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ये झील बनी 57 परिवारों पर आफत, 2 गांव बने टापू
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Fri, 08 Sep 2017 03:33 PM IST
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नाव की मदद से बाहर जाते लोग
- फोटो : अमर उजाला
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एशिया की सबसे बड़ी मीठे पानी की झील जयसमंद अब छलकने को है। इसके कैचमेंट में पानी का बहाव बढ़ता जा रहा है। इसके चलते गांव में पानी आ जाने पर वे टापू बन जाते हैं। यह स्थिति करीब 6 महीने तक बनी रहेगी। ऐसे में इन गांवों का जिला और उपखण्ड मुख्यालय से सीध सम्पर्क कट गया है।
अब इन गांवों तक पहुंचने का एकमात्र साधन नाव है। जानकारी के अनुसार, सलूम्बर उपखण्ड के मेवल क्षेत्र में मैथूड़ी पंचायत इससे सबसे अधिक प्रभावित है। इस पंचायत के गांव भैंसों का नामला के 22 और पायरी के 32 परिवार जलस्तर बढ़ने के साथ टापू में फंस गए हैं। इन दोनों गांवों में जाने वाला मार्ग अब डूब गया है। जब जलस्तर 27 फिट 6 इंच को छू लेगा तो गांव में पानी का स्तर 6 फीट के करीब आ जाएगा।
वर्तमान में इन गांवों के पुरुष जान जोखिम में डाल 350 मीटर की जोखिम भरी दूरी को पार कर रहे हैं। वहीं, महिलाएं व बच्चे गांव से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। इधर, बिजली नहीं होने से अंधेरे में चिमनी की सहायता से जीवन यापन कर रहे हैं। ग्रामीणों के लिए नियमित जीवन चलाने का भी संकट खड़ा है।
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अब इन गांवों तक पहुंचने का एकमात्र साधन नाव है। जानकारी के अनुसार, सलूम्बर उपखण्ड के मेवल क्षेत्र में मैथूड़ी पंचायत इससे सबसे अधिक प्रभावित है। इस पंचायत के गांव भैंसों का नामला के 22 और पायरी के 32 परिवार जलस्तर बढ़ने के साथ टापू में फंस गए हैं। इन दोनों गांवों में जाने वाला मार्ग अब डूब गया है। जब जलस्तर 27 फिट 6 इंच को छू लेगा तो गांव में पानी का स्तर 6 फीट के करीब आ जाएगा।
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वर्तमान में इन गांवों के पुरुष जान जोखिम में डाल 350 मीटर की जोखिम भरी दूरी को पार कर रहे हैं। वहीं, महिलाएं व बच्चे गांव से बाहर नहीं आ पा रहे हैं। इधर, बिजली नहीं होने से अंधेरे में चिमनी की सहायता से जीवन यापन कर रहे हैं। ग्रामीणों के लिए नियमित जीवन चलाने का भी संकट खड़ा है।
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गांवों के हालात का लिया जायजा
demo pic
- फोटो : AmarUjala
प्रशासन इन दोनों गांवों के 57 परिवारों के रहने के लिए मैथूड़ी पंचायत के सरकारी भवन, आंगनबाड़ी केन्द्र सतत शिक्षा केन्द्र, किसान सेवा केन्द्र में व्यवस्था करता है, लेकिन ग्रामीण अपनी समस्या का स्थाई समाधान चाहते हैं। ग्रामीणों की मांग है कि उन्हें स्थाई रूप से नए स्थान पर बसा दिया जाए।
वहीं एसडीएम सलूम्बर गोपीलाल चंदेल का कहना है कि दोनों टापू बने गांवों की हालत का जायजा लिया है। वैकल्पिक व्यवस्था के लिए उन्हें सरकारी भवनों में रहने की व्यवस्था की गई है। चरनोट व गढ़ के निकट की जमीन पर पशु चराने के लिए चरनोट की व्यवस्था की गई है। स्थाई जमीन के लिए आगे प्रस्ताव भेजा जाएगा।
वहीं एसडीएम सलूम्बर गोपीलाल चंदेल का कहना है कि दोनों टापू बने गांवों की हालत का जायजा लिया है। वैकल्पिक व्यवस्था के लिए उन्हें सरकारी भवनों में रहने की व्यवस्था की गई है। चरनोट व गढ़ के निकट की जमीन पर पशु चराने के लिए चरनोट की व्यवस्था की गई है। स्थाई जमीन के लिए आगे प्रस्ताव भेजा जाएगा।