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Kathua News: भक्तों को भक्ति में इच्छाशक्ति का महत्व बताया
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कठुआ। शहर के श्री महाकालेश्वर शिव दुर्गा मंदिर में भी शिव महापुराण की कथा आयोजन जारी है। मंगलवार को कथा वाचक पंडित मनोहर लाल शास्त्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भक्ति में दृढ़ इच्छाशक्ति के महत्व से परिचित कराया।
उन्होंने कहा कि अगर भक्त में दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो वह ईश्वर को सृष्टि का विधान बदलने के लिए भी विवश कर देता है। मार्कंडेय ऋषि की कथा उसी दृढ़ विश्वास का ही उदाहरण है। इसके कारण को अमरता का वरदान मिला है और वह सृष्टि के अंत के बाद भी जीवित रहेंगे।
उन्होंने बताया कि मार्कंडेय ऋषि के जीवन की कथा भी ईश्वर और भक्त के बीच एक अटूट विश्वास का ही प्रमाण है। उन्होंने बताया कि ऋषि मृकंडू और उनकी पत्नी के कोई संतान नहीं थी। पुत्र रत्न की उत्पति के उद्देश्य से उन दोनों ने भगवान शिव से वरदान पाने के लिए उनकी आराधना प्रारंभ की। उनकी आराधना से भगवान शिव प्रसन्न तो हुए किंतु विधाता ने उनके भाग्य में संतान सुख नहीं लिखा था, इसलिए भगवान शिव ने उनके सामने एक शर्त रखी कि उन्हें एक ऐसा पुत्र चाहिए, जो बेहद बुद्धिमान और विलक्षण प्रतिभा का तो हो और उसके भाग्य में अल्पायु में ही मृत्यु लिखी हो या फिर एक ऐसा पुत्र चाहिए, जो बुद्धिहीन हो लेकिन दीर्घायु हो। मृकंडू और उनकी पत्नी मरुदमती ने शिव से अल्पायु लेकिन बुद्धिमान पुत्र की मांग की और शिव ने उन्हें वरदान के रूप में मार्कंडेय जैसा विलक्षण बालक प्रदान कर दिया। मार्कंडेय की नियती में 16 वर्ष की आयु में ही मृत्यु लिखी थी। जैसे-जैसे मार्कंडेय की उम्र बढ़ती गई, शिव के प्रति उनका समर्पण भी बढ़ता गया।
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मार्कंडेय की बढ़ती उम्र को देखकर उनके पिता निरंतर चिंतित रहने लगे। एक दिन मार्कंडेय ने अपने पिता से उनकी चिंता का कारण पूछा जिस पर मृकंडू ऋषि ने अपने पुत्र से कहा कि भगवान शिव के वरदान के अनुसार तुम अल्पायु हो और 16 वर्ष की आयु में ही तुम मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे। यही मेरी चिंता का कारण है। पिता द्वारा चिंता बताने पर भी मार्कंडेय बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए और भगवान शिव पर अटूट विश्वास रखते हुए निरंतर उनकी पूजा करने लगे। जिस दिन उनकी मृत्यु निश्चित थी, उस दिन भी वे शिव की पूजा में ही व्यस्त थे। जब यमदूत उन्हें लेने आए तो वह उनकी पूजा में विघ्न डाल पाने में सफल नहीं हुए। यमदूत को असफल होते देख स्वयं यमराज को मार्कंडेय को लेने के लिए धरती पर आना पड़ा।
यमराज को अपने सामने उपस्थित देख मार्कंडेय ऋषि ने महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और उसका जाप करने लगे। यमराज ने एक फंदा मार्कंडेय की गर्दन में डालने की कोशिश की लेकिन वह फंदा शिवलिंग पर चला गया। यमराज की इस हरकत पर शिव को क्रोध आ गया और वह अपने रौद्र रूप में यमराज के समक्ष उपस्थित हो गए। भगवान शिव को क्रोधित देख यमराज अत्यंत भयभीत हो गए और क्षमा याचना करने लगे। शिव ने बस एक शर्त पर यमराज को छोड़ा कि उनका भक्त अब से अमर रहेगा। उधर, शहर के शिवानगर स्थित शिव मंदिर में भी शिव कथा का आयोजन किया गया।
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उन्होंने कहा कि अगर भक्त में दृढ़ इच्छाशक्ति हो तो वह ईश्वर को सृष्टि का विधान बदलने के लिए भी विवश कर देता है। मार्कंडेय ऋषि की कथा उसी दृढ़ विश्वास का ही उदाहरण है। इसके कारण को अमरता का वरदान मिला है और वह सृष्टि के अंत के बाद भी जीवित रहेंगे।
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उन्होंने बताया कि मार्कंडेय ऋषि के जीवन की कथा भी ईश्वर और भक्त के बीच एक अटूट विश्वास का ही प्रमाण है। उन्होंने बताया कि ऋषि मृकंडू और उनकी पत्नी के कोई संतान नहीं थी। पुत्र रत्न की उत्पति के उद्देश्य से उन दोनों ने भगवान शिव से वरदान पाने के लिए उनकी आराधना प्रारंभ की। उनकी आराधना से भगवान शिव प्रसन्न तो हुए किंतु विधाता ने उनके भाग्य में संतान सुख नहीं लिखा था, इसलिए भगवान शिव ने उनके सामने एक शर्त रखी कि उन्हें एक ऐसा पुत्र चाहिए, जो बेहद बुद्धिमान और विलक्षण प्रतिभा का तो हो और उसके भाग्य में अल्पायु में ही मृत्यु लिखी हो या फिर एक ऐसा पुत्र चाहिए, जो बुद्धिहीन हो लेकिन दीर्घायु हो। मृकंडू और उनकी पत्नी मरुदमती ने शिव से अल्पायु लेकिन बुद्धिमान पुत्र की मांग की और शिव ने उन्हें वरदान के रूप में मार्कंडेय जैसा विलक्षण बालक प्रदान कर दिया। मार्कंडेय की नियती में 16 वर्ष की आयु में ही मृत्यु लिखी थी। जैसे-जैसे मार्कंडेय की उम्र बढ़ती गई, शिव के प्रति उनका समर्पण भी बढ़ता गया।
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मार्कंडेय की बढ़ती उम्र को देखकर उनके पिता निरंतर चिंतित रहने लगे। एक दिन मार्कंडेय ने अपने पिता से उनकी चिंता का कारण पूछा जिस पर मृकंडू ऋषि ने अपने पुत्र से कहा कि भगवान शिव के वरदान के अनुसार तुम अल्पायु हो और 16 वर्ष की आयु में ही तुम मृत्यु को प्राप्त हो जाओगे। यही मेरी चिंता का कारण है। पिता द्वारा चिंता बताने पर भी मार्कंडेय बिल्कुल भी विचलित नहीं हुए और भगवान शिव पर अटूट विश्वास रखते हुए निरंतर उनकी पूजा करने लगे। जिस दिन उनकी मृत्यु निश्चित थी, उस दिन भी वे शिव की पूजा में ही व्यस्त थे। जब यमदूत उन्हें लेने आए तो वह उनकी पूजा में विघ्न डाल पाने में सफल नहीं हुए। यमदूत को असफल होते देख स्वयं यमराज को मार्कंडेय को लेने के लिए धरती पर आना पड़ा।
यमराज को अपने सामने उपस्थित देख मार्कंडेय ऋषि ने महामृत्युंजय मंत्र की रचना की और उसका जाप करने लगे। यमराज ने एक फंदा मार्कंडेय की गर्दन में डालने की कोशिश की लेकिन वह फंदा शिवलिंग पर चला गया। यमराज की इस हरकत पर शिव को क्रोध आ गया और वह अपने रौद्र रूप में यमराज के समक्ष उपस्थित हो गए। भगवान शिव को क्रोधित देख यमराज अत्यंत भयभीत हो गए और क्षमा याचना करने लगे। शिव ने बस एक शर्त पर यमराज को छोड़ा कि उनका भक्त अब से अमर रहेगा। उधर, शहर के शिवानगर स्थित शिव मंदिर में भी शिव कथा का आयोजन किया गया।