने के मकसद से फायर वॉच टावर भी खड़े किए जाते हैं। फायर वॉच टावरों के माध्यम से दूरबीन का प्रयोग कर जंगल में दूर तक नजर रखी जाती है।
इसके बावजूद कई बार आग लगने से उठने वाला धुंआ दूरबीन से भी नजर नहीं आता है और आग फैल जाती है। इन फायर टावरों को अधिक आधुनिक और मजबूत बनाने के लिए भी फंड की कमी ही आड़े आती है।
इतना ही नहीं जंगलों में कई स्थानों पर जल संचयन संरचनाएं भी बनाई जाती हैं, ताकि उनमें भरा जाने वाला बारिश का पानी आग पर काबू पाने के लिए प्रयोग किया जा सके। डीएफओ के अनुसार जितने संरचनाएं बनाई गई हैं वे कम हैं। इनको अधिक बढ़ाने की जरूरत है। यह आग को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
विज्ञापन
राजोरी डिवीजन के डीएफओ अनूप सोनी के अनुसार समर सीजन शुरू होने से पहले ही वन विभाग जंगलों में आग लगने की घटनाओं को रोकने के लिए कदम उठाना शुरू कर देता है।
विज्ञापन
इसके लिए सबसे पहले कई स्थानों पर फायर लाइंस बनाई जाती हैं। यह अस्थायी फायर लाइन काफी हद तक आग पर काबू पाने में सफल होती है। यदि स्थायी तौर पर फायर लाइन बनाई जाएं तो आग पर काबू पाने में अधिक दिक्कतें नहीं आती हैं। सबसे बड़ी समस्या यह है कि स्थायी फायर लाइन बनाने के लिए फंड उपलब्ध नहीं होते हैं।
विज्ञापन
कई संवेदनशील स्थानों पर सीजनल फायर वॉचर नियुक्त कर कहीं भी आग लगने पर सूचना शेयर करने का काम भी किया जाता है। डिवीजन में करीब 35 ऐसे वाचर्स नियुक्त किए गए हैं, जो कहीं भी आग की घटना लगने की सूचना विभागीय अधिकारियों को देते हैं। इन वॉचरों की संख्या बढ़ाने की भी जरूरत है। इसके अलावा फायर कंट्रोल रूम भी बनाए गए हैं।
राजोरी डिवीजन में कई संवेदनशील स्थानों पर बनाए गए कंट्रोल रूम में चार से छह कर्मचारी नियुक्त किए गए हैं। ये कर्मचारी भी आग लगने की घटना को अधिकारियों तक पहुंचाते हैं। इसके साथ ही फायर पर नजर रखने के मकसद से फायर वॉच टावर भी खड़े किए जाते हैं। फायर वॉच टावरों के माध्यम से दूरबीन का प्रयोग कर जंगल में दूर तक नजर रखी जाती है।
इसके बावजूद कई बार आग लगने से उठने वाला धुंआ दूरबीन से भी नजर नहीं आता है और आग फैल जाती है। इन फायर टावरों को अधिक आधुनिक और मजबूत बनाने के लिए भी फंड की कमी ही आड़े आती है।
इतना ही नहीं जंगलों में कई स्थानों पर जल संचयन संरचनाएं भी बनाई जाती हैं, ताकि उनमें भरा जाने वाला बारिश का पानी आग पर काबू पाने के लिए प्रयोग किया जा सके। डीएफओ के अनुसार जितने संरचनाएं बनाई गई हैं वे कम हैं। इनको अधिक बढ़ाने की जरूरत है। यह आग को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
90 प्रतिशत मामलों में लोग ही लगाते हैं आग
आग बूझाता वन कर्मी
- फोटो : File Photo
डीएफओ के अनुसार समय रहते आग पर काबू पाने के लिए सबसे अधिक बाधा वाहनों की कमी की है। जैसे-तैसे आग लगने की सूचना तो मिल जाती है, लेकिन उस स्थान तक पहुंचने के लिए वन विभाग के पास पर्याप्त वाहन उपलब्ध नहीं होते। जब तक वाहनों का बंदोबस्त कर कर्मचारी आग बुझाने पहुंचते हैं, तब तक आग अपना काम कर चुकी होती है।
इसके अलावा फायर फाइटिंग उपकरणों की कमी भी आड़े आती है। विभाग के पास ऐसे आधुनिक उपकरण नहीं हैं, जो आग पर काबू पाने के लिए अधिक प्रयोग होते हैं। आधुनिक उपकरण नहीं होने से विभाग को आग पर काबू पाने के लिए जुगाड़ करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर बनाए गए उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। आधुनिक उपकरणों को खरीदने के लिए भी फंड उपलब्ध नहीं होते हैं।
डीएफओ ने माना कि जंगलों में आग अपने आप ही नहीं लगती। इसमें सबसे अधिक योगदान उन लोगों का होता है जो घास की खातिर जंगलों में आग लगाते हैं। विभाग के पास इतनी मैनपावर नहीं है कि वह हर स्थान पर आग लगाने वाले लोगों की पहचान कर पाए।
इस साल अब तक 45 हेक्टेयर भूमि पर जंगल राख हुए
मूलभूत ढांचा मजबूत नहीं होने से इस वर्ष अभी तक राजोरी फारेस्ट डिवीजन में 45 हेक्टेयर यानी 900 कनाल भूमि पर बने जंगल आग की भेंट चढ़ चुके हैं। डीएफओ ने बताया कि यह आंकड़ा बढ़ने की संभावना अभी बनी हुई है।
इसके अलावा फायर फाइटिंग उपकरणों की कमी भी आड़े आती है। विभाग के पास ऐसे आधुनिक उपकरण नहीं हैं, जो आग पर काबू पाने के लिए अधिक प्रयोग होते हैं। आधुनिक उपकरण नहीं होने से विभाग को आग पर काबू पाने के लिए जुगाड़ करना पड़ता है। स्थानीय स्तर पर बनाए गए उपकरणों का प्रयोग किया जाता है। आधुनिक उपकरणों को खरीदने के लिए भी फंड उपलब्ध नहीं होते हैं।
डीएफओ ने माना कि जंगलों में आग अपने आप ही नहीं लगती। इसमें सबसे अधिक योगदान उन लोगों का होता है जो घास की खातिर जंगलों में आग लगाते हैं। विभाग के पास इतनी मैनपावर नहीं है कि वह हर स्थान पर आग लगाने वाले लोगों की पहचान कर पाए।
इस साल अब तक 45 हेक्टेयर भूमि पर जंगल राख हुए
मूलभूत ढांचा मजबूत नहीं होने से इस वर्ष अभी तक राजोरी फारेस्ट डिवीजन में 45 हेक्टेयर यानी 900 कनाल भूमि पर बने जंगल आग की भेंट चढ़ चुके हैं। डीएफओ ने बताया कि यह आंकड़ा बढ़ने की संभावना अभी बनी हुई है।