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गूंजने लगे है गौर—गौर गणपति, ईसर पूजै पार्वती...
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Tue, 14 Mar 2017 11:36 AM IST
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गणगौर पूजा करती महिलाएं
- फोटो : डेमो पिक
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राजस्थान के प्रमुख पर्व गणगौर का आगाज हो चुका है। घरों में गणगौर माता की स्थापना की जा चुकी है और गौर—गौर गणपति, ईसर पूजै पार्वती... के गीत गूंजने लगे है।
राजस्थान के जयपुर, उदयपुर, जोधपुर बीकानेर सहित विभिन्न शहरों में सौभाग्य का यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। 16 दिन तक मनाए जाने वाले इस पर्व की शुरूआत धुलण्डी के दिन से होती है। रविवार को जिन घरों में गणगौर पूजा शुरू की गई है वहां गणगौर माता की स्थापना की गई।
इस पूजा का खास महत्व नवविवाहिताओं के लिए होता है। नव विवाहिताएं इस पर्व पर अपने पिता के घर में रहकर सोलह दिनों तक माता गणगौर की पूजा करती हैं और अपने सुहाग की लम्बी उम्र की कामना करती हैं।
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इस दौरान गोर-गोर गणपति, इसर पूजे पार्वती...जैसे मंगल गीतों के साथ पूजा कर महिलाएं मां गौरी की मनुहार में जुटी रहती हैं। बाग-बगीचों व उद्यानों में भी गणगौर पर्व की रौनक देखी जा सकती है। महिलाएं गणगौर पूजा के लिए बाग-बगीचों और उद्यानों में जल व दूब लेने जाती है।
सिर पर मंगल कलश धारण कर महिलाएं मंगल गीत गाती हुई दोब और जल लेकर आती हैं और फिर इससे गणगौर पूजा की जाती है। शीतला अष्टमी पर छोटी बच्चियों को ईसर-गणगौर बनाकर उद्यानों में ले जाया जाएगा।
गौरतलब है कि गणगौर पूजा धुलंडी के दिन से शुरू होती है। इसमें होलिका दहन की राख से सोलह पिंडियां बनाकर उनकी 16 दिनों तक पूजा की जाती है। यह पूजा गणगौर उत्सव तक लगातार होती है। इस पर्व का राजस्थान में प्रमुखता से मनाया जाता है।
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राजस्थान के जयपुर, उदयपुर, जोधपुर बीकानेर सहित विभिन्न शहरों में सौभाग्य का यह पर्व धूमधाम से मनाया जाता है। 16 दिन तक मनाए जाने वाले इस पर्व की शुरूआत धुलण्डी के दिन से होती है। रविवार को जिन घरों में गणगौर पूजा शुरू की गई है वहां गणगौर माता की स्थापना की गई।
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इस पूजा का खास महत्व नवविवाहिताओं के लिए होता है। नव विवाहिताएं इस पर्व पर अपने पिता के घर में रहकर सोलह दिनों तक माता गणगौर की पूजा करती हैं और अपने सुहाग की लम्बी उम्र की कामना करती हैं।
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इस दौरान गोर-गोर गणपति, इसर पूजे पार्वती...जैसे मंगल गीतों के साथ पूजा कर महिलाएं मां गौरी की मनुहार में जुटी रहती हैं। बाग-बगीचों व उद्यानों में भी गणगौर पर्व की रौनक देखी जा सकती है। महिलाएं गणगौर पूजा के लिए बाग-बगीचों और उद्यानों में जल व दूब लेने जाती है।
सिर पर मंगल कलश धारण कर महिलाएं मंगल गीत गाती हुई दोब और जल लेकर आती हैं और फिर इससे गणगौर पूजा की जाती है। शीतला अष्टमी पर छोटी बच्चियों को ईसर-गणगौर बनाकर उद्यानों में ले जाया जाएगा।
गौरतलब है कि गणगौर पूजा धुलंडी के दिन से शुरू होती है। इसमें होलिका दहन की राख से सोलह पिंडियां बनाकर उनकी 16 दिनों तक पूजा की जाती है। यह पूजा गणगौर उत्सव तक लगातार होती है। इस पर्व का राजस्थान में प्रमुखता से मनाया जाता है।