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महिलाओं ने की पति की लंबी उम्र की कामना
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उधमपुर:भदरवाह मैं अपने पति की लंबी आयु के लिए कंचोथ का व्रत रखती महिलाएं.
- फोटो : UDHAMPUR
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भद्रवाह। नाग संस्कृति से संबंधित प्राचीन कंचौथ पर्व भद्रवाह में धूमधाम से मनाया गया। इसमें महिलाओं ने करवाचौथ की तरह विशेष साज श्रृंगार कर देवी गौरी की पूजा की, और पतियों की लंबी उम्र की कामना की।
स्थानीय लोगों ने बताया कि कंचौथ या गौरी तृतीया महिलाओं का एक स्थानीय त्योहार है जो माघ महीने के शुक्ल पक्ष में आता है। इसे विशेष तौर पर जम्मू संभाग के भद्रवाह, किश्तवाड़, रामबन और डोडा के पहाड़ी जिलों में मनाया जाता है। करवाचौथ की तरह कंचौथ पर भी महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए प्रार्थना करती हैं। दोनो पर्वों की शैली लगभग समान है। अंतर सिर्फ समय का है। वहीं, करवाचौथ पर शाकाहारी भोजन के साथ चंद्रमा दिखने पर व्रत तोड़ा जाता है, जबकि कंचौथ में दिन में गौरी पूजा कर मांसाहारी व्यंजन के साथ व्रत तोड़ा जाता है।
सजधज कर पूजा करने मंदिर पहुंची भद्रवाह की नवविवाहित मोहनी योगी ने कहा कि उनकी कुछ महीने पहले ही शादी हुई है। यह उनका पहला त्योहार है। कंचौथ हालांकि एक दिन का है, फिर भी यह उत्सव तीन दिनों तक रहता है। इन दिनों के दौरान महिलाएं धर्म, पंथ और जाति के बावजूद सभी को थेल (सम्मान) देने के लिए पड़ोस में जाती हैं, और उनका आशीर्वाद सुहागन भो (अपने पति की लंबी उम्र) प्राप्त करती हैं।
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वहीं, अन्य महिला कंचना देवी (33) ने कहा कि कंचौथ हमें एक अलग तरह का सम्मान देता है। क्योंकि, इस दिन सास बहुओं के पैर छूकर आशीर्वाद मांगती हैं, और परंपरा का पालन करने की स्वतंत्रता मिलती है। पति इन तीन दिनों तक रसोई का प्रबंधन करते हैं। जबकि, बाला देवी (72) ने कहा कि वह इस पर्व की प्रतीक्षा करती हैं। उम्मीद है कि आने वाली पीढ़ियां अपनी समृद्ध परंपरा को नहीं भूलेंगी, और इस प्राचीन नाग उत्सव की सुंदरता को बनाए रखेंगी।
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शिव-पार्वती विवाह के उपलक्ष्य में मनाया जाता है कंचौथ
चिनाब घाटी के जिलों में मनाया जाना वाला कंचौथ भगवान शिव के देवी पार्वती के साथ विवाह के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला प्राचीन पर्व है। इसे विशेष तौर पर नाग संस्कृति के अनुयायी मनाते हैं। उनका मानना है कि गौरी तृतीया के दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। बाद में शादी के उपहार के रूप में उन्हें बर्फ से बना सिंहासन भेंट किया गया था। इसलिए, त्योहार के दौरान बर्फबारी को एक अच्छा शगुन माना जाता है।
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स्थानीय लोगों ने बताया कि कंचौथ या गौरी तृतीया महिलाओं का एक स्थानीय त्योहार है जो माघ महीने के शुक्ल पक्ष में आता है। इसे विशेष तौर पर जम्मू संभाग के भद्रवाह, किश्तवाड़, रामबन और डोडा के पहाड़ी जिलों में मनाया जाता है। करवाचौथ की तरह कंचौथ पर भी महिलाएं पति की लंबी आयु के लिए प्रार्थना करती हैं। दोनो पर्वों की शैली लगभग समान है। अंतर सिर्फ समय का है। वहीं, करवाचौथ पर शाकाहारी भोजन के साथ चंद्रमा दिखने पर व्रत तोड़ा जाता है, जबकि कंचौथ में दिन में गौरी पूजा कर मांसाहारी व्यंजन के साथ व्रत तोड़ा जाता है।
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सजधज कर पूजा करने मंदिर पहुंची भद्रवाह की नवविवाहित मोहनी योगी ने कहा कि उनकी कुछ महीने पहले ही शादी हुई है। यह उनका पहला त्योहार है। कंचौथ हालांकि एक दिन का है, फिर भी यह उत्सव तीन दिनों तक रहता है। इन दिनों के दौरान महिलाएं धर्म, पंथ और जाति के बावजूद सभी को थेल (सम्मान) देने के लिए पड़ोस में जाती हैं, और उनका आशीर्वाद सुहागन भो (अपने पति की लंबी उम्र) प्राप्त करती हैं।
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वहीं, अन्य महिला कंचना देवी (33) ने कहा कि कंचौथ हमें एक अलग तरह का सम्मान देता है। क्योंकि, इस दिन सास बहुओं के पैर छूकर आशीर्वाद मांगती हैं, और परंपरा का पालन करने की स्वतंत्रता मिलती है। पति इन तीन दिनों तक रसोई का प्रबंधन करते हैं। जबकि, बाला देवी (72) ने कहा कि वह इस पर्व की प्रतीक्षा करती हैं। उम्मीद है कि आने वाली पीढ़ियां अपनी समृद्ध परंपरा को नहीं भूलेंगी, और इस प्राचीन नाग उत्सव की सुंदरता को बनाए रखेंगी।
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शिव-पार्वती विवाह के उपलक्ष्य में मनाया जाता है कंचौथ
चिनाब घाटी के जिलों में मनाया जाना वाला कंचौथ भगवान शिव के देवी पार्वती के साथ विवाह के उपलक्ष्य में मनाया जाने वाला प्राचीन पर्व है। इसे विशेष तौर पर नाग संस्कृति के अनुयायी मनाते हैं। उनका मानना है कि गौरी तृतीया के दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। बाद में शादी के उपहार के रूप में उन्हें बर्फ से बना सिंहासन भेंट किया गया था। इसलिए, त्योहार के दौरान बर्फबारी को एक अच्छा शगुन माना जाता है।