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सांस और हृदय रोगों का खतरा बढ़ा
Updated Sun, 12 Nov 2017 12:02 AM IST
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गला, सांस और हृदय रोगों का बढ़ा खतरा
कठुआ।
कहने को औद्योगिक क्षेत्र में स्थित दर्जनों सीमेंट के कारखानों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए सभी जरूरी संयत्र लगे हैं, लेकिन इसकी असलियत कोई भी इलाके से गुजरते समय महसूस कर सकता है। हालत ऐसी हो गई है कि शहर हटलीमोड़ इलाके के लोगों ने घर की छत पर कपड़े सुखाने तक बंद कर दिए हैं। घर की खिड़कियां अधिकतर समय बंद ही रहती हैं। यहां तक कि हवा प्रदूषित होन से लोगों ने शाम के समय सैर के लिए निकलना ही छोड़ दिया है। सीमेंट के कारखानों की धूल-राख छतों पर जमा होती रहती है। कुछ घंटे खुले में बिताने पर गले में खराश हो जाती है। आसपास के इलाकों में पेड़-पौधों की पत्तियां काली पड़ने लगी हैं।
सामाजिक संस्था जन सेवा संस्थान ने दावा किया है कि प्रदूषण मानकों की अवहेलना किए जाने से आम लोगों को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा है। हवा में उड़ रहे कण गले, सांस और हृदय रोगों को बढ़ावा दे रहे हैं। कई लोग प्रदूषण के कारण इन रोगों की चपेट में आ चुके हैं, लेकिन सरकार आंखें बंद कर तमाशा देख रही है। शहर का हटली मोड़ इलाका सबसे प्रदूषित इलाकों में से एक है। गोविंदसर का इलाका भी इससे अछूता नहीं है।
जानकारों की मानें तो दिन के समय गोविंदसर की ओर बहने वाली हवा इस इलाके को प्रदूषित करती है। वहीं, शाम के समय हवा का रुख बदल जाता है। सावन चक, हटली मोड़, तारानगर से लेकर शहर के पारलीवंड का इलाका दूषित हवाओं की चपेट में आते देर नहीं लगती है। इसी समय शुरू हो जाता है औद्योगिक इकाइयों का खेल। शाम ढलने पर कई इकाइयां जिनकी चिमनी दिन में शांत रहती है, अचानक धुंए का गुबार छोड़ने लगती है। इससे अचानक प्रदूषण का ग्राफ काफी बढ़ जाता है। जिन इकाइयों में कच्चे माल की प्रोसेसिंग की जाती है, उनमें चिमनियों से निकलने वाला धुआं रात के अंधेरे में बेधड़क लोगों के गले में उतर जाता है। लोगों के फेफड़े अन्य कारखानों के प्रदूषण के साथ ही सीमेंट इकाइयाें की धूल फांकते हैं। ऐसे में बीमार होना तो तय ही है।
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कठुआ।
कहने को औद्योगिक क्षेत्र में स्थित दर्जनों सीमेंट के कारखानों में प्रदूषण नियंत्रण के लिए सभी जरूरी संयत्र लगे हैं, लेकिन इसकी असलियत कोई भी इलाके से गुजरते समय महसूस कर सकता है। हालत ऐसी हो गई है कि शहर हटलीमोड़ इलाके के लोगों ने घर की छत पर कपड़े सुखाने तक बंद कर दिए हैं। घर की खिड़कियां अधिकतर समय बंद ही रहती हैं। यहां तक कि हवा प्रदूषित होन से लोगों ने शाम के समय सैर के लिए निकलना ही छोड़ दिया है। सीमेंट के कारखानों की धूल-राख छतों पर जमा होती रहती है। कुछ घंटे खुले में बिताने पर गले में खराश हो जाती है। आसपास के इलाकों में पेड़-पौधों की पत्तियां काली पड़ने लगी हैं।
सामाजिक संस्था जन सेवा संस्थान ने दावा किया है कि प्रदूषण मानकों की अवहेलना किए जाने से आम लोगों को भारी खामियाजा भुगतना पड़ा है। हवा में उड़ रहे कण गले, सांस और हृदय रोगों को बढ़ावा दे रहे हैं। कई लोग प्रदूषण के कारण इन रोगों की चपेट में आ चुके हैं, लेकिन सरकार आंखें बंद कर तमाशा देख रही है। शहर का हटली मोड़ इलाका सबसे प्रदूषित इलाकों में से एक है। गोविंदसर का इलाका भी इससे अछूता नहीं है।
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जानकारों की मानें तो दिन के समय गोविंदसर की ओर बहने वाली हवा इस इलाके को प्रदूषित करती है। वहीं, शाम के समय हवा का रुख बदल जाता है। सावन चक, हटली मोड़, तारानगर से लेकर शहर के पारलीवंड का इलाका दूषित हवाओं की चपेट में आते देर नहीं लगती है। इसी समय शुरू हो जाता है औद्योगिक इकाइयों का खेल। शाम ढलने पर कई इकाइयां जिनकी चिमनी दिन में शांत रहती है, अचानक धुंए का गुबार छोड़ने लगती है। इससे अचानक प्रदूषण का ग्राफ काफी बढ़ जाता है। जिन इकाइयों में कच्चे माल की प्रोसेसिंग की जाती है, उनमें चिमनियों से निकलने वाला धुआं रात के अंधेरे में बेधड़क लोगों के गले में उतर जाता है। लोगों के फेफड़े अन्य कारखानों के प्रदूषण के साथ ही सीमेंट इकाइयाें की धूल फांकते हैं। ऐसे में बीमार होना तो तय ही है।
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