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मचैल दरबार तीन माह के लिए बंद
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फोटो....माता चंडी कालीस्वरूपा मूर्ति को मुख्य दरबार से स्थानतरित कर गांव के छोटे मंदिर में प्रति ष?
- फोटो : UDHAMPUR
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किश्तवाड़। माता चंडी कालिका स्वरूप की चांदी से बनी मूर्ति को मचैल गांव के ही एक छोटे से मंदिर में स्थानांतरित किया गया है। शुक्रवार को मकर संक्रांति से माता मचैल चंडी दरबार के कपाट लगभग तीन माह के लिए बंद हो गए। माता का दरबार बैसाखी तक बंद ही रहेगा।
हर वर्ष मकर संक्रांति को माता का दरबार बंद कर दिया जाता है। सर्दी व बर्फबारी के चलते इस दिन एक भव्य आरती का आयोजन किया जाता है। उसके बाद मुख्य मंदिर से मूर्ति को उठाकर गांव के मंदिर में प्रतिष्ठापित किया जाता है। गांव का यह छोटा मंदिर मुख्य दरबार से लगभग सौ मीटर की दूरी पर ही स्थित है। परंतु, प्राचीन काल से ही ऐसा होता आ रहा है।
मंदिर के पुजारी मनोज कुमार ने मूर्ति को वहां से उठाकर माता के जयकारों के साथ गांव के छोटे मंदिर में स्थापित किया। इस दौरान गांव के सभी लोग उपस्थित रहे। एक झांकी के रूप में मूर्ति को वहां से स्थानांतरित किया गया। मंदिर एक छत पर बना हुआ है। पूरे रीति-रिवाज से यह एक तरह का पर्व मनाया गया। जानकारी के अनुसार यह मूर्ति इस छोटे मंदिर में लगभग तीन माह तक रहेगी।
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बैसाखी के दिन मूर्ति को बाहर निकाला जाएगा। इस दिन भी एक मेले का आयोजन होता है, जिसमें राज्य भर के कई श्रद्धालु मौजूद रहते हैं, और दरबार खुलते ही माता के दर्शन करते हैं। मचैल गांववासी राजू व संजीव ने बताया कि कई वर्ष पहले लेह लद्दाख के जांसकार में महामारी फैली थी, जिसमें कई लोग मर गए थे। जिसके बाद वहां के लोगों ने मचैल में माता काली की चांदी से बनी मूर्ति को प्रतिष्ठापित किया। तभी से यह चलन है कि मुख्य दरबार से गांव में एक छोटे मंदिर में मकर संक्रांति के दिन मूर्ति को लाया जाता है, और बैसाखी को वापस दरबार में पहुंचाया जाता है।
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हर वर्ष मकर संक्रांति को माता का दरबार बंद कर दिया जाता है। सर्दी व बर्फबारी के चलते इस दिन एक भव्य आरती का आयोजन किया जाता है। उसके बाद मुख्य मंदिर से मूर्ति को उठाकर गांव के मंदिर में प्रतिष्ठापित किया जाता है। गांव का यह छोटा मंदिर मुख्य दरबार से लगभग सौ मीटर की दूरी पर ही स्थित है। परंतु, प्राचीन काल से ही ऐसा होता आ रहा है।
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मंदिर के पुजारी मनोज कुमार ने मूर्ति को वहां से उठाकर माता के जयकारों के साथ गांव के छोटे मंदिर में स्थापित किया। इस दौरान गांव के सभी लोग उपस्थित रहे। एक झांकी के रूप में मूर्ति को वहां से स्थानांतरित किया गया। मंदिर एक छत पर बना हुआ है। पूरे रीति-रिवाज से यह एक तरह का पर्व मनाया गया। जानकारी के अनुसार यह मूर्ति इस छोटे मंदिर में लगभग तीन माह तक रहेगी।
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बैसाखी के दिन मूर्ति को बाहर निकाला जाएगा। इस दिन भी एक मेले का आयोजन होता है, जिसमें राज्य भर के कई श्रद्धालु मौजूद रहते हैं, और दरबार खुलते ही माता के दर्शन करते हैं। मचैल गांववासी राजू व संजीव ने बताया कि कई वर्ष पहले लेह लद्दाख के जांसकार में महामारी फैली थी, जिसमें कई लोग मर गए थे। जिसके बाद वहां के लोगों ने मचैल में माता काली की चांदी से बनी मूर्ति को प्रतिष्ठापित किया। तभी से यह चलन है कि मुख्य दरबार से गांव में एक छोटे मंदिर में मकर संक्रांति के दिन मूर्ति को लाया जाता है, और बैसाखी को वापस दरबार में पहुंचाया जाता है।

किश्तवाड़ के पाडर इलाके में स्थित मचैल माता मंदिर इन दिनों बर्फ से लगभग ढका हुआ है। मंदिर के आसपा?