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Offence: ईमेल और सोशल मीडिया पोस्ट में महिलाओं की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाले शब्द अपराध, बॉम्बे HC की टिप्पणी
Thu, 22 Aug 2024 11:20 PM IST
पवन पांडेय
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
न्यूज डेस्क, अमर उजाला, मुंबई
Published by: पवन पांडेय
Updated Thu, 22 Aug 2024 11:20 PM IST
सार
बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक व्यक्ति के खिलाफ दर्ज केस को रद्द करने से इनकार करते हुए कहा कि ईमेल या सोशल मीडिया पर लिखे गए ऐसे शब्द जो किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचा सकते हैं, वे अपराध हैं।
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बॉम्बे हाई कोर्ट
- फोटो : ANI
विस्तार
बॉम्बे हाई कोर्ट ने कहा है कि ईमेल और सोशल मीडिया पर लिखे गए वो शब्द अपराध हैं, जो किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचा सकते हैं। जस्टिस ए. एस गडकरी और नीला गोखले की खंडपीठ ने एक व्यक्ति की तरफ से दायर याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 509 (महिला की गरिमा का अपमान) के तहत उसके खिलाफ दर्ज साल 2009 के मामले को रद्द करने की मांग की गई थी।
शख्स ने महिला को लिखे थे आपत्तिजनक ईमेल
जानकारी के मुताबिक आरोपी व्यक्ति ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता को आपत्तिजनक और अपमानजनक ईमेल लिखे थे, जो उसी दक्षिण मुंबई की सोसायटी में रहती है, जहां वह रहता है। शिकायतकर्ता के अनुसार, ईमेल में उसके चरित्र पर टिप्पणी की गई थी और उसे सोसायटी के कई अन्य सदस्यों को भी भेजा गया था।
आरोपी व्यक्ति ने एफआईआर रद्द करने की थी मांग
इस मामले में आरोपी व्यक्ति ने एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए तर्क दिया कि धारा 509 के अनुसार, 'उच्चारण' शब्द का अर्थ केवल 'बोले गए शब्द' होगा, न कि ईमेल या सोशल मीडिया पोस्ट आदि में 'लिखे गए' शब्दों से होगा। हालांकि, हाई कोर्ट ने उसकी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि अदालतों को व्याख्या का उद्देश्यपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
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मामले में उच्च न्यायालय की अहम टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने कहा आधुनिक प्रौद्योगिकी के आगमन ने अपमान को संप्रेषित करने के लिए कई तरह के साधन खोल दिए हैं। जब किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली आपत्तिजनक सामग्री वाला कोई ई-मेल उसे घूरता है, तो क्या हम अपराधी को बिना डरे चले जाने की अनुमति दे सकते हैं, सिर्फ इसलिए कि अपमान लिखित है, बोला नहीं गया है। उच्च न्यायालय ने कहा व्याख्या सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप होनी चाहिए और निष्पक्षता, न्याय और समानता सुनिश्चित करने के लिए कानूनी सिद्धांतों का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जैसे-जैसे समाज विकसित होता है, कानून की व्याख्या भी उभरती चुनौतियों का समाधान करने और सामाजिक प्रगति को बढ़ावा देने के लिए विकसित की जानी चाहिए।
ईमेल की सामग्री निस्संदेह अपमानजनक- उच्च न्यायालय
पीठ ने कहा, यदि इस तरह की संकीर्ण व्याख्या को स्वीकार किया जाता है, तो कई पुरुष किसी महिला को बदनाम करने और उसका अपमान करने और उसकी शील भंग करने के लिए केवल ईमेल भेजने या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करने से परिणामों की परवाह किए बिना बच निकलेंगे। आधुनिक तकनीक इस तरह के अपराध को अंजाम देने के तरीके को वास्तविक बनाती है। पीठ ने कहा कि ईमेल की सामग्री निस्संदेह अपमानजनक है और समाज की नजर में शिकायतकर्ता की छवि और प्रतिष्ठा को कम करने के उद्देश्य से है। अदालत ने मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया। हालांकि, इसने आईपीसी की धारा 354 (शील भंग करने के इरादे से किसी महिला पर हमला करना या आपराधिक बल का प्रयोग करना) के तहत पुरुष के खिलाफ लगाए गए आरोपों को हटा दिया।
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शख्स ने महिला को लिखे थे आपत्तिजनक ईमेल
जानकारी के मुताबिक आरोपी व्यक्ति ने कथित तौर पर शिकायतकर्ता को आपत्तिजनक और अपमानजनक ईमेल लिखे थे, जो उसी दक्षिण मुंबई की सोसायटी में रहती है, जहां वह रहता है। शिकायतकर्ता के अनुसार, ईमेल में उसके चरित्र पर टिप्पणी की गई थी और उसे सोसायटी के कई अन्य सदस्यों को भी भेजा गया था।
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आरोपी व्यक्ति ने एफआईआर रद्द करने की थी मांग
इस मामले में आरोपी व्यक्ति ने एफआईआर को रद्द करने की मांग करते हुए तर्क दिया कि धारा 509 के अनुसार, 'उच्चारण' शब्द का अर्थ केवल 'बोले गए शब्द' होगा, न कि ईमेल या सोशल मीडिया पोस्ट आदि में 'लिखे गए' शब्दों से होगा। हालांकि, हाई कोर्ट ने उसकी दलीलों को खारिज करते हुए कहा कि अदालतों को व्याख्या का उद्देश्यपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए।
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मामले में उच्च न्यायालय की अहम टिप्पणी
उच्च न्यायालय ने कहा आधुनिक प्रौद्योगिकी के आगमन ने अपमान को संप्रेषित करने के लिए कई तरह के साधन खोल दिए हैं। जब किसी महिला की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली आपत्तिजनक सामग्री वाला कोई ई-मेल उसे घूरता है, तो क्या हम अपराधी को बिना डरे चले जाने की अनुमति दे सकते हैं, सिर्फ इसलिए कि अपमान लिखित है, बोला नहीं गया है। उच्च न्यायालय ने कहा व्याख्या सामाजिक परिवर्तनों के अनुरूप होनी चाहिए और निष्पक्षता, न्याय और समानता सुनिश्चित करने के लिए कानूनी सिद्धांतों का पुनर्मूल्यांकन किया जाना चाहिए। कोर्ट ने कहा कि जैसे-जैसे समाज विकसित होता है, कानून की व्याख्या भी उभरती चुनौतियों का समाधान करने और सामाजिक प्रगति को बढ़ावा देने के लिए विकसित की जानी चाहिए।
ईमेल की सामग्री निस्संदेह अपमानजनक- उच्च न्यायालय
पीठ ने कहा, यदि इस तरह की संकीर्ण व्याख्या को स्वीकार किया जाता है, तो कई पुरुष किसी महिला को बदनाम करने और उसका अपमान करने और उसकी शील भंग करने के लिए केवल ईमेल भेजने या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का उपयोग करने से परिणामों की परवाह किए बिना बच निकलेंगे। आधुनिक तकनीक इस तरह के अपराध को अंजाम देने के तरीके को वास्तविक बनाती है। पीठ ने कहा कि ईमेल की सामग्री निस्संदेह अपमानजनक है और समाज की नजर में शिकायतकर्ता की छवि और प्रतिष्ठा को कम करने के उद्देश्य से है। अदालत ने मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया। हालांकि, इसने आईपीसी की धारा 354 (शील भंग करने के इरादे से किसी महिला पर हमला करना या आपराधिक बल का प्रयोग करना) के तहत पुरुष के खिलाफ लगाए गए आरोपों को हटा दिया।
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