{"_id":"614397a58ebc3e83b437df5c","slug":"shrimadbhagwat-katha-kathua-news-jmu243795831","type":"story","status":"publish","title_hn":"स्वयं को जानने से ही होगा शंकाओं का समाधान","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
स्वयं को जानने से ही होगा शंकाओं का समाधान
विज्ञापन
नगरी में श्रीमद् भगवत कथा का श्रवण करते श्रद्धालु, संवाद।
- फोटो : KATHUA
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कठुआ। नगरी स्थित माता बाला सुंदरी मंदिर के प्रांगण में श्रीमद्भागवत कथा का आयोजन जारी है। वीरवार को कथा के तीसरे दिन प्रवचन में संत सुभाष शास्त्री ने जीवन में सत्संग का महत्व बताया।
प्रवचन करते हुए उन्होंने कहा कि सत्संग वह साधन है, जिससे हम स्वयं को जान पाते हैं। इससे ही हमारे जीवन की सभी शंकाओं का समाधान होता है। सत्संग के माध्यम से ही जीवन को मंगलमय बनाया जा सकता है। संसार में वैसे तो असंख्य प्राणी जीते हैं। लेकिन, जीवन उन्हीं का सार्थक है जो परमात्मा का होकर, उसे जानकर जीता है।
शास्त्री जी ने कहा कि मनुष्य अपने आप को गृहस्थ मानते हुए, यह मेरा है, मैं इनका हूं और इन्हीं के लिए हूं, ऐसी सोच के बंधन में बंधकर दुख को प्राप्त करता है। जबकि, मैं केवल परमात्मा का हूं और परमात्मा मेरे हैं, इस निष्ठा से अगर हम जीवन में भक्ति करेंगे, तो यही मोक्ष और परमसुख की स्थिति है। इसलिए सत्संग के दौरान पूरा ध्यान लगाकर सुनें। इससे आप मोह रूपी नींद को छोड़कर विवेक रूपी प्रकाश में आएंगे।
विज्ञापन
उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि जिस प्रकार आपने देह को स्वीकारा है कि मैं यही हूं। ऐसे आपने ब्रह्म को नहीं स्वीकारा। आपको यह समझना होगा कि मैं देह नहीं हूं। शरीर जन्म लेता है, और मृत्यु को प्राप्त होता है। शरीर पर बचपन, जवानी, बुढ़ापा और रोग होता है। भूख प्यास लगती है। सर्दी-गर्मी, दुख-सुख, भय-पीड़ा, आदि मन का धर्म है। कर्म इंद्रियों से होते हैं। ज्ञान-अज्ञान भी बुद्धि का धर्म है। चिंता या चिंतन करना चित्त का धर्म है। इस प्रकार जब हम जिसका जो धर्म है, उसे देखते हैं, तो अपने आप को इन सब से अलग अनुभव करेंगे।
विज्ञापन
प्रवचन करते हुए उन्होंने कहा कि सत्संग वह साधन है, जिससे हम स्वयं को जान पाते हैं। इससे ही हमारे जीवन की सभी शंकाओं का समाधान होता है। सत्संग के माध्यम से ही जीवन को मंगलमय बनाया जा सकता है। संसार में वैसे तो असंख्य प्राणी जीते हैं। लेकिन, जीवन उन्हीं का सार्थक है जो परमात्मा का होकर, उसे जानकर जीता है।
विज्ञापन
शास्त्री जी ने कहा कि मनुष्य अपने आप को गृहस्थ मानते हुए, यह मेरा है, मैं इनका हूं और इन्हीं के लिए हूं, ऐसी सोच के बंधन में बंधकर दुख को प्राप्त करता है। जबकि, मैं केवल परमात्मा का हूं और परमात्मा मेरे हैं, इस निष्ठा से अगर हम जीवन में भक्ति करेंगे, तो यही मोक्ष और परमसुख की स्थिति है। इसलिए सत्संग के दौरान पूरा ध्यान लगाकर सुनें। इससे आप मोह रूपी नींद को छोड़कर विवेक रूपी प्रकाश में आएंगे।
विज्ञापन
उन्होंने उपस्थित श्रद्धालुओं का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि जिस प्रकार आपने देह को स्वीकारा है कि मैं यही हूं। ऐसे आपने ब्रह्म को नहीं स्वीकारा। आपको यह समझना होगा कि मैं देह नहीं हूं। शरीर जन्म लेता है, और मृत्यु को प्राप्त होता है। शरीर पर बचपन, जवानी, बुढ़ापा और रोग होता है। भूख प्यास लगती है। सर्दी-गर्मी, दुख-सुख, भय-पीड़ा, आदि मन का धर्म है। कर्म इंद्रियों से होते हैं। ज्ञान-अज्ञान भी बुद्धि का धर्म है। चिंता या चिंतन करना चित्त का धर्म है। इस प्रकार जब हम जिसका जो धर्म है, उसे देखते हैं, तो अपने आप को इन सब से अलग अनुभव करेंगे।