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104 साल की महिला का हिप रिप्लेसमेंट कर बना रिकार्ड

Mon, 22 May 2017 06:20 PM IST
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर Updated Mon, 22 May 2017 06:20 PM IST
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hip replacement surgery world record
104 साल की महिला का हिप रिप्लेसमेंट - फोटो : Amar Ujala
जयपुर में 104 साल से ज्यादा की उम्रदराज महिला का सफलतापूर्वक हिप रिप्लेसमेंट किया गया और महिला अपने पैरों पर खड़ी होकर चलने लगी। इस केस को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में भेजने की तैयारी की जा रही है।
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मौजूदा दस्तावेजों व डॉक्टरों के दावे के अनुसार विश्व में सबसे ज्यादा उम्र की महिला की हिप सर्जरी का रिकार्ड ग्रेटर नोएडा में दो साल पहले हुए 104 साल की मातेश्वरी देवी के नाम बताया गया है। इससे पहले यूके की महिला एडिथ के नाम वर्ल्ड रिकार्ड है, जिसकी 103 साल की उम्र में हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी की गई थी। नागौर के जसवंतगढ़ की 104 साल से ज्यादा उम्र की बसंती देवी पिछले दिनों अपने घर में सोते समय पलंग से गिर गई थी। इससे उनके दायें कूल्हे की हड्डी कई टुकड़ों में टूट गई। हिप की बॉल भी बाहर निकल गई। इससे असहनीय दर्द के साथ गंभीर हालत में बिस्तर पर ही रहने को मजबूर हो गईं।
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मल्टीपल फ्रेक्चर के कारण पांव भी छोटा हो गया। किसी की सलाह पर उन्हें शेल्बी हॉस्पीटल के ज्वाइन्ट रिप्लेसमेंट व ऑर्थोपेडिक डिसऑर्डर एक्सपर्ट डॉ. रणत रामजस विश्नोई को दिखाया। चूंकि डॉ. विश्नोई लंबे समय लंदन में आर्थोपेडिक सर्जरी से जुड़े रहे हैं, यूके में उम्रदराज महिलाओं की ऐसी सर्जरी होती रहती है। इसी अनुभव के आधार पर उन्होंने अपनी टीम के हैड  अहमदाबाद के सीनियर ऑर्थोपेडिक्स सर्जन डॉ. विक्रम शाह से परामर्श लेकर हिप रिप्लेसमेंट करने का निर्णय किया और एक निजी अस्पताल में डेढ़ घंटे चले ऑपरेशन में सफल रहे। डॉ. धीरज ने भी उन्हें ऑपरेशन में सहयोग किया। 
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डॉ. विश्नोई ने बताया कि वे इस केस को गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में भी भेजेंगे। बसंती देवी की ज्यादा उम्र और मात्र 38 किलो वजन के कारण गंभीर स्थिति को देखते सर्जरी रिस्की थी। इतनी उम्र में रिप्लेसमेंट मजबूत रहे, इसके लिए बोन सीमेंट का उपयोग करते मॉडूलर बाइपोलर तकनीक का इस्तेमाल किया। टूटी हड्डियों को बांध कर ठीक किया, बोन सीमेंट डालकर हिप ज्वान्ट बदला। इससे हिप मात्र 8 मिनट में ही मजबूत हो गया। ऑपरेशन के दो दिन बाद ही मरीज ने मूवमेंट शुरू कर दिया और दस दिन बाद खुद के सहारे चलने लग गईं। सर्जरी के दौरान ब्लड ट्रांसफ्यूजन की जरूरत नहीं पड़ी और न ही मरीज को आईसीयू में रखना पड़ा। 
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