{"_id":"59422fbb4f1c1b4e5f8b46a5","slug":"mine-workers-son-cracked-iit-here-is-the-full-story","type":"story","status":"publish","title_hn":" पिता ने पत्थर तोड़कर पूरा किया बेटे का आईआईटियन बनने का सपना...पढ़िए पूरी कहानी","category":{"title":"City & states","title_hn":"शहर और राज्य","slug":"city-and-states"}}
पिता ने पत्थर तोड़कर पूरा किया बेटे का आईआईटियन बनने का सपना...पढ़िए पूरी कहानी
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Thu, 15 Jun 2017 01:15 PM IST
विज्ञापन
खान मजूदर काा बेटा बना आईआईटियन
- फोटो : amar ujala
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
कहते हैं सूरज सबके लिए उगता है, हवा सबके लिए है, इसी तरह आगे बढ़ने का हक भी सभी को है। माहौल मिले और सहयोग हो तो प्रतिभा अपना मुकाम पा ही लेती है। ऐसा ही कुछ छोटे से गांव के छात्र दिलीप के साथ भी हुआ है, जिसे पिता ने पत्थर तोड़कर तो मां ने गड्ढे खोदकर पढ़ाया है।
हाल ही में जारी हुए जेईई-एडवांस के रिजल्ट में कोटा के एक प्रतिष्ठित कॅरियर इंस्टीट्यूट के छात्र दिलीप ने अखिल भारतीय स्तर पर सामान्य श्रेणी में 7675 तथा एससी कैटेगिरी में 128वीं रैंक प्राप्त की है। अच्छा परिणाम आने के बाद अब दिलीप काउंसलिंग के इंतजार में है।
दिलीप ने बताया कि वह मूलतः जोधपुर जिले में बालेसर तहसील के खुदियाना गांव का निवासी है। परिवार में माता-पिता और पांच भाई हैं। पिता भगवाना राम गांव के पास ही खान में मजदूर हैं और पत्थर तोड़ने का काम करते हैं। उनके पास सात बीघा जमीन है जिसे हंकाई पर दिया हुआ है। मुझे पढ़ाने के लिए इस जमीन पर लोन भी लिया। मां कमला देवी गृहिणी हैं और परिवार की विपरित परिस्थितियां होने की स्थिति में उन्होंने नरेगा में काम भी किया। अभी भी जॉब कार्ड बना हुआ है।
विज्ञापन
दिलीप ने बताया कि जोधपुर से करीब 70 किलोमीटर दूर गांव में आज भी मूलभूत सुविधाएं पूरी तरह से नहीं है। 10-20 दुकानों का बाजार है। 100-150 घरों की बस्ती है। आधे कच्चे-पक्के मकान में ही माता-पिता जीवन का गुजारा कर रहे हैं। हम पांच भाई हैं और मैं सबसे छोटा हूं। माता-पिता किसी की भी पढ़ाई में पैसे की कमी को आड़े नहीं आने देते। सबसे बड़े भाई ने बीबीए करके जोधपुर में ई-मित्र कियोस्क शुरू किया है। इसके अलावा सभी पढ़ रहे हैं।
दिलीप ने बताया कि मेरी दसवीं तक की पढ़ाई गांव के ही सरकारी स्कूल में हुई। यहां 85 प्रतिशत नम्बर आए तो माता-पिता को परिचितों ने सलाह दी कि कोटा भेज दो, इंजीनियर बन जाएगा। माता-पिता ने जमीन पर लोन लेकर मुझे पढ़ने के लिए कोटा भेजा। यहां एक प्रतिष्ठित कॅरियर इंस्टीट्यूट में एडमिशन लिया और दो साल पढ़ा। इस दौरान इंस्टीट्यूट ने मेरी प्रतिभा को देखते हुए आधी फीस माफ भी कर दी गई। मैंने 12वीं में 79 प्रतिशत अंक प्राप्त किए।
मजदूर पिता और माता की मेहनत को देखते हुए दिलीप ने कोटा में जमकर मेहनत की। यहां रहते हुए टीवी नहीं देखी, स्मार्ट फोन का इस्तेमाल नहीं किया। दिलीप ने बताया कि अच्छे नम्बर आने के बाद गांव के शिक्षकों को भी मुझसे उम्मीद है और मैं सबकी उम्मीदों पर खरा उतर सका, इसमें कोटा का बहुत योगदान है। यहां आकर मेरे पढ़ाई का स्तर बहुत बढ़ गया और मैं आगे बढ़ता चला गया। अब मैकेनिकल ब्रांच से बी.टेक करना चाहता हूं। इंजीनियर बनकर मैं सबसे पहले परिवार के लिए कुछ करूंगा। माता-पिता के सपने पूरे करूंगा। माता-पिता की मेहनत ही है जो मुझे प्रेरित करती है और मैं लगातार आगे बढ़ने की कोशिश करता रहता हूं।
