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बुजुर्ग को थाने बुलाया, थानाधिकारी पर चलेगा मुकदमा
अमर उजाला टीम डिजिटल/जयपुर
Updated Tue, 09 Jan 2018 09:06 PM IST
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सती मामलों की विशेष अदालत ने बुजुर्ग परिवादी को बयान दर्ज कराने के लिए थाने में बुलाने के मामले में एक थानाधिकारी पर मुकदमा चलाने के आदेश दिए हैं। कोर्ट ने जयपुर के अशोक नगर थाने के तत्कालीन थानाधिकारी बालाराम को राहत देने से इंकार कर दिया है। इसके साथ ही अदालत ने निचली अदालत की ओर से बालाराम के खिलाफ लिए प्रसंज्ञान को विधि सम्मत मानते हुए दोषी थानाधिकारी की निगरानी अर्जी खारिज कर दी है।
बुजुर्ग परिवादी की ओर से अधिवक्ता सुनील वशिष्ठ ने बताया कि 68 वर्षीय सीताराम अग्रवाल ने जुलाई 2016 में अदालत में परिवाद पेश किया था। अदालत ने इसकी जांच अशोक नगर थानाधिकारी बालाराम को सौंपी थी। थानाधिकारी ने परिवादी को थाने बुलाकर बयान दर्ज किए। जबकि सीआरपीसी की धारा 160 में प्रावधान है कि पन्द्रह साल से छोटे और 65 साल से अधिक आयु के व्यक्ति के बयान उसके स्वयं के घर पर ही हो सकते हैं।
परिवादी की ओर से इसकी शिकायत निचली अदालत में पेश की गई। जिस पर अदालत ने गत वर्ष 20 अप्रैल को बालाराम के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 166ए के तहत प्रसंज्ञान लिया था। जिसे चुनौती देते हुए बालाराम की ओर से निगरानी अर्जी में कहा गया कि जिस दिन परिवादी को थाने बुलाने की बात कही गई है, उस दिन प्रार्थी पूरे समय गश्त पर था।
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ऐसे में परिवादी को कब और किसने थाने बुलाया, इसका कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया। इसलिए निचली अदालत के प्रसंज्ञान आदेश को रद्द किया जाए। जिसका विरोध करते हुए परिवादी की ओर पुलिस की ओर से अदालत में पेश होने के संबंध में दिया नोटिस पेश किया गया। जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने निगरानी अर्जी खाजिर करते हुए निचली अदालत के आदेश को विधि सम्मत माना है।
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बुजुर्ग परिवादी की ओर से अधिवक्ता सुनील वशिष्ठ ने बताया कि 68 वर्षीय सीताराम अग्रवाल ने जुलाई 2016 में अदालत में परिवाद पेश किया था। अदालत ने इसकी जांच अशोक नगर थानाधिकारी बालाराम को सौंपी थी। थानाधिकारी ने परिवादी को थाने बुलाकर बयान दर्ज किए। जबकि सीआरपीसी की धारा 160 में प्रावधान है कि पन्द्रह साल से छोटे और 65 साल से अधिक आयु के व्यक्ति के बयान उसके स्वयं के घर पर ही हो सकते हैं।
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परिवादी की ओर से इसकी शिकायत निचली अदालत में पेश की गई। जिस पर अदालत ने गत वर्ष 20 अप्रैल को बालाराम के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 166ए के तहत प्रसंज्ञान लिया था। जिसे चुनौती देते हुए बालाराम की ओर से निगरानी अर्जी में कहा गया कि जिस दिन परिवादी को थाने बुलाने की बात कही गई है, उस दिन प्रार्थी पूरे समय गश्त पर था।
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ऐसे में परिवादी को कब और किसने थाने बुलाया, इसका कोई साक्ष्य पेश नहीं किया गया। इसलिए निचली अदालत के प्रसंज्ञान आदेश को रद्द किया जाए। जिसका विरोध करते हुए परिवादी की ओर पुलिस की ओर से अदालत में पेश होने के संबंध में दिया नोटिस पेश किया गया। जिस पर सुनवाई करते हुए अदालत ने निगरानी अर्जी खाजिर करते हुए निचली अदालत के आदेश को विधि सम्मत माना है।