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सुख की प्राप्ति के लिए निर्मल मन और विवेक के उपयोग आवश्यक
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श्रीमद् भगवत कथा के दौरान प्रवचन करते कथाव्यास सुभाष शास्त्री। संवाद
- फोटो : KATHUA
कठुआ। शहर से सटे गांव चनग्रां में श्रीमद्भागवत कथा में कथा व्यास सुभाष शास्त्री ने श्रद्धालुओं को सुख की प्राप्ति के लिए निर्मल मन और विवेक के उपयोग को प्राथमिकता दी। कहा कि संसार का हर प्राणी सुख की अभिलाषा तो करता है, परंतु उसके मन में उस सुख की प्राप्ति का पवित्र विचार का अभाव रहता है।
कथा वाचक ने कहा कि संसार में मनुष्य के मन को छोड़कर कहीं पाप, झगड़ा और दुख नहीं है। उदाहरण देते हुए कहा कि आप ऐसी दुनिया की कल्पना करें, जिसमें मनुष्य का नामोनिशान न हो, या सभी मानव जाति मूर्छित अवस्था में हों, तो फिर इस दुनिया में दुख नाम की कोई चीज नहीं होगी। इसका अर्थ है कि मनुष्य का मन यदि पवित्र रहे तो और वह विवेक से काम ले तो उसे कभी दुख नहीं हो सकता।
मन की पवित्रता का महत्व बताते हुए कथा व्यास ने कहा कि कर्ज लेकर तीर्थ यात्रा करने की अपेक्षा पाप कर्मों से बचते हुए अपने मन को पवित्र और शुद्ध रखना अधिक श्रेष्ठ है। व्यक्ति को सुख और दुख समान रूप से स्वीकार करना चाहिए। समदर्शी व्यक्ति को यश और अपयश की भी चिंता नहीं करनी चाहिए और इस समदृष्टि रखने के लिए मन की पवित्रता का होना परम आवश्यक है।
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उन्होंने कहा कि धर्म की उत्पत्ति का स्थान हमारा हृदय है। हृदय से पवित्र भाव उदित हो और वह हमारे आचरण में ढल जाए। इसी को धर्म कहते हैं। मनुष्य का मन पवित्र और विचार शुद्ध हैं तो वह जो भी कर्म करेगा शुभ ही होगा। मनुष्य चाहे जहां चला जाए चाहे जो क्रिया करें। परंतु जब तक उसका चित्त शुद्ध नहीं होगा। तब तक किसी तरह से उसे आंतरिक सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए यदि हमें सुख की अभिलाषा है तो सर्वप्रथम अपने मन को शुद्ध करना होगा।
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कथा वाचक ने कहा कि संसार में मनुष्य के मन को छोड़कर कहीं पाप, झगड़ा और दुख नहीं है। उदाहरण देते हुए कहा कि आप ऐसी दुनिया की कल्पना करें, जिसमें मनुष्य का नामोनिशान न हो, या सभी मानव जाति मूर्छित अवस्था में हों, तो फिर इस दुनिया में दुख नाम की कोई चीज नहीं होगी। इसका अर्थ है कि मनुष्य का मन यदि पवित्र रहे तो और वह विवेक से काम ले तो उसे कभी दुख नहीं हो सकता।
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मन की पवित्रता का महत्व बताते हुए कथा व्यास ने कहा कि कर्ज लेकर तीर्थ यात्रा करने की अपेक्षा पाप कर्मों से बचते हुए अपने मन को पवित्र और शुद्ध रखना अधिक श्रेष्ठ है। व्यक्ति को सुख और दुख समान रूप से स्वीकार करना चाहिए। समदर्शी व्यक्ति को यश और अपयश की भी चिंता नहीं करनी चाहिए और इस समदृष्टि रखने के लिए मन की पवित्रता का होना परम आवश्यक है।
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उन्होंने कहा कि धर्म की उत्पत्ति का स्थान हमारा हृदय है। हृदय से पवित्र भाव उदित हो और वह हमारे आचरण में ढल जाए। इसी को धर्म कहते हैं। मनुष्य का मन पवित्र और विचार शुद्ध हैं तो वह जो भी कर्म करेगा शुभ ही होगा। मनुष्य चाहे जहां चला जाए चाहे जो क्रिया करें। परंतु जब तक उसका चित्त शुद्ध नहीं होगा। तब तक किसी तरह से उसे आंतरिक सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। इसलिए यदि हमें सुख की अभिलाषा है तो सर्वप्रथम अपने मन को शुद्ध करना होगा।