- ऐसे निर्धन परिवारों के प्रतिभावान विद्यार्थियों के कोटा सपने पूरे कर रहा है। गांव-ढाणी के विद्यार्थी देश के श्रेष्ठ संस्थानों में पहुंचे और देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाएं, यही हमारा उद्देश्य है। - नवीन माहेश्वरी,दिलिप के कोचिंग इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर
विज्ञापन
हाल ही में जारी हुए जेईई-एडवांस के रिजल्ट में कोटा के एक प्रतिष्ठित कॅरियर इंस्टीट्यूट के छात्र दिलीप ने अखिल भारतीय स्तर पर सामान्य श्रेणी में 7675 तथा एससी कैटेगिरी में 128वीं रैंक प्राप्त की है। अच्छा परिणाम आने के बाद अब दिलीप काउंसलिंग के इंतजार में है।
विज्ञापन
दिलीप ने बताया कि वह मूलतः जोधपुर जिले में बालेसर तहसील के खुदियाना गांव का निवासी है। परिवार में माता-पिता और पांच भाई हैं। पिता भगवाना राम गांव के पास ही खान में मजदूर हैं और पत्थर तोड़ने का काम करते हैं। उनके पास सात बीघा जमीन है जिसे हंकाई पर दिया हुआ है। मुझे पढ़ाने के लिए इस जमीन पर लोन भी लिया। मां कमला देवी गृहिणी हैं और परिवार की विपरित परिस्थितियां होने की स्थिति में उन्होंने नरेगा में काम भी किया। अभी भी जॉब कार्ड बना हुआ है।
विज्ञापन
दिलीप ने बताया कि जोधपुर से करीब 70 किलोमीटर दूर गांव में आज भी मूलभूत सुविधाएं पूरी तरह से नहीं है। 10-20 दुकानों का बाजार है। 100-150 घरों की बस्ती है। आधे कच्चे-पक्के मकान में ही माता-पिता जीवन का गुजारा कर रहे हैं। हम पांच भाई हैं और मैं सबसे छोटा हूं। माता-पिता किसी की भी पढ़ाई में पैसे की कमी को आड़े नहीं आने देते। सबसे बड़े भाई ने बीबीए करके जोधपुर में ई-मित्र कियोस्क शुरू किया है। इसके अलावा सभी पढ़ रहे हैं।
दिलीप ने बताया कि मेरी दसवीं तक की पढ़ाई गांव के ही सरकारी स्कूल में हुई। यहां 85 प्रतिशत नम्बर आए तो माता-पिता को परिचितों ने सलाह दी कि कोटा भेज दो, इंजीनियर बन जाएगा। माता-पिता ने जमीन पर लोन लेकर मुझे पढ़ने के लिए कोटा भेजा। यहां एक प्रतिष्ठित कॅरियर इंस्टीट्यूट में एडमिशन लिया और दो साल पढ़ा। इस दौरान इंस्टीट्यूट ने मेरी प्रतिभा को देखते हुए आधी फीस माफ भी कर दी गई। मैंने 12वीं में 79 प्रतिशत अंक प्राप्त किए।
मजदूर पिता और माता की मेहनत को देखते हुए दिलीप ने कोटा में जमकर मेहनत की। यहां रहते हुए टीवी नहीं देखी, स्मार्ट फोन का इस्तेमाल नहीं किया। दिलीप ने बताया कि अच्छे नम्बर आने के बाद गांव के शिक्षकों को भी मुझसे उम्मीद है और मैं सबकी उम्मीदों पर खरा उतर सका, इसमें कोटा का बहुत योगदान है। यहां आकर मेरे पढ़ाई का स्तर बहुत बढ़ गया और मैं आगे बढ़ता चला गया। अब मैकेनिकल ब्रांच से बी.टेक करना चाहता हूं। इंजीनियर बनकर मैं सबसे पहले परिवार के लिए कुछ करूंगा। माता-पिता के सपने पूरे करूंगा। माता-पिता की मेहनत ही है जो मुझे प्रेरित करती है और मैं लगातार आगे बढ़ने की कोशिश करता रहता हूं।
- ऐसे निर्धन परिवारों के प्रतिभावान विद्यार्थियों के कोटा सपने पूरे कर रहा है। गांव-ढाणी के विद्यार्थी देश के श्रेष्ठ संस्थानों में पहुंचे और देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाएं, यही हमारा उद्देश्य है। - नवीन माहेश्वरी,दिलिप के कोचिंग इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर