दुनिया में अद्वितीय है 113 साल पुराना मोहरा पावर प्रोजेक्ट
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बिजली तैयार करने वाले इस प्रोजेक्ट की उम्र सौ साल से भी अधिक है। दक्षिण एशिया में यह सबसे पुराना है और बनावट में विश्व का अद्वितीय। यानी दुनिया भर में ऐसी बनावट का दूसरा कोई प्रोजेक्ट नहीं है।
जम्मू कश्मीर के मोहरा गांव में महाराजा प्रताप सिंह ने इसे ब्रिटिश इंजीनियरों की मदद से तैयार करवाया था। बाढ़ से क्षतिग्रस्त होकर प्रोजेक्ट चौबीस साल से ठप पड़ा है। अच्छी बात ये है कि अब इसे हेरिटेज प्रोजेक्ट के तौर पर फिर से पुनर्जीवित किया जाएगा।
झेलम नदी के पानी से बिजली तैयारी करने की यह तरकीब आज भी हैरत में डालती है। बारामूला के बोनियार इलाके में स्थित मोहरा गांव में यह प्रोजेक्ट 1903 में बनाया गया। 1905 में इससे 4 मेगावाट बिजली तैयार करने की कवायद शुरू हो गई।
लकड़ी की बनी एक मात्र नहर है यहां
प्रोजेक्ट की सबसे खास बात नदी से प्रोजेक्ट स्थल तक पानी पहुंचाने के लिए बनाई गई 11 किलोमीटर लंबी पावर कनाल (विद्युत नहर) है। ग्यारह किलोमीटर में से 7.5 किलोमीटर लंबी नहर देवदार की लकड़ी से तैयार की गई है। इतनी लंबी लकड़ी की नहर दुनिया के किसी हिस्से में कभी बनाई ही नहीं गई।
इंजीनियरिंग की नजीर समय की चुनौती पर भी खरी उतरी। वर्ष 1958 में झेलम की बाढ़ से नहर टूट गई जिसे 1962 में फिर से ठीक कर प्रोजेक्ट की क्षमता को 4 मेगावाट से बढ़ाकर 9 मेगावाट कर दिया गया। इसके बाद वर्ष 1992 में आई बाढ़ से इस बेहद पुराने प्रोजेक्ट को भारी नुक्सान पहुंचा।
तब से लेकर यह प्रोजेक्ट पूरी तरह से बंद पड़ा है। जम्मू कश्मीर पावर डेवलपमेंट कारपोरेशन के सिविल मेंटेंनेंस डिविजन के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया यह प्रोजेक्ट दक्षिण एशिया का सबसे पुराना है। हेरिटेज प्रोजेक्ट बनाने के लिए डिटेल्ड प्रोजेक्ट रिपोर्ट तैयार हो चुकी है जिसे प्रशासनिक मंजूरी मिलने के बाद प्रोजेक्ट संरक्षण कार्य शुरू हो जाएगा।
हासिल है यूनीक प्रोजेक्ट का राष्ट्रीय अवार्ड
दुनिया के सबसे यूनीक प्रोजेक्ट कहे जाने वाले मोहरा पावर प्रोजेक्ट को ठप रहने के दशकों बाद भी राष्ट्रीय अवार्ड हासिल हो गया। वर्ष 2014 में काउंसिल आफ पावर युटिलिटीज ने यूनीक कैटेगरी के 5वें इंडिया पावर अवार्ड के लिए मोहरा प्रोजेक्ट को चुना।
प्रोजेक्ट के ठप रहने से हालांकि सरकार को 1200 करोड़ से अधिक का नुक्सान हो चुका है लेकिन दुनिया में दुर्लभतम होने की वजह से प्रोजेक्ट की अहमियत एक सदी बीतने के बावजूद कम नहीं हुई है।