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सीटीएम कॉलोनी में शिया मुस्लिम समुदाय के लोगों ने निकाला मातमी जुलूस
Updated Sat, 22 Sep 2018 01:33 AM IST
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कठुआ। शुक्रवार को कठुआ के औद्योगिक क्षेत्र में आशुरा के जुलूस में या हुसैन की सदाएं गूंजती रहीं। सीटीएम कॉलोनी में निकाले गए मुहर्रम के मातमी जुलूस में कर्बला के शहीदों को याद किया गया। इस दौरान पुलिस ने सुरक्षा व्यवस्था कड़ी रखी। जुलूस में अधिकतर दूसरे राज्य से आए लोग भी शामिल हुए।
समुदाय के लोगों ने बताया कि इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा कस्बा है करबला। वहां 61 हिजरी (इस्लामी सन) में युद्ध हुआ था। ये युद्ध मुहर्रम के 10वें दिन खत्म हुआ था। इसमें एक तरफ पैगंबर हजरत हुसैन की फौज थी, जिसमें शिया मत के अनुसार 123 लोग (72 मर्द-औरतें और 51 बच्चे) थे और दूसरी तरफ यजीदी फौज में 40,000 लोगों की सेना थी। हजरत इमाम हुसैन की फौज के कमांडर उनकी बेटी फातिमा के बेटे अब्बास इब्ने अली थे। यजीदी फौज के कमांडर उमर इब्ने सअद थे। आशुरा के दिन हजरत हुसैन के नवासे समेत 123 लोगों को करबला के मैदान में शहीद कर दिया गया था। तभी से दुनिया भर में इस शहादत पर मुहर्रम के महीने में मातम मनाया जाता है। इस्लाम धर्म को मानने वाले आज भी अपने बच्चों का नाम हजरत हुसैन और उनके शहीद साथियों के नाम पर रखते हैं। शिया समुदाय के लोग मुहर्रम के दसवें दिन जुलूस निकालकर सभी शहीदों के लिए मातम मनाते हैं। इस दिन सभी काले कपड़े पहनते हैं। सड़कों पर जुलूस निकाला जाता है और मातम मनाने के लिए कोड़ों और तलवारों या खंजरों से अपने आप को पीटा जाता है। इस दौरान लोग बांस पर एक मकबरे के आकार का मंडप ले जाते हैं। इसे कब्र के रूप में मानते हैं जिसे ताजिया कहा जाता है।
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समुदाय के लोगों ने बताया कि इराक की राजधानी बगदाद से 100 किलोमीटर दूर उत्तर-पूर्व में एक छोटा-सा कस्बा है करबला। वहां 61 हिजरी (इस्लामी सन) में युद्ध हुआ था। ये युद्ध मुहर्रम के 10वें दिन खत्म हुआ था। इसमें एक तरफ पैगंबर हजरत हुसैन की फौज थी, जिसमें शिया मत के अनुसार 123 लोग (72 मर्द-औरतें और 51 बच्चे) थे और दूसरी तरफ यजीदी फौज में 40,000 लोगों की सेना थी। हजरत इमाम हुसैन की फौज के कमांडर उनकी बेटी फातिमा के बेटे अब्बास इब्ने अली थे। यजीदी फौज के कमांडर उमर इब्ने सअद थे। आशुरा के दिन हजरत हुसैन के नवासे समेत 123 लोगों को करबला के मैदान में शहीद कर दिया गया था। तभी से दुनिया भर में इस शहादत पर मुहर्रम के महीने में मातम मनाया जाता है। इस्लाम धर्म को मानने वाले आज भी अपने बच्चों का नाम हजरत हुसैन और उनके शहीद साथियों के नाम पर रखते हैं। शिया समुदाय के लोग मुहर्रम के दसवें दिन जुलूस निकालकर सभी शहीदों के लिए मातम मनाते हैं। इस दिन सभी काले कपड़े पहनते हैं। सड़कों पर जुलूस निकाला जाता है और मातम मनाने के लिए कोड़ों और तलवारों या खंजरों से अपने आप को पीटा जाता है। इस दौरान लोग बांस पर एक मकबरे के आकार का मंडप ले जाते हैं। इसे कब्र के रूप में मानते हैं जिसे ताजिया कहा जाता है।
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