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Srinagar News: लापता पश्मीना पार्सल मामले में डाक विभाग देगा 1.20 लाख मुआवजा
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श्रीनगर। बारामुला और बांदीपोरा के जिला उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने डाक विभाग को निर्देश दिया है कि वह बारामुला की एक महिला उद्यमी को 1.20 लाख का मुआवजा दे। यह आदेश तब दिया गया जब तीन पश्मीना शॉल वाला एक पार्सल रास्ते में कहीं लापता हो गया। यह शिकायत ओलिव कल्चर की मालकिन और बारामुला के देलिना की रहने वाली महविश अशरफ ने डाक विभाग के कई अधिकारियों के खिलाफ दर्ज कराई थी। इनमें बारामुला, श्रीनगर और जम्मू डिवीजन के सीनियर सुपरिंटेंडेंट और पोस्ट मास्टर शामिल थे।
शिकायत के अनुसार उद्यमी ने एक ग्राहक को पहुंचाने के लिए तीन पश्मीना शॉल वाला एक पार्सल बुक किया था। इसकी कीमत 60,000 थी। हालांकि, वह पार्सल कभी पहुंचा ही नहीं और बाद में यह रिपोर्ट आई कि वह रास्ते में कहीं खो गया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि डाक अधिकारियों से बार-बार संपर्क करने के बावजूद न तो पार्सल का पता चला और न ही कोई राहत दी गई। इस वजह से उन्हें इस घटना के कारण हुए नुकसान और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवज़ा मांगने के लिए उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
डाक विभाग ने अपने जवाब में यह तर्क दिया कि भेजने वाले ने पार्सल बुक करते समय न तो उसके अंदर रखी चीजों के बारे में बताया था और न ही उसका बीमा करवाया था। विभाग ने ''''भारतीय डाकघर अधिनियम'''' के प्रावधानों का हवाला देते हुए ऐसे मामलों में अपनी ज़िम्मेदारी से छूट का दावा किया। मामले की जांच करने के बाद आयोग ने अपना फैसला सुनाते हुए यह पाया कि पार्सल यकीनन डाक अधिकारियों को सौंपा गया था लेकिन उसे कभी भी पाने वाले तक नहीं पहुंचाया गया। आयोग ने यह भी पाया कि डाक विभाग के रिकॉर्ड में भी यह बात साफ़ तौर पर दर्ज थी कि पार्सल खो गया है।
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राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के एक फैसले का हवाला देते हुए आयोग ने यह माना कि पैसे देकर भेजी गई डाक सेवाओं के जरिए भेजे गए सामान को न पहुंचा पाना सेवा में कमी माना जाएगा। पार्सल को संभालने में डाक अधिकारियों को लापरवाह मानते हुए आयोग ने उन्हें खोए हुए पश्मीना शॉलों की कीमत के तौर पर 60,000 वापस करने का निर्देश दिया। इसके अलावा, आयोग ने मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए 50,000 और मुकदमेबाज़ी के खर्च के तौर पर 10,000 का मुआवजा भी देने का आदेश दिया।
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शिकायत के अनुसार उद्यमी ने एक ग्राहक को पहुंचाने के लिए तीन पश्मीना शॉल वाला एक पार्सल बुक किया था। इसकी कीमत 60,000 थी। हालांकि, वह पार्सल कभी पहुंचा ही नहीं और बाद में यह रिपोर्ट आई कि वह रास्ते में कहीं खो गया है। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि डाक अधिकारियों से बार-बार संपर्क करने के बावजूद न तो पार्सल का पता चला और न ही कोई राहत दी गई। इस वजह से उन्हें इस घटना के कारण हुए नुकसान और मानसिक पीड़ा के लिए मुआवज़ा मांगने के लिए उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाना पड़ा।
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डाक विभाग ने अपने जवाब में यह तर्क दिया कि भेजने वाले ने पार्सल बुक करते समय न तो उसके अंदर रखी चीजों के बारे में बताया था और न ही उसका बीमा करवाया था। विभाग ने ''''भारतीय डाकघर अधिनियम'''' के प्रावधानों का हवाला देते हुए ऐसे मामलों में अपनी ज़िम्मेदारी से छूट का दावा किया। मामले की जांच करने के बाद आयोग ने अपना फैसला सुनाते हुए यह पाया कि पार्सल यकीनन डाक अधिकारियों को सौंपा गया था लेकिन उसे कभी भी पाने वाले तक नहीं पहुंचाया गया। आयोग ने यह भी पाया कि डाक विभाग के रिकॉर्ड में भी यह बात साफ़ तौर पर दर्ज थी कि पार्सल खो गया है।
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राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के एक फैसले का हवाला देते हुए आयोग ने यह माना कि पैसे देकर भेजी गई डाक सेवाओं के जरिए भेजे गए सामान को न पहुंचा पाना सेवा में कमी माना जाएगा। पार्सल को संभालने में डाक अधिकारियों को लापरवाह मानते हुए आयोग ने उन्हें खोए हुए पश्मीना शॉलों की कीमत के तौर पर 60,000 वापस करने का निर्देश दिया। इसके अलावा, आयोग ने मानसिक पीड़ा और उत्पीड़न के लिए 50,000 और मुकदमेबाज़ी के खर्च के तौर पर 10,000 का मुआवजा भी देने का आदेश दिया।