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Udhampur News: नाग उत्सव का मालचा मेले के साथ हुआ समापन, गूंजे नाग देवता के जयकारे
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भद्रवाह। भद्रवाह में छह महीने तक चलने वाले वार्षिक नाग उत्सव का बुधवार को थुब्बा गांव और चिंता घाटी में मनाए जाने वाले पारंपरिक मालचा उत्सव के साथ भव्य समापन हो गया। बैसाखी से एक दिन पहले प्राचीन सुबर-नाग मंदिर के कपाट खुलने के साथ शुरू हुआ यह उत्सव शीतकाल की शुरुआत से ठीक पहले संपन्न हुआ। इसके बाद अब देवताओं को पारंपरिक रेशमी वस्त्रों से पूरी तरह से ढक दिया जाएगा। ये वस्त्र अब अगले वर्ष बैसाखी उत्सव की पूर्व संध्या पर ही खोले जाएंगे।
मुख्य पुजारी संतोष शर्मा के अनुसार मालचा उत्सव मनाने की यह परंपरा सदियों पुरानी है। गर्मियों के दौरान छह महीने तक पहाड़ों में रहने वाले चरवाहे इन उत्सवों में शामिल नहीं हो पा रहे थे, इसलिए अक्तूबर के मध्य के बाद उनके अपने घरों में लौटने पर यह विशेष आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर सैकड़ों नाग भक्त मध्यरात्रि से ही चिंता घाटी के करेई और थुब्बा गांव में एकत्र हुए तथा सुबार नाग देवता को पारंपरिक प्रार्थनाएं अर्पित कर अगले साल बैसाखी तक के लिए विदाई दी।
नाग संस्कृति का प्रतीक यह जातर एक रात्रि उत्सव है, जो चिनाब घाटी के गांवों में अलग-अलग निश्चित तिथियों पर मनाया जाता है। रात्रि उत्सव के बाद स्थानीय लोग पुजारियों के साथ पवित्र अग्नि यानी ''''जगरू'''' के चारों ओर एकत्रित हुए और भोर तक पारंपरिक ढैकू नृत्य किया। सुबह पांच बजे पुजारियों ने कुछ चुने हुए स्थानीय लोगों के साथ थुब्बा स्थित पहाड़ी चोटी के नाग मंदिर की पैदल यात्रा की और नाग देवता का आशीर्वाद लेकर चिंता लौटे, जहां सैकड़ों भक्त उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
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इसके बाद पारंपरिक नाग संस्कृति को दर्शाने वाले प्राचीन आभूषण पहने पुजारियों (चेलों) ने नाग मंत्रों और धार्मिक भजनों के बीच नंगे पैर अग्नि को पार किया, जो नाग शक्ति और इन पहाड़ों में रहने वाले लोगों की नाग देवताओं के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है। मुख्य पुजारी संतोष शर्मा ने बताया कि प्राचीन तक्षक नाग मंदिर इस क्षेत्र के सबसे पूजनीय तीर्थ स्थलों में से एक है। 600 साल पुराने प्राचीन सुबार नाग मंदिर के कपाट 12 अप्रैल को खुले थे और आज 29 अक्तूबर को मालचा मेले के साथ इस मौसम का अंतिम त्योहार संपन्न हो गया।
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मुख्य पुजारी संतोष शर्मा के अनुसार मालचा उत्सव मनाने की यह परंपरा सदियों पुरानी है। गर्मियों के दौरान छह महीने तक पहाड़ों में रहने वाले चरवाहे इन उत्सवों में शामिल नहीं हो पा रहे थे, इसलिए अक्तूबर के मध्य के बाद उनके अपने घरों में लौटने पर यह विशेष आयोजन किया जाता है। इस अवसर पर सैकड़ों नाग भक्त मध्यरात्रि से ही चिंता घाटी के करेई और थुब्बा गांव में एकत्र हुए तथा सुबार नाग देवता को पारंपरिक प्रार्थनाएं अर्पित कर अगले साल बैसाखी तक के लिए विदाई दी।
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नाग संस्कृति का प्रतीक यह जातर एक रात्रि उत्सव है, जो चिनाब घाटी के गांवों में अलग-अलग निश्चित तिथियों पर मनाया जाता है। रात्रि उत्सव के बाद स्थानीय लोग पुजारियों के साथ पवित्र अग्नि यानी ''''जगरू'''' के चारों ओर एकत्रित हुए और भोर तक पारंपरिक ढैकू नृत्य किया। सुबह पांच बजे पुजारियों ने कुछ चुने हुए स्थानीय लोगों के साथ थुब्बा स्थित पहाड़ी चोटी के नाग मंदिर की पैदल यात्रा की और नाग देवता का आशीर्वाद लेकर चिंता लौटे, जहां सैकड़ों भक्त उनकी प्रतीक्षा कर रहे थे।
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इसके बाद पारंपरिक नाग संस्कृति को दर्शाने वाले प्राचीन आभूषण पहने पुजारियों (चेलों) ने नाग मंत्रों और धार्मिक भजनों के बीच नंगे पैर अग्नि को पार किया, जो नाग शक्ति और इन पहाड़ों में रहने वाले लोगों की नाग देवताओं के प्रति अटूट आस्था का प्रतीक है। मुख्य पुजारी संतोष शर्मा ने बताया कि प्राचीन तक्षक नाग मंदिर इस क्षेत्र के सबसे पूजनीय तीर्थ स्थलों में से एक है। 600 साल पुराने प्राचीन सुबार नाग मंदिर के कपाट 12 अप्रैल को खुले थे और आज 29 अक्तूबर को मालचा मेले के साथ इस मौसम का अंतिम त्योहार संपन्न हो गया।