कठुआ: HC ने राज्य सरकार और CBI को भेजा नोटिस, 10 दिन के भीतर याचिका पर आपत्ति दर्ज कराने के निर्देश
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बहुचर्चित कठुआ के रेप कांड पर सीबीआई जांच की मांग को लेकर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से दस दिन के भीतर जवाब मांगा है। इस मामले के दो आरोपियों ने कोर्ट में सीबीआई की जांच मांग करते हुए याचिका दायर की थी। बुधवार को हाईकोर्ट के जस्टिस अलोक अराधे ने मामले की दोनों तरफ से सुनी दलीलों के बाद राज्य सरकार और सीबीआई को कहा कि वह कोर्ट में हलफनामा पेश कर अपना पक्ष कोर्ट के सामने रखें।
जस्टिस अलोक अराधे ने आरोपियों के वकील यू के जलाली और वीनू गुप्ता, सरकार की तरफ से एडवोकेट जनरल जहांगीर गेनेई, डिप्टी एडवोकेट जनरल एहसान मिर्जा और सीबीआई की तरफ से मोनिका कोहली की दलीलें सुनी। इस याचिका को प्रतिवादी पक्ष की तरफ से परामर्श के लिए मंजूर कर लिया गया। जज ने इस मामले की अगली सुनवाई 7 मई को निर्धारित की है। अपीलकर्ता के वकीलों ने कोर्ट को बताया कि इस मामले में पोस्टमार्टम की रिपोर्ट एक बड़े सबूत के रूप में शामिल है। लेकिन इस रिपोर्ट को लेकर बड़ी धांधली की गई है। रिपोर्ट को बदला गया। पोस्टमार्टम की अगली रिपोर्ट में जख्मों को बढ़ाया हुआ दिखाया गया। यह भी बताया गया कि इस मामले की जांच को लेकर बारी बारी से तीन स्पेशल टीमों का गठन किया गया। ऐसे में कोर्ट को भी अधिकार है कि वह इस मामले को सीबीआई के पास ट्रांसफर करें। फिर बेशक इसमें चार्जशीट ही फाइल क्यों न हो चुकी हो।
सब इंस्पेक्टर आनंद दत्ता और एसपीओ दीपक खजुरिया की याचिका में क्राइम ब्रांच की जांच पर सवाल उठाए गए हैं। वकीलों ने तर्क दिया कि सुप्रीम कोर्ट ने इससे पहले गुजरात सरकार बनाम रुबाबुदीन, धर्मपाल बनाम हरियाणा सरकार व अन्य, पूजा पाल बनाम केंद्रीय सरकार व अन्य और पंजाब सरकार बनाम सीबीआई व अन्य के मामलों की जांच सीबीआई को ट्रांसफर किया था। अपीलकर्ताओं के वकीलों ने जज के सामने इन मामलों का उदाहरण किया।
इस पर वरिष्ठ सलाहकारों ने भरोसा जताया। एडवोकेट जनरल ने सरकार का पक्ष रखते हुए कहा कि जिन आरोपियों ने सीबीआई की मांग की है, वह पहले जांच टीम का हिस्सा थे। उन्होंने अपनी ड्यूटी सही तरीके से नहीं की है। उन्होंने लोगों का विश्वास तोड़ा है। ऐसे में इनकी याचिका का कोई अर्थ नहीं है। एडवोकेट जनरल ने सुदीप्ता लेंका बनाम उड़ीसा सरकार के एक मामले का उदाहरण भी अपने जवाब में जोड़ा। जज ने प्रतिद्वंद्वी पक्ष की दलीलें को सुनने के बाद कहा कि जहां तक आंतरिक राहत का सवाल है, तो इस मामले की रिट पिटिशन को अगली तारीख में देखा जाएगा। तब तक ट्रायल कोर्ट पूरी तरह से आजाद है कि वह इस मामले की सुनवाई को आगे बढ़ाए।
याचिका में दिए यह तर्क
क्राइम ब्रांच ने जांच हाथ में आते ही किस तरह से क्राइम सीन के साथ खेला। क्राइम ब्रांच ने बताया कि बच्ची के कपड़े और शव मिट्टी में लिपटे थे। जिसे देवस्थान में रखा गया। यह देवस्थान पूरी तरह से पक्का बना हुआ है, जिसमें मिट्टी का कोई सवाल ही नहीं। क्राइम ब्रांच ने बताया कि बच्ची के बाल देवस्थान से मिले। जबकि अपनी चार्जशीट में क्राइम ब्रांच ने ही कहा कि देवस्थान को दिन में तीन बार धोया गया। तो इसके बाद यह कैसे संभव है कि देवस्थान धोने के बाद वहां से बच्ची के बाल मिले हों।
यह मामला ग्लोबल स्तर पर चर्चित हुआ। क्राइम ब्रांच ने केस की पूरी कहानी को ही बदल दिया। आरोपियों को प्रताड़ित करके उनसे कबूलनामा करवाया। यह बहुत आसान है कि बच्ची के बाल कहीं से उठाकर देवस्थान में जाकर रख दिए हों और उन्हीं के सैंपल को डीएनए से मिलाकर जांच में शामिल किया। अधिवक्ता जलाली ने कहा कि क्राइम ब्रांच की जांच की वजह से पूरे राष्ट्र और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय ने यह विश्वास कर लिया कि जम्मू संभाग में रहने वाले लोग एक समुदाय से हैं। जो कुछ भी कर सकते हैं, यह मानवता के खिलाफ है।
क्राइम ब्रांच की इस तरह की जांच में सरकार ने गुज्जर समुदाय के लोगों द्वारा अवैध रूप से किए गए अतिक्रमण को संरक्षण देने वाले मामले को दबाने की कोशिश की है। यह लोग सरकार की जमीन पर अवैध रूप से कब्जा करके बैठे हैं।
क्राइम ब्रांच की जांच ने अलगाववादियों को लाभ पहुंचाने की कोशिश की है। जम्मू को सांप्रदायिकता पर बांटा गया। जम्मू संभाग को दो समुदाय के बीच बांटने में अलगाववादी सफल रहे हैं। जिसमें क्राइम ब्रांच की जांच ने अहम रोल निभाया।