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कॉन्ट्रैक्ट वाली नियुक्ति की अवधि खत्म होने के बाद काम का अधिकार नहीं : हाईकोर्ट
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उच्च न्यायालय ने जेकेबोस के डेस्क जॉब कर्मचारियों की याचिका खारिज की
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन (जेकेबोस) की ओर से नियुक्त डेस्क जॉब कर्मचारियों के एक समूह की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि उन्हें अपनी 60 दिन की कॉन्ट्रैक्ट वाली नियुक्ति की अवधि खत्म होने के बाद भी काम जारी रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
जस्टिस संजय धर की बेंच ने मोहम्मद वसीम डार और अन्य की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ताओं ने जेकेबोस से निर्देश देने की मांग की थी कि कॉन्ट्रैक्ट का समय खत्म होने के बाद भी उन्हें डेस्क जॉब कर्मचारियों के तौर पर काम करने दिया जाए। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्हें 9 फरवरी 2013 के विज्ञापन नोटिस के तहत नियुक्त किया गया था लेकिन भर्ती प्रक्रिया को लेकर लंबे कानूनी विवाद के बाद उनके नियुक्ति आदेश 21 अगस्त 2023 को जारी किए गए।
उन्होंने तर्क दिया कि जहां उनकी नियुक्ति नहीं बढ़ाई गई, वहीं जेकेबोस ने कई अन्य अस्थायी और कंसोलिडेटेड कर्मचारियों की नियुक्ति बढ़ाई थी, जो भेदभाव और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। हालांकि, जेकेबोस ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं को पूरी तरह से जरूरत के आधार पर 60 दिनों के लिए नियुक्त किया गया था। नियुक्ति आदेश में साफ तौर पर कहा गया था कि बोर्ड बिना कोई कारण बताए उनकी सेवाएं खत्म कर सकता है और वे रेगुलर होने या काम जारी रखने का कोई दावा नहीं कर सकते।
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कोर्ट ने कहा कि पूरी तरह से जरूरत के आधार पर नियुक्त कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी काम जारी रखने का अधिकार नहीं मांग सकता, जब नियोक्ता को अब उनकी सेवाओं की जरूरत न हो। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऐसी नियुक्तियों को बढ़ाने का निर्देश देने के लिए कोई ''रिट ऑफ मैंडमस'' (आदेश) जारी नहीं किया जा सकता। भेदभाव की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि जिन कर्मचारियों की सेवाएं बढ़ाई गई थीं, वे अलग-अलग कैटेगरी के थे। इनमें ड्राइवर, माली, फर्श साफ करने वाले, सफाईकर्मी-सह-चौकीदार और अन्य कंसोलिडेटेड कर्मचारी शामिल थे। उनकी सेवाएं संबंधित अधिकारियों की सिफारिशों पर बढ़ाई गई थीं, जब बोर्ड ने उनकी सेवाओं को जरूरी पाया था।
इसके उलट, कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की सेवाएं बढ़ाने के लिए किसी सक्षम अधिकारी की कोई सिफारिश नहीं थी। इससे पता चलता है कि उनकी सेवाओं की अब जरूरत नहीं थी। नतीजतन, वे उन कर्मचारियों के बराबर होने का दावा नहीं कर सके, जिनकी सेवा की अवधि बढ़ाई गई थी।
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संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने शुक्रवार को जम्मू-कश्मीर बोर्ड ऑफ स्कूल एजुकेशन (जेकेबोस) की ओर से नियुक्त डेस्क जॉब कर्मचारियों के एक समूह की याचिका खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि उन्हें अपनी 60 दिन की कॉन्ट्रैक्ट वाली नियुक्ति की अवधि खत्म होने के बाद भी काम जारी रखने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है।
जस्टिस संजय धर की बेंच ने मोहम्मद वसीम डार और अन्य की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ताओं ने जेकेबोस से निर्देश देने की मांग की थी कि कॉन्ट्रैक्ट का समय खत्म होने के बाद भी उन्हें डेस्क जॉब कर्मचारियों के तौर पर काम करने दिया जाए। याचिकाकर्ताओं ने कहा कि उन्हें 9 फरवरी 2013 के विज्ञापन नोटिस के तहत नियुक्त किया गया था लेकिन भर्ती प्रक्रिया को लेकर लंबे कानूनी विवाद के बाद उनके नियुक्ति आदेश 21 अगस्त 2023 को जारी किए गए।
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उन्होंने तर्क दिया कि जहां उनकी नियुक्ति नहीं बढ़ाई गई, वहीं जेकेबोस ने कई अन्य अस्थायी और कंसोलिडेटेड कर्मचारियों की नियुक्ति बढ़ाई थी, जो भेदभाव और संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है। हालांकि, जेकेबोस ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ताओं को पूरी तरह से जरूरत के आधार पर 60 दिनों के लिए नियुक्त किया गया था। नियुक्ति आदेश में साफ तौर पर कहा गया था कि बोर्ड बिना कोई कारण बताए उनकी सेवाएं खत्म कर सकता है और वे रेगुलर होने या काम जारी रखने का कोई दावा नहीं कर सकते।
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कोर्ट ने कहा कि पूरी तरह से जरूरत के आधार पर नियुक्त कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी काम जारी रखने का अधिकार नहीं मांग सकता, जब नियोक्ता को अब उनकी सेवाओं की जरूरत न हो। कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऐसी नियुक्तियों को बढ़ाने का निर्देश देने के लिए कोई ''रिट ऑफ मैंडमस'' (आदेश) जारी नहीं किया जा सकता। भेदभाव की याचिका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि जिन कर्मचारियों की सेवाएं बढ़ाई गई थीं, वे अलग-अलग कैटेगरी के थे। इनमें ड्राइवर, माली, फर्श साफ करने वाले, सफाईकर्मी-सह-चौकीदार और अन्य कंसोलिडेटेड कर्मचारी शामिल थे। उनकी सेवाएं संबंधित अधिकारियों की सिफारिशों पर बढ़ाई गई थीं, जब बोर्ड ने उनकी सेवाओं को जरूरी पाया था।
इसके उलट, कोर्ट ने पाया कि याचिकाकर्ताओं की सेवाएं बढ़ाने के लिए किसी सक्षम अधिकारी की कोई सिफारिश नहीं थी। इससे पता चलता है कि उनकी सेवाओं की अब जरूरत नहीं थी। नतीजतन, वे उन कर्मचारियों के बराबर होने का दावा नहीं कर सके, जिनकी सेवा की अवधि बढ़ाई गई थी।