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कब्जा खारिज होने पर अलग से बेदखली का मुकदमा जरूरी नहीं : हाईकोर्ट
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श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने कहा कि जब किसी व्यक्ति का प्रॉपर्टी पर कब्जा पहले ही एक मुकदमे में अवैध ठहरा दिया गया हो तो उसे बेदखल करने के लिए अलग से नया मुकदमा दायर करने की जरूरत नहीं है।
न्यायमूर्ति संजय धर की पीठ ने यह फैसला एक दुकान के कब्जे के विवाद में दिया। पीठ ने कहा कि जब कब्जाधारी ने खुद ही निषेधाज्ञा का मुकदमा दायर किया हो और उसमें उसका कब्जा गलत ठहरा दिया गया हो तो कानून की पूरी प्रक्रिया पूरी मानी जाएगी। ऐसे में मालिक को बेदखली के लिए नया मुकदमा नहीं लड़ना पड़ेगा।
अदालत ने ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत के आदेश को बरकरार रखा जिसमें कब्जाधारी की याचिका खारिज की गई थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि जहां कब्जाधारी अपना अधिकार साबित करने में विफल रहा हो वहां उसे अदालती सुरक्षा नहीं मिल सकती।
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मामला 2009 की एक सौदेबाजी का है। वादी का दावा था कि उसने प्रतिवादी से साढ़े चार लाख रुपये में जमीन खरीदकर वहां दो दुकानें बनाईं और बेकरी चलाई। प्रतिवादियों ने इस दावे से इन्कार किया। उनका कहना था कि वादी महज एक किरायेदार है जिसने साढ़े तीन लाख रुपये अग्रिम किराया दिया था और अब किराया भी बकाया है। अदालत ने फैसले में कहा कि ऐसे मामले में जहां कब्जेधारी का प्राइमा फेसी केस न बने, प्रतिवादी उसे बेदखल करने के लिए उचित बल का इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्हें अलग से बेदखली का डिक्री हासिल करने की प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा। संवाद
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न्यायमूर्ति संजय धर की पीठ ने यह फैसला एक दुकान के कब्जे के विवाद में दिया। पीठ ने कहा कि जब कब्जाधारी ने खुद ही निषेधाज्ञा का मुकदमा दायर किया हो और उसमें उसका कब्जा गलत ठहरा दिया गया हो तो कानून की पूरी प्रक्रिया पूरी मानी जाएगी। ऐसे में मालिक को बेदखली के लिए नया मुकदमा नहीं लड़ना पड़ेगा।
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अदालत ने ट्रायल कोर्ट और अपीलीय अदालत के आदेश को बरकरार रखा जिसमें कब्जाधारी की याचिका खारिज की गई थी। पीठ ने स्पष्ट किया कि जहां कब्जाधारी अपना अधिकार साबित करने में विफल रहा हो वहां उसे अदालती सुरक्षा नहीं मिल सकती।
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मामला 2009 की एक सौदेबाजी का है। वादी का दावा था कि उसने प्रतिवादी से साढ़े चार लाख रुपये में जमीन खरीदकर वहां दो दुकानें बनाईं और बेकरी चलाई। प्रतिवादियों ने इस दावे से इन्कार किया। उनका कहना था कि वादी महज एक किरायेदार है जिसने साढ़े तीन लाख रुपये अग्रिम किराया दिया था और अब किराया भी बकाया है। अदालत ने फैसले में कहा कि ऐसे मामले में जहां कब्जेधारी का प्राइमा फेसी केस न बने, प्रतिवादी उसे बेदखल करने के लिए उचित बल का इस्तेमाल कर सकते हैं। उन्हें अलग से बेदखली का डिक्री हासिल करने की प्रक्रिया से नहीं गुजरना पड़ेगा। संवाद