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Hindi News ›   Jammu and Kashmir ›   Jammu and Kashmir State animal Hangul known as Red Deer will be searched in Kishtwar

जम्मू-कश्मीर: राज्य पशु हंगुल की किश्तवाड़ में होगी तलाश, रेड डियर के नाम से है विख्यात

Sun, 14 Mar 2021 05:29 PM IST
प्रशांत कुमार अमित कुमार, जम्मू
अमित कुमार, जम्मू Published by: प्रशांत कुमार Updated Sun, 14 Mar 2021 05:29 PM IST
सार

20वीं सदी शुरू होने तक हंगुल की संख्या पांच हजार के करीब थी। वर्ष 2019 में करवाई गई जनगणना में इनकी संख्या 237 थी और दस साल पहले ये संख्या 150 के करीब ही थी।  वर्ष 2018 में हंगुल के विस्तार के लिए दाचीगाम राष्ट्रीय पार्क के आसपास दो हजार कनाल भूमि को खाली कराया गया था।
 

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Jammu and Kashmir State animal Hangul  known as Red Deer will be searched in Kishtwar
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया

विस्तार

जम्मू-कश्मीर के राज्य पशु हंगुल (कश्मीरी हिरन) के अस्तित्व का विस्तार करने की कवायद तेज की गई है। इसके लिए किश्तवाड़ के उच्च पर्वतीय राष्ट्रीय पार्क के क्षेत्र में रेड डियर के नाम से विख्यात हंगुल की तलाश के लिए कैमरा ट्रैक लगाए जाएंगे। आधुनिक बैटरी के साथ पेड़ों, चट्टानों के साथ लगाए जाने वाले ये कैमरे वहां हंगुल की मौजूदगी और उनकी अन्य गतिविधियों को दर्ज करेंगे। कुछ दशक पहले तक किश्तवाड़ से गुरेज तक हंगुल की मौजूदगी थी। इसके साथ कश्मीर के दाचीगाम राष्ट्रीय पार्क में हंगुल के संरक्षण और इनकी जनसंख्या बढ़ाने के लिए उचित प्रयास किए जा रहे हैं। इसी माह के अंत में हंगुल की जनगणना प्रक्रिया शुरू की जाएगी। 

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उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने हाल ही में हंगुल के संरक्षण और इनकी जनसंख्या बढ़ाने पर जोर दिया था। वर्ष 2019 में करवाई गई जनगणना में इनकी संख्या 237 थी और दस साल पहले ये संख्या 150 के करीब ही थी। वन्य जीव विभाग हंगुल के संरक्षण और विस्तार के लिए पौधे लगाने, लोगों को जागरूक करने, इनके अवैध शिकार को रोकने और आसपास के हिस्सों में इनकी सुरक्षा बढ़ाने पर काम करने जा रहा है।
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किश्तवाड़ के उच्च पर्वतीय क्षेत्रों में हंगुल की संभावना तलाशने का भी फैसला किया गया है। इसके लिए जहां कैमरा ट्रैक लगाए जाएंगे वहां किश्तवाड़ से सड़क मार्ग खत्म होने के आगे 4-5 दिन पैदल चलकर पहुंचा जाता है। वर्ष 2018 में हंगुल के विस्तार के लिए दाचीगाम राष्ट्रीय पार्क के आसपास दो हजार कनाल भूमि को खाली कराया गया था।
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उस समय हंगुल प्रजाति को बनाए रखने के लिए क्षेत्र में पर्यटकों और क्षेत्रवासियों की आवाजाही पर रोक लगा दी गई थी। दाचीगाम नेशनल पार्क में क्लाइमेट इस जानवर को यहीं पर रहने में मदद करता है। इसके अलावा यहां खास किस्म की घास पाई जाती है जो पूरे विश्व में नहीं है। 20वीं सदी शुरू होने तक हंगुल की संख्या पांच हजार के करीब थी।

शिकार और अतिक्रमण बढ़ने से घटी गिनती

हंगुल उत्तर भारत और पाकिस्तान खासकर कश्मीर में पाई जाने वाली लाल हिरण की नस्ल है। हंगुल का वैज्ञानिक नाम सर्वस एलाफस हंगुल है। मानव जनसंख्या में बढ़ोतरी और जंगलों में अतिक्रमण बढ़ने से समय समय के साथ हंगुल की संख्या में गिरावट आती गई। इसका अवैध शिकार भी बढ़ा है। जम्मू-कश्मीर सरकार ने विश्व वन्य जीव निधि (वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड) जैसे अंतरराष्ट्रीय संगठनों के साथ मिलकर इन्हें बचाने की एक योजना बनाई थी जो आगे चलकर प्रोजेक्ट हंगुल के नाम से मशहूर हुई।

लाल हिरण ज्यादातर यूरोप और अन्य ठंडे इलाकों में मिलने वाले जानवर हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में हंगुल लाल हिरण की आखिरी नस्ल बची हुई है। हंगुल हिमालय की ऊंची पहाड़ियों, जंगलों और वादियों में मिलता है। देश में इसका वास कश्मीर और हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में है। यह अक्सर 2 से लेकर 18 हिरणों के झुंड में रहते हैं। कश्मीर में यह मुख्यत: दाचीगाम राष्ट्रीय उद्यान में मिलता है।

मुख्य वन्यजीव वार्डन सुरेश कुमार गुप्ता ने कहा कि हंगुल की जल्द जनगणना करवाई जा रही है। किश्तवाड़ में भी हंगुल की मौजूदगी को तलाशने के उचित प्रयास किए जा रहे हैं। हंगुल के प्रजनन को भी बढ़ावा दिया जाएगा। इसके लिए कार्य योजना बनाई जा रही है।

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