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पहाड़ी क्षेत्रों के लिए फाइलों में अटके अग्निशमन केंद्र
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कठुआ। जिले के लोगों के जानमाल की सुरक्षा के लिए अग्निशमन विभाग के पास पर्याप्त इंतजाम नहीं हैं। कठुआ और हीरानगर में फायर स्टेशन स्थापित किए गए हैं, लेकिन तीन पहाड़ी सब डिवीजन बिलावर, बनी और बसोहली में आग से निपटने का कोई इंतजाम नहीं हैं। ऐसे में जिले की लगभग चार लाख आबादी आग की किसी भी घटना की स्थिति में भगवान भरोसे होती है। हैरानी की बात यह है कि क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों में पूर्व सरकारों में उपमुख्यमंत्री, मंत्री तक रहे, बावजूद इसके लोगों की यह मांग पूरी नहीं हो पाई है। हर साल आग लगने की पहाड़ी इलाकों में दर्जनों घटनाएं होती हैं। सबसे ज्यादा नुकसान इन इलाकों में जंगलों को होता है, लेकिन ऐसा नहीं है कि रिहायशी इलाकों में आग से नुकसान नहीं होता। बल्कि इन इलाकों में आग से निपटने का कोई भी इंतजाम नहीं रहता है।
हर साल बसोहली और बिलावर उपमंडल की वन संपदा गर्मी के सीजन में धू-धू कर जलती है। ऐसा नहीं है कि अग्निशमन विभाग की कठुआ और हीरानगर यूनिट की ओर से कोशिश नहीं की जाती। दरअसल, कठुआ से बसोहली तक फायर टेंडर को पहुंचने में ही चार घंटे का समय लग जाता है। बनी तक तो एक दिन में गाड़ी पहुंचाने के लिए तड़के रवाना करनी पड़ती है। ऐसे में आपात स्थिति में यह व्यवस्था किसी भी काम नहीं आती है। दो दिन पहले ही बिलावर क्षेत्र में आठ मवेशी अग्निकांड की भेंट चढ़ गए थे। इससे पहले बनी सब डिवीजन में भी आग लगने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
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पर्याप्त स्टाफ भी उपलब्ध नहीं
कठुआ अग्निशमन कार्यालय में तीन फायर टेंडर के साथ साथ एक छोटा वाहन और एक पंप सेट उपलब्ध है, जबकि स्टाफ के नाम पर कुल 15 कर्मचारी हैं, जिसमें सहायक निदेशक और चालक भी शामिल हैं। ऐसे में हर फायर टेंडर के साथ छह लोगों की टीम भी पूरी नहीं हो पाती। एक साथ अगर कहीं दो फायर टेंडर आग बुझाने के लिए चले गए तो पीछे केवल तीन कर्मचारी ही रह जाते हैं। जिनपर एक फायर टेंडर और एक छोटे वाहन को चलाने की जिम्मेदारी रह जाती है।
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डीसी के साथ हाल में पहाड़ी इलाकों में दो फायर स्टेशन के लिए सर्वे किया गया था। इसमें एक स्टेशन बिलावर-महानपुर के बीच और दूसरा बसोहली के इलाके में बनाए जाने को लेकर सर्वे किया गया है। पहले भी कई बार उच्च अधिकारियों को क्षेत्र के लोगों की मांग से अवगत करवाया जा चुका है। हर साल वन संपदा से लेकर अग्निकांड की कई घटनाएं इन इलाकों में होती हैं, ऐसे में इन इलाकों में फायर स्टेशन की बेहद जरूरत है।
तिलक राज थापा, एडीसी बसोहली
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हर साल बसोहली और बिलावर उपमंडल की वन संपदा गर्मी के सीजन में धू-धू कर जलती है। ऐसा नहीं है कि अग्निशमन विभाग की कठुआ और हीरानगर यूनिट की ओर से कोशिश नहीं की जाती। दरअसल, कठुआ से बसोहली तक फायर टेंडर को पहुंचने में ही चार घंटे का समय लग जाता है। बनी तक तो एक दिन में गाड़ी पहुंचाने के लिए तड़के रवाना करनी पड़ती है। ऐसे में आपात स्थिति में यह व्यवस्था किसी भी काम नहीं आती है। दो दिन पहले ही बिलावर क्षेत्र में आठ मवेशी अग्निकांड की भेंट चढ़ गए थे। इससे पहले बनी सब डिवीजन में भी आग लगने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं।
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पर्याप्त स्टाफ भी उपलब्ध नहीं
कठुआ अग्निशमन कार्यालय में तीन फायर टेंडर के साथ साथ एक छोटा वाहन और एक पंप सेट उपलब्ध है, जबकि स्टाफ के नाम पर कुल 15 कर्मचारी हैं, जिसमें सहायक निदेशक और चालक भी शामिल हैं। ऐसे में हर फायर टेंडर के साथ छह लोगों की टीम भी पूरी नहीं हो पाती। एक साथ अगर कहीं दो फायर टेंडर आग बुझाने के लिए चले गए तो पीछे केवल तीन कर्मचारी ही रह जाते हैं। जिनपर एक फायर टेंडर और एक छोटे वाहन को चलाने की जिम्मेदारी रह जाती है।
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डीसी के साथ हाल में पहाड़ी इलाकों में दो फायर स्टेशन के लिए सर्वे किया गया था। इसमें एक स्टेशन बिलावर-महानपुर के बीच और दूसरा बसोहली के इलाके में बनाए जाने को लेकर सर्वे किया गया है। पहले भी कई बार उच्च अधिकारियों को क्षेत्र के लोगों की मांग से अवगत करवाया जा चुका है। हर साल वन संपदा से लेकर अग्निकांड की कई घटनाएं इन इलाकों में होती हैं, ऐसे में इन इलाकों में फायर स्टेशन की बेहद जरूरत है।
तिलक राज थापा, एडीसी बसोहली