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SC: 'संदेह का लाभ जैसे शब्द पत्थर की लकीर नहीं, न्यायिक समीक्षा में फैसले के सार की जांच के लिए कोर्ट बाध्य'

Wed, 06 Dec 2023 07:04 AM IST
यशोधन शर्मा राजीव सिन्हा, नई दिल्ली
राजीव सिन्हा, नई दिल्ली Published by: यशोधन शर्मा Updated Wed, 06 Dec 2023 07:04 AM IST
सार

शीर्ष अदालत ने राम लाल की तरफ से दायर अपील को स्वीकार कर लिया, जिसे भर्ती के लिए आवेदन करने के लिए खुद को वयस्क दिखाने के लिए अपनी जन्मतिथि को 21 अप्रैल 1974 से बदलकर 21 अप्रैल 1972 करने के लिए कांस्टेबल पद से बर्खास्त कर दिया गया था।

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Words like benefit of doubt are not set in stone Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट - फोटो : ANI

विस्तार

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालत कुछ आरोपों पर बरी करने के फैसले की पूरी तरह जांच करने के बाद अनुशासनात्मक कार्यवाही में हस्तक्षेप कर सकती है। ऐसे मामलों में संदेह का लाभ या सम्मानजनक बरी किए जाने जैसी शब्दावली उसके लिए कोई पत्थर की लकीर नहीं है।

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अदालत ने हालिया फैसले में इस टिप्पणी के साथ ही जोधपुर के एक कांस्टेबल की बहाली का आदेश दिया है, जिसे उसकी जन्मतिथि बदलने के कारण बर्खास्त कर दिया गया था। जस्टिस जेके माहेश्वरी और जस्टिस केवी विश्वनाथन की पीठ ने कहा कि कोर्ट न्यायिक समीक्षा में फैसले के सार की जांच के लिए बाध्य है और उसे निर्णयों में अभिव्यक्ति के तौर पर इस्तेमाल शब्दावली पर नहीं जाना चाहिए। पीठ ने कहा, यदि विभागीय जांच और आपराधिक कोर्ट में आरोप समान हैं और यदि सबूत, गवाह और परिस्थितियां एक हैं तो मामला अलग आयाम लेगा।
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जन्मतिथि में बदलाव का था आरोप
शीर्ष अदालत ने राम लाल की तरफ से दायर अपील को स्वीकार कर लिया, जिसे भर्ती के लिए आवेदन करने के लिए खुद को वयस्क दिखाने के लिए अपनी जन्मतिथि को 21 अप्रैल 1974 से बदलकर 21 अप्रैल 1972 करने के लिए कांस्टेबल पद से बर्खास्त कर दिया गया था।
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नहीं की गई हेराफेरी
अदालत ने कहा कि 8वीं कक्षा की मूल मार्कशीट में अपीलकर्ता की जन्मतिथि 21 अप्रैल, 1972 है और उसमें कोई सुधार या हेरफेर नहीं है, इसलिए अपीलकर्ता को दंडित नहीं किया जा सकता। अनुशासनात्मक कार्यवाही के आदेशों पर टिके रहने की अनुमति नहीं दी जा सकती, क्योंकि न केवल आरोप समान थे बल्कि सबूत, गवाह और परिस्थितियां भी समान थीं।

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